जो अमीर या मध्यवर्ग में नहीं हैं वे गरीब हैं. मध्य वर्ग की अवधारणा बड़ी पेचीदा है. यह गरीबों और अमीरों के बीच बड़ी विचित्र स्थिति में फंसा होता है. इसका ताल्लुक यूरोप में और खासतौर पर जर्मनी से है, जिसकी छोटी आकार वाली कंपनियों ने महत्वपूर्ण राजनैतिक और आर्थिक चरित्र का परिचय दिया था.
यह शाही निरंकुशता के खिलाफ आर्थिक उपक्रमों का उत्पाद था जो इसके समक्ष एक मजबूत दीवार की तरह खड़ा हुआ और आगे चलकर देश की वित्त व्यवस्था की रीढ़ बना. ज्यादातर पश्चिमी यूरोपीय देशों में इसका दबदबा है, जहां समृद्धि और सुधारवादी कर व्यवस्था ने अमीरों और गरीबों, दोनों की ही संक्चया को कम किया है.
ऐसा ही मध्यवर्ग ब्रिटिश भारत में व्यापारियों और नौकरशाहों के बीच से उभार के क्रम में था लेकिन आजादी के बाद समाजवादी नीतियों ने इसे खूब दबाया और इसे अपना सिर नीचे करके रहना सिखा दिया. 1991 के सुधारवादी दौर में इसे फिर से उभरने का कुछ मौका मिला लेकिन अपने वैभव का प्रदर्शन इसके लिए जी का जंजाल अब भी बन सकता है.
जिन लोगों ने सुदीप्तो सेन और सुब्रत रॉय की तकदीर को बदलते देखा है, वे यह सोच सकते हैं कि उन्होंने जैसा किया, वैसा भरा. लेकिन उनमें और उदारीकरण में फले-फूले हजार दूसरे लोगों में यह फर्क रहा कि वे सिर नीचे ही रखते रहे.
हालांकि सफलता के साथ जो अपयश आता है वह, कुछ राज्यों में अन्य के मुकाबले, तेजी से कमजोर हुआ है. यह गुजरात में तो जल्दी लुप्त हो गया क्योंकि वहां के बड़े व्यवसायी वर्ग को सफलता का पीछा करना आता है. नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए तो उसने विशेष रूप से ऐसा किया. मोदी ने उसका भरोसा और स्नेह प्राप्त किया और उसकी तरफ से मोदी की पार्टी को मिली माली मदद से 2014 का चुनाव लड़ा जा सका.
मोदी ने मध्य वर्ग के साथ कभी बहुत लगाव तो नहीं दिखाया लेकिन उनका मेक इन इंडिया कैंपेन साफ तौर पर उस मध्य वर्ग को आगे आने का मौका देता है. युवाओं के लिए उनके आह्वान में भी मध्य वर्ग में आकर शामिल होने का निहित आमंत्रण झलकता है. इससे बढ़कर काम तो उनके वित्त मंत्री ने किया है.
बजट तो मध्य वर्ग को सहायता पहुंचाने के लिए ही डिजाइन किया गया लगता है. वित्त मंत्री ने पहले बजट में बुजुर्गों की बचत और स्वास्थ्य बीमा पर टैक्स छूट दी. पिछले साल उन्होंने सबसे निचले ब्रैकेट पर आयकर घटाया, साथ ही कैपिटल गेन टैक्स (संपत्ति की बिक्री पर होने वाले मुनाफे पर लागू कर) में कटौती की.
हालांकि मध्य वर्ग पर मेहरबानी चुनावी नजरिए से कोई होशियारी वाली बात नहीं होती. अमीर देशों के मुकाबले भारत में मध्य वर्ग की संख्या बहुत थोड़ी है. 2019 के आम चुनाव नजदीक आ गए हैं और इसे देखते हुए वित्त मंत्री लोकलुभावन रुख रखने को विवश थे. पहले भी ऐसा हो चुका है पर इसका कोई लाभ हुआ नहीं.
फिर उन्हें अपना एक वादा याद आया जो वह 2016 के बजट में करके भूल ही गए थे, इसलिए उन्होंने फिर से वही पुराना वादा दोहरा दिया कि गरीबों के 5 लाख रु. तक के चिकित्सा खर्चे का बिल सरकार भरेगी.
इस प्रस्ताव की प्राथमिक कमजोरी की ओर एनआइपीएफपी (राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त और नीति संस्थान) की मीता चैधरी ने ध्यान आकृष्ट कराया कि इस योजना को अमली जामा पहनाने में कम से कम 1 लाख करोड़ रु. खर्च होंगे. इस प्रकार यह भी वित्त मंत्री की उन्हीं योजनाओं में शुमार होने वाला है, जिनका कुछ नहीं हो सका है, क्योंकि यह वित्त मंत्री तो घोषणाओं के बादशाह साबित हुए हैं. मानो, उनका दायित्व घोषणाएं करना है, पूरा करना नहीं.
मैं समझना चाहूंगा कि एक समर्पित और व्यवहारिक वित्त मंत्री इस लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में कैसे बढ़ेगा? सबसे पहला काम, शायद वह गांवों और शहरी मलिन बस्तियों में खुलने वाले क्लिनिकों को सब्सिडी देंगे जहां गरीब रहते हैं. दूसरा, वे इन क्लिनिकों में काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को आय में पर्याप्त सब्सिडी देंगे.
तीसरा, वह इन क्लिनिकों के लिए परिवहन खर्चे को सस्ता कर देंगे—जैसे जो बसें डॉक्टरों, नर्सों को लेकर जाती हैं या गांवों तक जरूर दवाइयां नियमित रूप से पहुंचाने के परिवहन खर्च पर रियायत दी जाएगी.
आखिरी बात, वे पैरामेडिकल और नर्सों की ट्रेनिंग पर सब्सिडी देंगे ताकि उनकी संख्या बढ़े और वे ग्रामीण क्षेत्रों की ओर रुख करें. गरीब को सब्सिडी देने की बात बेअसर ही होने वाली है क्योंकि उन्हें यह साबित करना होगा कि वे बीमार हैं और गरीब हैं. इससे भ्रष्टाचार और मनमानी को भरपूर प्रश्रय मिलेगा. स्वास्थ्य सेवा को सस्ता करने का तरीका यह नहीं है कि आप मरीज को सब्सिडी दें बल्कि मेडिकल सेवाओं को सब्सिडी देकर और उनकी आपूर्ति बढ़ाकर ऐसा किया जा सकता है.
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अशोक वी. देसाई पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं

