जब मैं शहरों का अध्ययन कर रहा था, तब सबसे बड़ी बहस इस बात को लेकर थी कि शहरी योजना और डिजाइन सियासत पैदा कर सकती हैं या नहीं. दलील यह थी कि वह जगह भर नहीं है जहां चीजें घटित होती हैं. यह उससे ज्यादा हैः कुछ खास चीजें इसलिए घटती हैं क्योंकि वह जगह इसी तरह डिजाइन की गई है. इसकी उम्दा मिसाल सार्वजनिक चैराहे हैं. वे ऐसी जगहें हैं जो लोगों को इकट्ठा होने की इजाजत देती हैं और इस लिहाज से लोकतांत्रिक प्रथा का लब्बोलुबाब हैं.
यहां जमावड़े महज विरोध के लिए ही नहीं होते. बेशक यह बात मेरे दिमाग में आज इसलिए आई क्योंकि राष्ट्रीय हरित पंचाट ने जंतर मंतर पर लोगों के जमा होने पर पाबंदी लगा दी है. लोग वहां तमाम किस्म के समागमों के लिए आते हैः शहर से गुजर रहे थे, यूं ही टहलते हुए, मेल-मुलाकात के लिए, ये जगहें किसी की नहीं थीं और इसलिए शायद हरेक की थीं. हम दलील देते थे कि जनता तब तक नहीं हो सकती जब तक जनता की जगहें न हों जहां वे तमाशे और बेसबब मटरगश्ती करें, त्योहार मनाएं और विरोध जाहिर करें, कूच करें और जुलूस निकालें, संगत करें और घूमें-फिरें.
इसमें बहुत कुछ सच्चाई है, तिस पर भी जब खास तौर पर जगह और विरोध प्रदर्शन की बात आती है, तो मैं हमेशा थोड़े शक-शुबहे से भर जाता हूं. मैं दिल्ली में जन्मा, पला-बढ़ा और रहता हूं. मैंने अपनी सियासत इसकी सड़कों पर सीखी. ऐसा करते हुए मुझे तीखा एहसास था कि मेरे शहर में नियोजन का सबसे हालिया दौर, जिसने इसे इसकी बहुत कुछ मौजूदा शहरी शक्ल दी, लोकतांत्रिक नहीं था. यह औपनिवेशिक थाः 1947 के पहले भी और बाद में भी.
जिन जगहों को मैंने विरोध प्रदर्शन से जोड़कर देखा, चाहे वह राजपथ हो या जनपथ, वे लोगों की नहीं, हुकूमत की जगहों के तौर पर डिजाइन की गई थीं. जगहें जो सत्ता की शान-शौकत की याद दिलाती थीं. कई मायनों में यह ज्यादातर शहरों की योजना के बारे में सच है. एथेंस में केवल जमीन-जायदाद वाले और पढ़े-लिखे लोग ही मशहूर चैराहों पर इकट्ठा होते थे. पेरिस में औसमैन ने भव्य बुलवार्ड बनाए जिन्होंने क्रांतिकारी मोर्चों को कम असरदार बना दिया. काहिरा में उन्हीं औसमैन के श्पेरिस ऑन द नील" की तर्ज पर, इतनी गहरी विडंबना से भरा, तहरीर स्कवायर बनाया गया. आजादी से पहले जब बोट क्लब के लॉनों पर विरोध की जगह के तौर पर बार-बार कब्जा किया जाता था, तब इसके पीछे योजना नहीं, हुक्मउदूली होती थी.
विरोध की जगहें नियोजित नहीं होतीं, उन्हें हासिल किया जाता है. वे तकरीबन हमेशा इनकार करने पर उतारू उस जगह पर कब्जा करने से पैदा होती हैं. नारे से कहीं ज्यादा खुद मौजूदगी ही विरोध है. विध्वसंक, असंभावित और इसलिए सियासी. लोकतंत्रों के आधुनिक इतिहास में जहां यह विध्वंस घटित होता ही है, वह एक ही दलील से तय होता रहा हैः हुकूमत को सुनाई दे सकने वाली दूरी के भीतर होना, अक्सर बिल्कुल उन्हीं सड़कों और गलियारों में जिनका मतलब आपका वहां न होना है.
जब राष्ट्रीय हरित पंचाट के न्यायमूर्ति दलील देते हैं कि वे कुल इतना कर रहे हैं कि विरोध प्रदर्शन को उसकी वाजिब और तय जगह (जो उन्होंने रामलीला मैदान तय की है) पर रख रहे हैं, तब वे एक समृद्ध परंपरा का ही अनुसरण कर रहे हैं, वाजिब सार्वजनिक जगहों की योजना और डिजाइन की परंपरा का नहीं, बल्कि जगहों पर नियंत्रण की परंपरा का, लोगों को उनकी जगह पर रखने की परंपरा का.
उन्हें लगता है कि ऐसा करने की शक्ति उनके पास है. यह जरूर हमारे लिए चिंता की बात होनी चाहिए. चिंता की बात हमारे लिए यह भी होनी चाहिए कि वे उस स्विचबोर्ड के सबसे ताजातरीन सर्किट भर हैं जो लंबे समय से दुरुस्त होता रहा है. सच यह भी है कि जंतर मंतर को हमने नहीं चुना. हमें वहां से धकियाया गया. महज मेरी अपनी जिंदगी में हम इंडिया गेट, बोट क्लब और राजपथ से धकियाए गए, संसद के दरवाजों से धकियाए गए, और संसद मार्ग से भी धकियाए गए.
शायद फिर, अनजाने में यह वह फैसला है जिसकी हमें कुछ वक्त से दरकार थीरू यह हमें याद दिलाता है कि विरोध प्रदर्शन की जगहों को हासिल करने के लिए सड़कों पर वापस जाएं, बजाए इसके कि उन्हें हथियाए जाने दें. यह खुद हमें, हमारी अदालतों और हमारे शहर को याद दिलाता है कि वे जगहें, जहां हुकूमत भले शहरी शक्ल में अपना इजहार करती हो, परिभाषा से और यहां तक कि योजना से भी और कुछ भी होने से पहले सार्वजनिक या जनता की जगहें है. यह हमें प्रतिवाद करने के लिए बाध्य करता है, महज एक खास फैसले का नहीं, जो अपनी दलीलों जितना ही दोषपूर्ण है, बल्कि इस विचार मात्र का ही कि हुकूमत विरोध प्रदर्शन की जगह तय, नियोजित और तलाश करेगी. शायद एक बार फिर केवल एक सड़क पर नहीं, बल्कि तमाम सड़कों पर लौटने का वक्त आ गया है.
(गौतम भान इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट बेंगलुरू/दिल्ली में पढ़ाते हैं)

