प्रधानमंत्री शिंजो अबे की आगामी राजकीय भारत यात्रा इस लिहाज से अपारंपरिक है कि वह दिल्ली में बहुत कम समय बिताएंगे. भारत में सुधारों के अगुआ राज्य गुजरात की ही यात्रा पर जाने के इस असामान्य निर्णय से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उच्चतम सम्मान जाहिर किया है. उनके बीच शानदार केमिस्ट्री है. दोनों मुंबई और अहमदाबाद के बीच हाइ-स्पीड रेल परियोजना का आधिकारिक उद्घाटन करेंगे, जिसमें जापान की जानी-मानी आपदा से सुरक्षित शिंकनसेन प्रणाली होगी. बुनियादी ढांचे की इस बेमिसाल परियोजना के बाद जापान-भारत के शानदार सहयोग से कई और परियोजनाएं हाथ में ली जाएंगी. मसलन, दिल्ली मेट्रो और दूसरे बड़े शहरों में ऐसी ही पहल, दिल्ली और मुंबई तथा साथ ही चेन्नै और बेंगलुरू के बीच औद्योगिक गलियारे की परियोजना और दिल्ली-मुंबई रेल ढुलाई गलियारा परियोजना. शिंकनसेन परियोजना चेन्नै और बेंगलुरू के बीच और शायद भविष्य में दूसरी हाइ-स्पीड रेलों की पूर्व झलक है. जापान ने इसकी कामयाबी के लिए सब कुछ देने की ठान ली हैरू धन, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी, भारत में ट्रेन मैन्यूफैक्चरिंग फैक्टरियों और प्रशिक्षण सुविधाओं का निर्माण और सिस्टम को चलाने का तरीका तथा तकनीकी जानकारी.
दोनों प्रधानमंत्री गुजरात में सुजुकी की नई ऑटोमोबाइल फैक्टरी को भी अपना आशीर्वाद देंगे. यह हरियाणा में गुडग़ांव और मानेसर के बाद सुजुकी का तीसरा परिसर है. 1990 के दशक की शुरुआत से ही भारत के ऑटोमोटिव उद्योग के साथ सुजुकी की भागीदारी भारत में मैन्यूफैक्चरिंग 'क्राति' लाने में कामयाब रही है. रेल परियोजना और सुजुकी का नया उद्यम प्रधानमंत्री मोदी की साहसी पहलों—मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया—के प्रति दोनों सरकारों और कारोबारी समुदायों की प्रतिबद्धता का प्रतीक है.
दोनों राष्ट्रों के बीच 'विशेष रणनीतिक और वैश्विक भागीदारी' आपस में सुरक्षा सहयोग को लगातार ज्यादा से ज्यादा प्राथमिकता दे रही है. प्रधानमंत्री अबे की 'मुक्त और खुली भारत-प्रशांत रणनीत' और प्रधानमंत्री मोदी की 'ऐक्ट ईस्ट' नीति द्विपक्षीय, तथा साझा मित्र अमेरिका को शामिल करते हुए त्रिपक्षीय, सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा दे रही है. यह चीन की भूराजनैतिक बढ़त में प्रतिबिंबित होता है. बीजिंग की 'वन बेल्ट, वन रोड' रणनीति का मकसद दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर से होते हुए यूरोप तक प्राचीन सिल्क रोड और समुद्री मार्गों के साथ-साथ आर्थिक हितों और राजनैतिक-सैन्य प्रभाव का विस्तार करना है. भूभागीय मुद्दों को लेकर चीन का उत्पीडऩ भारत की हिमालयी सरहदों से लेकर दक्षिण चीन सागर और पूर्व चीन सागर तक जाता है.
भारत-अमेरिका सुरक्षा संबंध के नए आयाम की रोशनी में भारत रणनीतिक स्वायत्तता की खुद अपनी ही नीति की वैधता पर सवाल उठा सकता है. अमेरिकी और भारतीय नौसेनाओं के मालाबार संयुक्त समुद्री अभ्यास आम बात हो गए हैं. दरअसल, अमेरिका का सातवां बेड़ा प्रशांत महासागर और हिंद महासागर तक फैला है. पूर्वी एशिया में लगातार बिगड़ते सुरक्षा माहौल के मद्देनजर मित्रवत देशों के साथ सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देने के लिए जापान ने लंबे समय से स्थापित अपने 'हथियारों के निर्यात के तीन सिद्धांतों' में ढील दे दी है. यदि आत्मरक्षा बलों के जहाज नहीं भी तो जापानी तटरक्षक जहाजों सहित कुछ साजोसामान दक्षिण चीन सागर में चीनी विस्तारवाद के खतरे का मुकाबला कर रहे आसियान देशों के दिए गए हैं. जापान को खुद से पूछना चाहिए कि क्या भारत के साथ सुरक्षा सहयोग को और आगे ले जाने के लिए ऊपर बताए सिद्धांतों में और ज्यादा ढील देनी चाहिए.
अहमदाबाद में दोनों प्रधानमंत्रियों का महात्मा गांधी के आश्रम पर जाना फिर से यह अपील करने का मौका होगा कि गांधी जी का दर्शन अब भी कारगर और प्रासंगिक है. उम्मीद है कि वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लोकतंत्र और कानून के शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराएंगे.
हाल ही में मैंने निक्केइ बीपी से प्रकाशित किताब द लास्ट सुपरपावर इंडिया लॉन्च की थी. मैं मानता हूं कि भारत अपने आकार (विशाल भूभाग तथा तादाद में बढ़ती तथा खूबियों में निखरती आबादी), बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताकत तथा लगातार बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव की बदौलत महाशक्ति का दर्जा हासिल कर लेगा. भारत के बाद कोई दूसरा देश सुपरपावर के तौर पर नहीं उभरेगा. फिलहाल अमेरिका को महाशक्ति देश की कोटि में रखा जाता है. चीन और रूस को भी महाशक्ति कहा जा सकता है, पर उनकी संदिग्ध राजनैतिक व्यवस्थाओं और दुष्ट शासन व्यवस्थाओं के प्रति उनकी हमदर्दी की वजह से वे सम्मानित शक्तियां नहीं हैं. मैं उम्मीद करता हूं कि भारत इस शब्द के सच्चे अर्थों में 'सुपर' होने के योग्य महान शांति-प्रेमी और लोकतांत्रिक 'पावर' बनेगा.
(लेखक जापान-इंडिया एसोसिएशन के अध्यक्ष और भारत में जापान के पूर्व राजदूत हैं)

