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अर्थात्ः ऑक्सीजन की कमी

उत्तर प्रदेश के पूरब में मच्छरों से उपजी महामारी हर साल आती है. योगी आदित्यनाथ निरंतर इससे निबटने की तैयारियों पर सवाल उठाकर दिल्ली को जगाते थे. उन्हें इन सवालों की ताकत अखबारों और लोगों की प्रतिक्रियाओं से मिलती थी. इससे गफलतों पर निगाहें रहती थीं, चिकित्सा तंत्र को रह-रहकर झिंझोड़ा जाता था और व्यवस्था को इस हद तक सोने नहीं दिया जाता था कि मरीजों को ऑक्सीजन देना ही भूल जाए.

सवालों की कोई सियासी पार्टी नहीं होती. लोकतंत्र में इनकी कमी व्यवस्था के लिए घातक है
सवालों की कोई सियासी पार्टी नहीं होती. लोकतंत्र में इनकी कमी व्यवस्था के लिए घातक है
अपडेटेड 22 अगस्त , 2017

ऑक्सीजन चाहिए तो सवालों को रोपते-उगाते रहिए. लोकतंत्र को ऑक्सीजन इसी हरियाली से मिलती है. सवाल जितने लहलहाएंगे, गहरे, घने और छतनार होते जाएंगे, लोकतंत्र का प्राण उतना ही शक्तिशाली हो जाएगा.

देखिए न, ऑक्सीजन (सवालों) की कमी ने गोरखपुर में बच्चों का दम घोंट दिया. पूर्वी उत्तर प्रदेश में इन्सेफलाइटिस को रोकने को लेकर योगी आदित्यनाथ की गंभीरता संसद के रिकॉर्ड में दर्ज है लेकिन जो काम वे अपने पूरे संसदीय जीवन के दौरान लगातार करते रहे, उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद वह काम धीमा पड़ा और बंद हो गया.

यह काम था सरकार और उसकी व्यवस्था पर सवाल उठाने का. उत्तर प्रदेश के पूरब में मच्छरों से उपजी महामारी हर साल आती है. योगी आदित्यनाथ निरंतर इससे निबटने की तैयारियों पर सवाल उठाकर दिल्ली को जगाते थे. उन्हें इन सवालों की ताकत अखबारों और लोगों की प्रतिक्रियाओं से मिलती थी. इससे गफलतों पर निगाहें रहती थीं, चिकित्सा तंत्र को रह-रहकर झिंझोड़ा जाता था और व्यवस्था को इस हद तक सोने नहीं दिया जाता था कि मरीजों को ऑक्सीजन देना ही भूल जाए.

सरकार बदलने के बाद न तो जापानी बुखार के मच्छर मरे, न पूर्वी उत्तर प्रदेश में गंदगी कम हुई और न ही अस्पताल सुधरे लेकिन इन्सेफलाइटिस से जुड़े सवालों की ऑक्सीजन कम हो गई. नतीजाः 60 बच्चे हांफ कर मर गए. हैरानी इस बात पर थी कि बच्चों की मौत के बाद अपनी पहली प्रेस वार्ता में, मुख्यमंत्री उन्हीं सवालों पर खफा थे जिन्हें लेकर वे हर साल दिल्ली जाते थे.

नमूने और भी हैं. रेलवे को ही लें. पिछली भूलों से सीखकर व्यवस्था को बेहतर करना एक नियमित प्रक्रिया है. पिछले तीन साल से रेलवे में कुछ सेवाएं सुधरीं लेकिन साथ ही कई पहलुओं पर अंधेरा बढ़ गया जिन पर सवालों की रोशनी पडऩी चाहिए थी लेकिन प्रश्नों को लेकर बहुत सहजता नहीं दिखी. फिर आई रेलवे में कैटरिंग, सफाई, विद्युतीकरण की बदहाली पर सीएजी की ताजा रिपोर्ट, जिसने पूरे गुलाबी प्रचार अभियान को उलट दिया.

नोटबंदी के दौरान जब लोग इसके असर और क्रियान्यवयन पर सवाल उठा रहे थे, तब उन सवालों से नाराज होने वाले बहुतेरे थे. अब आठ माह बाद इस कवायद के रिपोर्ट कार्ड में जब केवल बचत निकालने के लिए बैंकों की कतार में मरने वालों के नाम नजर आ रहे हैं तो उन सवालों को याद किया जा रहा है.

सवालों की कोई राजनैतिक पार्टी नहीं होती. प्रश्न पूछना फैशन नहीं है. व्यवस्था पर सवाल किसी भी गवर्नेंस की बुनियादी जरूरत है. भाजपा की पिछली सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री इसे दिलचस्प ढंग से आजमाते थे. यदि उनका विभाग खबरों से बाहर हो जाए तो वे पत्रकारों से पूछते थे, क्या हमारे यहां सब अमन-चैन है? वे कहते थे कि मैं अंतर्यामी तो हूं नहीं जो अपने हर दफ्तर और कर्मचारी को देख सकूं. सवाल और आलोचनाएं ही मेरी राजनैतिक ताकत हैं जिनके जरिए मैं व्यवस्था को ठीक कर सकता हूं.

आदित्यनाथ योगी हो सकते हैं लेकिन वे अंतर्यामी हरगिज नहीं हैं. वे गोरखपुर में बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज जाकर भी यह नहीं जान पाए कि वहां पिछले कई हफ्तों से ऑक्सीजन की कमी है. प्राण वायु की सप्लाई के लिए चिट्ठियां फाइलों में टहल रही हैं और बच्चों की मौत बढ़ती जा रही हैं, जबकि इस क्षेत्र के सांसद के तौर पर उनके पास यह सारी जानकारियां रहतीं थीं और इन्हीं पर सवाल उठाकर वे केंद्र और प्रदेश सरकार को जगाते थे.

गोरखपुर की घटना से पूरा देश सदमे में है.

भाजपा और सरकार भी कम असहज नहीं हैं. नेता और अधिकारी अब यह कहते मिलने लगे हैं कि जिन्हें फैसला लेना है, उनके पास सही सूचनाएं नहीं पहुंच रही हैं. सवालों से परहेज और आलोचनाओं से डर पूरी व्यवस्था को अनजाने खतरों की तरफ ढकेल देता है. कुर्सी को तो वही सुनाया जाएगा जो वह सुनना चाहती है. सरकारें हमेशा अपना प्रचार करती हैं और लोकतंत्र की अन्य संस्थाएं हमेशा उस पर सवाल उठाती हैं. यही सवाल नेताओं को जड़ों से कटने से बचाकर, उनके राजनैतिक जोखिम को कम करते हैं.

भारत का संविधान लिखने वाली सभा ने अध्यक्षीय लोकतंत्र की तुलना में संसदीय लोकतंत्र को शायद इस वजह से भी चुना था, क्योंकि यह सत्ता के सबसे बड़े हाकिम से भी सवाल पूछने की छूट देता है. लोकतंत्र के वेस्टमिंस्टर मॉडल में संसद में प्रश्नकाल की परंपरा है जिसमें प्रधानमंत्री भी मंत्री के रूप में सवालों के प्रति जवाबदेह है. अध्यक्षीय लोकतंत्र में इस तरह की परंपरा नहीं है.

सवालों को उगने से मत रोकिए, नहीं तो पता नहीं कितनों का दम घुट जाएगा. सयानों ने भी हमें सिखाया था कि कोई प्रश्न मूर्खतापूर्ण नहीं होता, क्योंकि मूर्ख कभी सवाल नहीं पूछते.

 

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