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अर्थात्: अधूरे आर्थिक सुधारों का दर्द

पच्चीस साल पहले शुरू हुए आर्थिक सुधारों की बड़ी त्रासदी इनका अधूरापन है, जो अगर नहीं होता तो हमारे फायदे कई गुना ज्यादा होते और असंगतियां कई गुना कम.

अपडेटेड 25 जुलाई , 2016

शुरुआत अच्छी हो तो समझ लीजिए कि आधा रास्ता पार. कहावत ठीक है बशर्ते इसे भारत के आर्थिक सुधारों से न जोड़ा जाए. भारत के आर्थिक सुधार अधूरी कोशिशों का  शानदार अजायबघर हैं. उदारीकरण की रजत जयंती पर बेशक हमें फख्र होना चाहिए कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा मुल्कों में है जिसने ढाई दशक में अभूतपूर्व और अद्भुत उपलब्धियां हासिल की हैं, जो बढ़ी हुई आय, सेवाओं, तकनीकों, उत्पादों, सुविधाओं की शक्ल में हमारे आसपास बिखरी हैं और इन सुधारों की कामयाबी की गारंटी देती हैं. लेकिन इसके बावजूद आर्थिक सुधारों की बड़ी त्रासदी इनका अधूरापन है, जो अगर नहीं होता तो हमारे फायदे शायद कई गुना ज्यादा होते और असंगतियां कई गुना कम.

सबसे नए उदारीकरण से शुरू करते हैं. इसी जून में मोदी सरकार ने महत्वाकांक्षी और दूरगामी उड्डयन (एविएशन) नीति जारी की और इसके ठीक बाद विमानन क्षेत्र में विदेशी निवेश के नियम भी उदार किए गए. यह दोनों ही फैसले आधुनिकता और साहस के पैमानों पर उत्साहवर्धक थे, क्योंकि नई नीति के तहत सरकार ने भारतीय विमानन कंपनियों के लिए विदेशी उड़ानों के दकियानूसी नियमों को बदल दिया था और दूसरी तरफ विदेशी विमान कंपनियों के लिए बाजार खोलने की हिम्मत दिखाई थी. लेकिन इसके बाद भी यह सुधार अधूरा ही रह गया.

नई उड्डयन नीति का अधूरापन इसलिए और ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में विमानन क्षेत्र का उदारीकरण 1990 में प्रारंभ हुआ. 1994 की ओपन स्काई नीति और विमान सेवा में सरकारी कंपनियों (एयर इंडिया) के एकाधिकार की समाप्ति के बाद तेजी आई लेकिन 26 साल के तजुर्बों के बावजूद नई विमानन नीति में इस क्षेत्र के समग्र उदारीकरण की हिम्मत नजर नहीं आई. कई नीतियों के सफर के बावजूद विमानन क्षेत्र को अभी कुछ और नीतियों का इंतजार करना होगा.

ऊर्जा और बिजली क्षेत्र असंगतियों का शानदार नमूना है. निजी कंपनियों को बिजली उत्पादन की इजाजत 1992 में (इंडिपेंडेंट पॉवर प्रोड्यूसर्स नीति) और उत्पादक इस्तेमाल (कैप्टिव) के लिए कोयला निकालने की छूट 1993 में मिल गई थी. नब्बे के दशक में राज्य बिजली बोर्डों के पुनर्गठन और 2000 के दशक में नए बिजली कानून सहित कई कदमों के बावजूद बिजली सुधार पूरे नहीं हुए. इसी दौरान सरकार ने कोयला क्षेत्र में विदेशी निवेश की गति तेज की और कैप्टिव खदानों का आवंटन-घोटाले-पुनर्आवंटन हुए.

ऊर्जा नीतियों में तमाम फेरबदल के बावजूद बिजली और ऊर्जा सुधार अधूरे उलझे और पेचीदा रहे. सरकार ने उत्पादन का निजीकरण तो किया लेकिन बिजली वितरण अधिकांशतः सरकारी नियंत्रण में रहा. सरकारें बिजली दरें तय करने की राजनीति छोडऩा नहीं चाहती थीं, इसलिए बिजली क्षेत्र में नियामक खुलकर काम नहीं कर सके. दूसरी तरफ बिजली उत्पादन में निजी निवेश के बावजूद सरकार ने कोयला खनन अपने नियंत्रण में रखा. इन अजीब असंगतियों के चलते भारत का ऊर्जा क्षेत्र विवादों, घोटालों और घाटों का पुलिंदा बन गया. 1990 में बिजली बोर्ड घाटे में थे और राज्यों के बिजली वितरण निगम आज भी घाटे में हैं, जिन्हें पिछले 25 साल में तीन पैकेज मिल चुके हैं. तीसरा पैकेज उदय है, जो मोदी सरकार लेकर आई है. बिजली का उत्पादन व आपूर्ति बढ़ी है लेकिन कोयला व बिजली वितरण के क्षेत्र में अधूरे सुधारों के कारण असंगतियां और ज्यादा बढ़ गई हैं.

दूरसंचार सुधारों का किस्सा भी जानना जरूरी है, जो लगभग हर दूसरे साल किसी नीतिगत बदलाव के बावजूद आज तक नतीजे पर नहीं पहुंच सके. 1993 में मोबाइल सेवा की शुरुआत से लेकर, 1995 में कंपनियों को लाइसेंस फीस से माफी, टीआरएआइ का गठन, सीडीएमए सेवा, 2जी लाइसेंस, विदेशी निवेश का उदारीकरण, 3जी सेवा, 2जी घोटाला, नए स्पेक्ट्रम आवंटन और 4जी तक दूरसंचार सुधारों का इतिहास रोमांच से भरा हुआ है.

इस उदारीकरण का मकसद बाजार में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा लाना और उपभोक्ताओं को आधुनिक व सस्ती सेवा देना था लेकिन दूरसंचार सुधारों को सही क्रम नहीं दिया जा सका. सुधारों के अधूरेपन व तदर्थवाद का नतीजा है कि स्पेक्ट्रम घोटालों के बावजूद सरकारें पारदर्शी स्पेक्ट्रम आवंटन नीति नहीं बना सकीं. टीआरएआइ एक सफल व पारदर्शी नियामक बनने में असफल रहा, इसलिए 2जी से 4जी तक आते-आते बाजार में प्रतिस्पर्धा (ऑपरेटरों की संक्चया घटी) सीमित रह गई. सेवा की गुणवत्ता बिगड़ी है और सेवा दरें महंगी हो गई हैं.
खुदरा कारोबार के उदारीकरण को चौथे उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं जिसकी शुरुआत 1997 में कैश ऐंड कैरी में शत प्रतिशत विदेशी निवेश के साथ हुई थी. 2000 के दशक में सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी और मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआइ खोला गया लेकिन सियासी ऊहापोह के कारण सुधार पूरी तरह लागू नहीं हो सके. इस बीच सरकार ने हाल में ही ई-कॉमर्स और फूड रिटेल में शत प्रतिशत विदेशी निवेश खोल दिया. कागजों पर पूरा रिटेल क्षेत्र विदेशी निवेश के लिए खुला है, लेकिन प्रक्रियागत उलझनों व राजनैतिक असमंजस के चलते निवेश नदारद है.

अधूरे, अनगढ़ और असंगत सुधारों के कारण, न चाहते हुए भी भारत में ऐसी अर्थव्यवस्था बन गई है जिसमें खुलेपन के फायदे चुनिंदा हाथों तक सीमित हैं और बाजार का स्वस्थ और समानतावादी विस्तार कहीं पीछे छूट गया. इस खुले बाजार में अवसर बांटने वाली ताकत के तौर पर सरकार आज भी मौजूद है जबकि अवसर लेने की होड़ में लगी कंपनियां कार्टेल, नेताओं से गठजोड़ और भ्रष्टाचार से इस उदारीकरण को आए दिन दागी करती हैं.

ब्रिटिश कवि जॉन कीट्स कहते थे कि अच्छी शुरुआत से आधा काम खत्म नहीं होता. दरअसल जब तक आधा रास्ता न मिल जाए तक अच्छी शुरुआत का दावा ही नहीं करना चाहिए. आर्थिक सुधारों ने भारत को बड़ी नेमतें बख्शी हैं लेकिन सुधारों के तलवे में अधूरेपन का एक बड़ा कांटा चुभा है जो एक स्वस्थ देश को हमेशा लंगड़ा कर चलने पर मजबूर करता है. काश हम यह कांटा निकाल सकते!  

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