उच्च गुणवत्ता वाली प्रभावी नीतियां बनाने में लॉ बीइंग सरकारों की क्षमता को बढ़ा सकती है लेकिन इससे राजनैतिक भ्रष्टाचार के बढऩे का भी खतरा होता है. दुनिया के 200 से ज्यादा देशों में से 20 से भी कम देश किसी न किसी रूप में लॉ बीइंग को जांचते-परखते हैं और इन प्रयासों ने अक्सर निराशाजनक नतीजे दिए हैं. क्या भारत में लॉ बीइंग को कानूनी शक्ल दे दी जानी चाहिए? हां, तो किसका नियमन हो और कैसे? अगर हम भारत को ऐसी प्रक्रिया में ले जाना चाहते हैं जहां अंततः वह भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और कॉर्पोरेट जासूसी के जाल से निकल सके, तो पहले सवाल का जवाब हां में होना चाहिए. दूसरा सवाल इसकी मांग करता है कि हम भारत में लॉ बीइंग के तरीकों और नियमन के संदर्भ में वैश्विक अनुभवों पर विचार करें.
हमें याद रखना होगा कि लॉ बीइंग विशेष हित वाले ऐसे समूहों के बीच सुविधाजनक गठजोड़ होता है जो उन नीतियों और नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने की इच्छा रखते हैं जिन्हें विशेष हित वाले समूहों के संसाधनों की जरूरत होती है—चाहे वह तकनीकी विशेषज्ञता का मसला हो, डाटा का, प्रचार और पार्टी वित्त, मीडिया प्रचार अथवा किन्हीं विशिष्ट नीतियों के समर्थन का या फिर विरोध में लोगों की राय बनाने का. लॉ बीइंग का ऐसा नियमन जो इस बुनियादी राजनैतिक वास्तविकता को संबोधित नहीं करता वह पारदर्शिता के किसी भी वादे को पूरा कर पाने में सक्षम नहीं होगा.
भारत में इस पर चल रही मौजूदा बहस नियामक निर्णयों की अहमियत को रेखांकित करती है कि किस तरह के लॉबीस्ट को शामिल किया जाना चाहिए इनहाउस, थर्ड पार्टी, ट्रेड यूनियन, सिविल सोसाइटी समूह, खुलासा (डिसक्लोजर) करने के लिए कौन जिक्वमेदार होगा (लॉबीस्ट या जिसके साथ लॉबिंग की जा रही है) और खुलासा करने का दायरा क्या होना चाहिए (पहचान सामने लाना, जिनके साथ लॉबीइंग की जा रही है उसका संपर्क, मुद्दा, कार्रवाई, इत्यादि). इसमें हालांकि लॉ बीइंग नियमन के खास पहलुओं की ओर कम ध्यान दिया गया है—भारत में भ्रष्टाचार कम करने के लिए एक व्यापक भ्रष्टाचार निरोधक ढांचे के भीतर लॉ बीइंग नियमन के अनुपालन और अनुकूलन को लागू करने के लिए प्रभावी फ्रेमवर्क का निर्माण.
सिर्फ विधेयक पारित कर देने से यह पक्का नहीं हो जाएगा कि लॉ बीइंग करने वाली इकाइयां वास्तव में अपनी बातें सामने रख देंगी. हो सकता है कि हमारे यहां भी लिथुआनिया वाला हाल हो जाए, जहां लॉ बीइंग के लिए पंजीकरण की अनिवार्यता वाला कानून लाए जाने के सात साल बाद सिर्फ 13 लॉबीस्ट ने पंजीकरण करवाया था या फिर हंगरी की स्थिति का यहां दुहराव हो जाए, जहां लॉबीस्ट और सरकारी अधिकारियों को पंजीकरण और कार्यवाहियों के उद्घाटन के लिए प्रेरित करने में नाकाम रहने के बाद 2011 में इस कानून को ही खत्म कर दिया गया. हम भले ही मान लें कि भारत में यह समस्या हल हो जाएगी, लेकिन अगर एकत्रित आंकड़ों की निगरानी, अनुपालन न करने वाले लॉबिस्टों और सरकारी अधिकारियों की पहचान तथा प्रशासनिक, वित्तीय और आपराधिक दंड लगाकर उन्हें दंडित करने की कोई सुविचारित प्रणाली न बनी तो कोई भी नियामक प्रयास बेकार हो जाएगा. सिर्फ जापान, अमेरिका और स्लोवेनिया ऐसे देश हैं जिन्होंने लॉबीइंग का नियमन किया है और जिनके पास ऐसी प्रणालियां मौजूद हैं जो सक्रिय रूप से इस पर निगरानी रखती हैं और जिन्होंने नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सार्थक दंड लगाया है. भारत को अपनी राजनैतिक वास्तविकताओं के मद्देनजर विभिन्न अनुपालक तत्वों को अपनाए जाने पर जरूर बहस करनी चाहिए. प्रचार का खर्च वहन और निगरानी तथा हितों के टकराव संबंधी कानूनों के लिए समानांतर क्षमता विकसित किए बगैर लॉबीइंग नियमन का नाकाम हो जाना तय है. इस संदर्भ में स्लोवेनिया का मॉडल अनुकरणीय है, जहां संसद या किसी मंत्रालय की जगह कमीशन फॉर द प्रिवेंशन ऑफ करप्शन को लॉबीइंग नियमों के अनुपालन की निगरानी और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी दी गई है. इससे कमीशन लॉबीइंग नियमन के समूचे लक्ष्य पर निगरानी रख पाता है न कि उसे व्यवस्था के एक संकट के बतौर अलग से देखता है.
अंततः भारत में हो रही बहस को अमेरिका के लॉबीइंग के तरीकों पर केंद्रित नहीं होना चाहिए क्योंकि वह भारत के अनुकरण के लिए ठीक नहीं है. पहली बात तो यह है कि अमेरिका में हितधारी समूह विधेयकों और संशोधनों को प्रायोजित करवाने और कांग्रेस सदस्यों के वोट पर असर डालने के लिए उनके ऊपर तथा उनकी पार्टी के ऊपर भारी मात्रा में खर्च करते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस सदस्य निजी तौर पर नीति निर्माण के मामले में असरदार होते हैं और अपनी ही पार्टियों के खिलाफ वोट डालते हैं. भारत में संसदीय नीति निर्माण में यह तत्व शामिल नहीं है. भारतीय समूह जानते हैं कि एक सांसद निजी तौर पर नीतियां बनवाने में बहुत ताकत और दिलचस्पी नहीं रखता क्योंकि यहां अञ्च सर कानून बिना किसी बहस या कोरम के ही पास हो जाते हैं. इसीलिए यहां लॉबीइंग का निशाना पार्टी के नेता होते हैं और ऐसा नीति निर्माण के आरंभिक चरणों में किया जाता है. इसके अलावा, अमेरिकी अफसरशाहों से अलग भारत के अफसरशाहों के ऊपर दलगत दबाव बहुत ज्यादा होते हैं, जिसकी वजह से उनका पक्ष लॉबियों के चक्कर में बदलता रहता है. दूसरे, चूंकि अमेरिकी कानूनी तंत्र तीव्र और भ्रष्टाचार मुक्त है, लिहाजा कानून का उल्लंघन करते हुए पकड़े गए किसी भी लॉबीस्ट से पूरी उक्वमीद होती है कि वह कानूनी रूप से अनिवार्य दंड भरेगा. इसके मुकाबले भारत की अदालतों में कार्यबल की कमी है, उसके पास पैसे कम हैं और लंबित मुकदमों की संख्या बहुत ज्यादा है जबकि पुलिस तंत्र में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है.
तीसरी बात, अमेरिका में लॉबीइंग और राजनैतिक अनुदान से जुड़े डिसक्लोजर कानून मिलकर काम करते हैं और ऐसी लॉबीइंग पर निगरानी रखते हैं जो भ्रष्टाचार की सीमारेखा को पार करता हो, पर वहां भी अपने स्तर पर कुछ भ्रष्टाचार और समस्याएं तो मौजूद हैं ही. इसीलिए भारत को दूसरे विकासशील लोकतंत्रों में अपनाए मॉडल देखने चाहिए जहां समान राजनैतिक व्यवस्था और क्रियान्वयन की क्षमताएं मौजूद हैं.
लॉबीइंग से गंभीरतापूर्वक निबटने के लिए निर्णायक चीज राजनैतिक इच्छाशक्ति है. लॉबीइंग नियमन विधेयक प्राइवेट मेंबर बिल के तौर पर लाया गया था. यह तथ्य अपने आप में इस बात का गवाह है कि भारत में अब भी ऐसी राजनैतिक इच्छाशक्ति का पर्याप्त अभाव है क्योंकि भारतीय लोकतंत्र की जितनी उम्र है, उसके मुकाबले प्राइवेट मेंबर बिल की कामयाबियों को उंगलियों पर गिना जा सकता है.
(लेखिका पेन स्टेट यूनिवर्सिटी में राजनीतिशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

