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काले धन पर कुछ खरी-खरी

भारतीय रिजर्व बैंक हम सबको हर साल 1,25,000 डॉलर विदेश में रखने की इजाजत देता है. वह हमें विदेश में निवेश करने देता है; हमें बस अपने बैंक को बताना होता है. सो, काले धन का सहारा लेने की कोई जरूरत नहीं है.

अपडेटेड 4 नवंबर , 2014

काले धन के बारे में तथ्य भले बहुत ज्यादा उपलब्ध न हों लेकिन इसके बारे में हर किसी की कोई-न-कोई राय जरूर है. ज्यादातर लोगों की राय तो यही है कि काला धन बहुत बड़ी मात्रा में है. जो लोग मीडिया में काम करते हैं, उनके पास सफेद धन है. इसलिए प्रबल संभावना है कि वे इस राय को मान लेंगे. पर तर्क की बुनियाद पर यह राय कहां टिकती है?

काले धन की पारंपरिक परिभाषा कहती है कि यह वह आमदनी है जिस पर टैक्स अदा नहीं किया गया है. अगर इसे उपभोग की वस्तुओं पर खर्च कर दिया जाए, तो यह हमेशा के लिए हवा में गुम हो जाएगी. काले धन की खोज और पहचान तभी की जा सकती है जब उसे किसी स्थायी या टिकाऊ संपत्ति में लगाया जाए. खूब सारा पैसा बनाने वाले लोग मूर्ख नहीं हैं; वे आंशिक भुगतान सफेद धन से करेंगे, ताकि संपत्ति वैधानिक बन जाए. इसका मतलब है कि काले धन के ज्यादातर मामलों में कीमत कम बताई जाती है.

इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन से पहले शेयर बाजारों में नकद सौदे आम बात थे. आजकल वित्तीय परिसंपत्तियों में नकद लेन-देन करना ढेरों परेशानियों को दावत देना है. लिहाजा संभावना यही है कि भारत में काले धन का बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट सौदों में लगा हो. आम तौर पर कॉर्पोरेट कंपनियां और अमीर करदाता रियल एस्टेट के लिए भी सफेद धन से ही भुगतान करना पसंद करते हैं; और बिल्डर भी नई संपत्ति के लिए चेक से भुगतान लेने को सहर्ष तैयार हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें भी कई खर्च सफेद धन से करने होते हैं.

संभावना यही है कि ज्यादातर काले धन का इस्तेमाल संपत्ति की बाद में होने वाली खरीद-फरोख्त में होता हो. सरकार को जीडीपी का आधा फीसदी संपत्ति कर से मिलता है. यह काफी कम है —ब्रिक देशों में यह औसत 1.2 फीसदी और जी20 देशों में 1.9 फीसदी है. ऐसा इसलिए नहीं है कि भारत में संपत्ति की कीमतें कम हैं, या संपत्ति कर ज्यादा हैं. हिंदुस्तानी लोग संपत्ति की खरीद-फरोख्त भी खूब करते हैं—यह उनकी सबसे पसंदीदा टिकाऊ पूंजी है. लिहाजा संपत्ति की कीमत कम बताना आम बात है. दरअसल हम कह सकते हैं कि अपनी संपत्ति की कीमत कम बताना भारत में काले धन का सबसे आम तरीका है. यह इतना आम है कि इसे लेकर किसी को गुस्सा नहीं आता.
विदेशों में रखे काले धन पर उन्हें गुस्सा आता है क्योंकि इसे बेहद अमीर लेागों के एक बहुत छोटे-से वर्ग का विशेष अधिकार माना जाता है. काले धन के बारे में कई अनुमान लगाए गए हैं. पहली कोशिश 1985 में विश्व बैंक की वल्र्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट में की गई थी. हर देश की अपनी मुद्रा है. लिहाजा मुद्राओं के बीच विनिमय की उतनी ही संभावनाएं हैं जितनी कि करेंसी के पेयर हैं. कई दशकों से सरकारें भुगतान संतुलन को लेकर चिंतित रहा करती हैं, जो कि ऐसे लेन-देन के लेखे-जोखों का सार होता है. यही कारण है कि वे सोने या विदेशी मुद्राओं के भंडार अपने पास रखती हैं ताकि जरूरत पडऩे पर भुगतान संतुलन को अपने पक्ष में झुका सकें. कुछ औद्योगिक देश अब ऐसा नहीं करते, लेकिन भुगतान संतुलन के आंकड़ों का हिसाब-किताब वे अब भी रखते हैं.

अलबत्ता ये आंकड़े संतुलन के काम कभी नहीं आते. भुगतान संतुलन के सभी आंकड़ों में एक अवशेष प्रविष्टि होती है, जिसे भूल-चूक कहा जाता है. काले धन के शुरुआती झ्ंडाबरदारों ने मान लिया था कि काला धन इसी भूल-चूक से आता है. देशों की करेंसी पेयर के आंकड़े कभी एक समान नहीं होते. मिसाल के तौर पर बाल्तिस्तान का भारत से आयात और भारत से बाल्तिस्तान को निर्यात में फर्क है. काले धन के दूसरे झ्ंडाबरदारों ने मान लिया कि यह फर्क (देश के भीतर आने वाली मालभाड़े और बीमा सरीखी लागतों का समायोजन करने के बाद) बिलों में हेर-फेर की वजह से होता है और इसलिए यह काले धन का जनक है. प्रतिस्पर्धा और मौलिक तौर-तरीकों में अर्थशास्त्रियों का कोई जवाब नहीं. लिहाजा दूसरों ने अनुमान लगाने की नई तकनीकें ईजाद कर लीं. मिसाल के तौर पर, अगर देश के बाहर किए गए निवेश पर देश के भीतर आने वाले ब्याज की दरें कम हैं तो यह मान लिया गया कि जरूर कोई न कोई विदेश में ब्याज छिपा रहा होगा.
यह कहना मेरी नादानी होगी कि कोई भी चोरी-छिपे विदेशों में पैसा नहीं भेजता. जब तक सरकार सोने पर आयात शुल्क वसूल करती रहेगी, सोने की तस्करी बेहद फायदे का धंधा बनी रहेगी. 1980 के दशक में दाऊद इब्राहिम ऐंड कंपनी ने तस्करी के जो रास्ते बनाए थे, वे उद्यमियों के लिए आज भी खुले हैं.

लेकिन सोने की तस्करी की बात छोड़ भी दें, तो मुझे कोई कारण दिखाई नहीं देता कि अमीर हिंदुस्तानी हवाला की मदद लेना चाहेंगे. एक अमीर आदमी अपनी धन-दौलत को अपर्याप्त पूंजीगत लाभों में रखकर तमाम तरह के टैक्स से बच सकता है. और अगर वह पूंजीगत लाभ प्राप्त भी कर ले तो उसे केवल 10 फीसदी धनराशि चुकानी पड़ती है. अपना धन विदेशों में ले जाने के सीधे-सादे और जायज तरीके हैं.
भारतीय रिजर्व बैंक बगैर कोई सवाल पूछे हम सबको हर साल 1,25,000 डॉलर विदेश में रखने की इजाजत देता है. वह हमें विदेश में निवेश करने देता है; हमें बस इस बारे में अपने बैंक को बताना होता है. अगर यह भी काफी न हो, तो कोई विदेश में जो चाहे वह कर सकता है, बशर्ते वह भारत में एक वित्त वर्ष में 182 दिनों से ज्यादा न रहता हो.

अगर किसी को 'सामान्यत: निवासी नहीं' की तरह रहना पसंद न हो, तो सीमा पार बहुतेरे देश हैं जो अमीर हिंदुस्तानी को निवास की अनुमति या राष्ट्रीयता दे देंगे. सो काले धन का सहारा लेने की कोई जरूरत नहीं है. लेकिन किसी की सोच पर किसका वश है. अगर कोई यह मानना ही चाहता है कि अरबों-खरबों रु. छिपाकर विदेशों में रखे गए हैं, तो वह अपना मनमर्जी का आंकड़ा चुनने के लिए स्वतंत्र है.

अशोक वी. देसाई अर्थशास्त्री और वित्त मंत्रालय के पूर्व प्रधान सलाहकार हैं

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