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खुले में शौच के खिलाफ भारतीयों में चिढ़ तो जगे

लोग अगर चाहें तो शौचालय बनवा सकते हैं लेकिन एक हिचक यह है कि गड्ढा भरने के बाद वे क्या करेंगे.

अपडेटेड 13 अक्टूबर , 2014

भारत की आधे से भी ज्यादा आबादी खुले में शौच करती है और यहां के गांवों में यह संख्या करीब 70 फीसदी है. इसके विपरीत चीन में सिर्फ एक फीसदी, बांग्लादेश में 4 फीसदी और अफ्रीका के सहारा के दक्षिणी क्षेत्र में करीब एक चौथाई लोग खुले में शौच करते हैं. फिर भारत में यह संख्या इतनी ज्यादा क्यों है? गांव में खुले में शौच करने के कारण लोगों की मौत होती है, बीमारियां और कुपोषण फैलता है और आर्थिक उत्पादकता कम हो जाती है. इसलिए इस बात को समझ्ना बहुत जरूरी है कि भारत में खुले में शौच जाने का चलन इतना ज्यादा और व्यापक क्यों है.

पिछले एक साल से हम भारत के छह उत्तरी राज्यों के गांवों में घूम रहे हैं. हम लोगों की धारणाओं और मान्यताओं की छानबीन करने के इरादे से निकले एक शोध दल के साथ हैं. हम ये जानना चाहते हैं कि भारत के गांवों में इतने ज्यादा लोग खुले में शौच करने क्यों जाते हैं. इसका कारण जानकर आप हैरान रह जाएंगे.

बहुत से लोग मानते हैं कि खुले में शौच जाने का कारण गरीबी और शौचालयों की अनुपलब्धता नहीं है, जबकि पूरी दुनिया में गरीब देशों में प्रति व्यक्ति जीडीपी और खुले में शौच की दरों के बीच कोई गहरा और सीधा संबंध नहीं है. सचाई तो यह है कि भारत में हिंदुओं के मुकाबले मुसलमान शौचालय का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं, जबकि औसतन ज्यादा गरीब वही हैं. धन और शौचालय के इस्तेमाल के बीच कोई खास संबंध नहीं है क्योंकि बीमारियों को फैलने से रोकने में मददगार शौचालयों को बनाने का खर्च वास्तव में बहुत ज्यादा नहीं होता है. बांग्लादेश में गांवों के लोग सिर्फ दो-तीन हजार रु. में शौचालय बनाकर इस्तेमाल कर लेते हैं.

भारत में खुले में शौच जाने की वजह पानी की कमी भी नहीं है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत के करीब 90 फीसदी गांवों में  'बेहतर जल स्रोतÓ उपलब्ध है. इसके विपरीत अफ्रीका में सहारा के दक्षिण इलाके में आधी से कम ही आबादी को बेहतर जल स्रोत सुलभ है. फिर भी भारत की तुलना में वहां बहुत कम लोग खुले में शौच जाते हैं. आज की तारीख में दुनिया के सभी विकासशील हिस्सों में खुले में शौच जाना कोई बड़ी समस्या नहीं रह गई है. यह एक ऐसी समस्या है, जो आज भी सिर्फ भारत में इतने बड़े पैमाने पर मौजूद है. लेकिन इसकी वजह क्या हो सकती है?

भारत के गांवों में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के खुले में शौच करने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वे ऐसा करना चाहते हैं. हमने अलग-अलग गांवों में जिन भी पुरुषों और महिलाओं से बातचीत की, उन्हें खुले में शौच जाने के कई लाभ नजर आते हैं. उनकी नजर में खुले में शौच जाने के कारण सुबह जल्दी जागने की आदत पड़ती है, शरीर श्रम करता है और तंदुरुस्त रहता है. साथ ही  स्वस्थ ताजा हवा का फायदा भी मिलता है.

खुले में शौच के इन तमाम काल्पनिक फायदों से भी ज्यादा अहम तथ्य शायद यह है कि बहुत से लोग ऐसे साधारण शौचालय अपने घरों में बनवाना या इस्तेमाल करना पसंद नहीं करते, जो बीमारियों से बचा सकते हैं और जीवन की रक्षा कर सकते हैं. भारत में सरकारी शौचालय अफ्रीका के बेहद गरीब देशों और बांग्लादेश में निजी तौर पर बनाए जा रहे शौचालयों से महंगे हैं, फिर भी अवांछित और समाज में अस्वीकार्य हैं.

लेकिन ऐसे शौचालय समाज में अस्वीकार्य क्यों हैं? पहला कारण तो यह है कि बहुत से लोग मानते हैं कि घर के पास शौचालय बनवाने से प्रदूषण होगा. ठीक उसी तरह जैसे गांव में बहुत से लोग यह मानते हैं कि दलित के गिलास से पानी पीना दूषित है. दूसरे मल की सफाई का संबंध अस्पृश्यता से माना जाता है. इसलिए शौचालय के मालिकों को चिंता रहती है कि गड्ढा भरने के बाद उसे खाली कौन करेगा. हमने सर्वेक्षण के दौरान देखा कि निजी शौचालयों के गड्ढे का औसत आकार 240 घन फुट था, जो 6 व्यक्ïितयों के परिवार के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझए गए आकार से 4-5 गुना ज्यादा है. अन्य देशों में लोग हर पांच वर्ष के आसपास ये गड्ढे खाली करने या कराने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन भारत में गांव के लोग गड्ढा भरने पर उसकी सफाई कराने में आनाकानी करते हैं.

अपने अध्ययन से हमें समझ् में आया कि खुले में शौच बंद कराने के लिए हमें इन प्रचलित धारणाओं और मान्यताओं को बदलना होगा. सिर्फ शौचालय बना देने से खुले में शौच की समस्या समाप्त नहीं होगी. सर्वे में हमने यह भी देखा कि जिन लोगों के पास सरकारी शौचालय हैं, उनमें भी अधिकतर लोग इसका इस्तेमाल नहीं करते. जिन लोगों को सरकारी शौचालय नहीं मिले हैं, उनमें से बहुतों ने बताया कि वे उसका इस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि ऐसा करने से गड्ढे बहुत जल्दी भर जाएंगे. सच तो यह है कि गांवों में अधिकतर परिवार सामान्य गड्ढे वाले साधारण शौचालय खुद ही बनवा सकते हैं. इससे उनके जीवन की रक्षा होगी और बच्चे अधिक चुस्त-दुरुस्त होंगे. वे स्वस्थ होंगे और बड़े होकर ज्यादा उत्पादक भूमिका निभाने में सक्षम होंगे. लेकिन फिर भी वे शौचालय बनवाना नहीं चाहते.

(कोफी जनसांख्यिकी विशेषज्ञ और विकास अर्थशास्त्री हैं. वे विकासशील देशों में स्वास्थ्य, पोषण और नीति का अध्ययन करती हैं. स्पियर्स दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अतिथि अर्थशास्त्री हैं. उन्होंने रिसर्च इंस्टीटï्यूट ऑफ कंपैशनेट इकोनॉमिक्स के तहत स्क्वैट सैनिटेशन सर्वे कराने में मदद की )

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