हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा की समस्याओं से निबटने के तरीकों के बारे में मैं नई सरकार के लिए कुछ सुझाव दे रहा हूं. पहले पांच सुझावों को तो तुरंत लागू किया जा सकता है और सरकार उन्हें 100 दिन के भीतर दुरुस्त कर सकती है. बाकी पर अगले दो साल में अमल किया जा सकता है. उसके बाद सरकार आगे सुधार के लिए स्थिति पर विचार कर सकती है.
माताओं की मृत्यु दर (एमएमआर) और शिशु मृत्यु दर (आइएमआर) में कमी करने का संकल्प लें. कुल मिलाकर अगले पांच साल में इन दरों में 50 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य है.
मेडिकल एजुकेशन में बदलाव करें. इसके लिए सेबी जैसी नियामक संस्था बनाई जाए जिसके प्रतिनिधि गैर सरकारी संगठनों, प्रमुख डॉक्टरों, सामाजिक संगठनों, नर्सिंग और पैरामेडिकल संस्थाओं में से लिए जाएं. आज चिकित्सक समुदाय अपना महत्व बनाए रखने के लिए नर्सिंग और पैरामेडिकल एजुकेशन को दबा रहा है.
मेडिकल कॉलेजों में स्नातक (यूजी) और स्नातकोत्तर (पीजी) स्तर पर सीटें बराबर करें. इस समय देश में पीजी स्तर पर 12,500 सीटों की तुलना में यूजी स्तर पर करीब 50,000 सीटें हैं जबकि अमेरिका में पीजी स्तर पर 32,000 सीटों की तुलना में यूजी स्तर पर करीब 19,000 सीटें हैं. अधिक संख्या में विशेषज्ञ चिकित्सकों के बिना एमएमआर और आइएमआर में कमी नहीं की जा सकती.
उत्तर और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में हर जिले के सदर अस्पताल को मेडिकल स्कूल बनाएं. इसके लिए भारतीय चिकित्सा परिषद के नियमों में बदलाव करें.
नर्सों को करियर में आगे बढऩे की सुविधा दी जाए ताकि वे नर्स प्रैक्टिशनर, नर्स एनेस्थिसिस्ट और नर्स इंटेंसिविस्ट बन सकें. अन्यथा भारत में नॄसग का पेशा धीरे-धीरे मर जाएगा.
मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए पीजी की सीटें बढ़ाएं.
महाराष्ट्र के कॉलेज ऑफ फिजिशियंस ऐंड सर्जंस से डिप्लोमा/डिग्री को मान्यता दी जाए. पीजी डिग्री देने वाला यह विश्वविद्यालय सौ वर्ष से ज्यादा पुराना है.
एम्स और एमसीआइ की तरह राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीई) बनाएं जो नेशनल बोर्ड का डिप्लोमा दे और जिसे नए-नए कोर्स शुरू करने की आजादी हो.
अमेरिका और यूरोप के ज्यादातर देशों की तरह पेशे में गड़बड़ी पर मुआवजे की सीमा तय करें वर्ना बेहिसाब मुआवजा स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की लागत बढ़ाता रहेगा.
दवाइयां, सिर्फ एक बार इस्तेमाल होने वाली सामग्री, मेडिकल मशीनों, उपकरणों और इंप्लांट पर उत्पादन और बिक्री, दोनों स्तरों पर टैक्स हटा दें. स्वास्थ्य सेवाओं पर सिर्फ इनकम टैक्स लगना चाहिए.
स्वास्थ्य सेवा उद्योग को बुनियादी ढांचा क्षेत्र का दर्जा दें और अस्पतालों पर लागू बिजली की दरें उद्योगों के स्तर तक कम करें. अभी अस्पतालों को मनोरंजन सुविधाओं के बराबर माना जाता है और उन्हें सिनेमा घरों जितना बिजली शुल्क देना पड़ता है.
हर शहर में महत्वपूर्ण स्थानों पर 1-2 एकड़ जमीन अस्पतालों या मदद से जीवन जीने की सुविधा देने वाले केंद्रों के लिए निर्धारित करें.
पीजी सीटें बढ़ाकर विदेशी डॉक्टरों को उच्च शिक्षा की सुविधा दें. इससे दुनियाभर से समर्पित डॉक्टर अनुभव और प्रशिक्षण के लिए दूर-दराज के इलाकों में काम करने आएंगे और हमें कम लागत पर उनकी सेवाएं मिलेंगी.
क्लिनिकल परीक्षण फिर शुरू कराएं ताकि विदेशी कंपनियां परीक्षण करने आएं और उचित दिशा निर्देशों के साथ नियम तय करें.
मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, बंगलुरू आदि में प्रतिष्ठित सरकारी अस्पतालों में सभी प्रक्रियाओं की लागत तय कराने के लिए कोई बड़ी विदेशी सलाहकार कंपनी नियुक्त करें. स्वास्थ्य सेवा की लागत कम करने की बात सब करते हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि आज किसी सरकारी अस्पताल में बाइपास ग्राफ्टिंग या हिस्टिरेक्टोमी पर कितना खर्च आता है.
इस तरह निर्धारित लागत आकलन के आधार पर सरकार केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सेवा योजना के लिए शुल्क की दरें तय कर सकती है.
जवाबदेही के लिए हर सरकारी अस्पताल में मूल्य और सेवा देने की लागत का निर्धारण गतिविधि के आधार पर होना चाहिए ताकि समझ में आ सके कि करदाता का पैसा कैसे इस्तेमाल हो रहा है.
माइक्रो स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को सहारा देने के लिए आइआरडीए के तहत अलग नियामक संस्था बनाएं, जिस तरह कर्नाटक में यशस्विनी योजना है. मौजूदा नियम सिर्फ बड़ी निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के लिए उपयुक्त हैं जो अमीरों को पॉलिसी देती हैं.
वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य बीमा सब्सिडी दें.
स्नातक स्तर पर मेडिकल एजुकेशन की लागत घटाएं ताकि गरीब परिवारों के विद्यार्थी भी डॉक्टर बन सकें.
सरकारी बीमा का लाभ उठाने वाला हर मरीज उसकी किस्त देता है इसलिए उसे अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज कराने की अनुमति दें.
सभी बड़े मेडिकल जर्नल के साथ अनुबंध करें और हर भारतीय डॉक्टर तथा मेडिकल स्टुडेंट से कुछ मासिक/वार्षिक राशि लेकर उन्हें ये पत्रिकाएं उपलब्ध कराएं.
स्थानीय बायोमेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों को मिलने वाला दान इनकम टैक्स से मुक्त करें ताकि स्थानीय उत्पादन बढ़े और आयात कम हो.
सरकारी अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के पते और मोबाइल नंबर रखने का आदेश दें ताकि गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद उनकी निगरानी तथा देखभाल हो सके.
विकासशील देशों में स्वास्थ्य सेवाकर्मियों की जरूरत पूरी करने के लिए एक वैश्विक मेडिकल, नर्सिंग और पैरामेडिकल यूनिवर्सिटी बनाएं. इससे इन देशों में चीन के अरबों डॉलर के निवेश से ज्यादा सद्भाव भारत के लिए पैदा होगा.
इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड्स को प्रोत्साहन दें. ये सेवा देने वाली कंपनियों को टैक्स में छूट दें.
(देवी शेट्टी कार्डिएक सर्जन और फिलेंथ्रॉपिस्ट हैं)
मेडिकल एजुकेशन में बदलाव करें. इसके लिए सेबी जैसी नियामक संस्था बनाई जाए जिसके प्रतिनिधि गैर सरकारी संगठनों, प्रमुख डॉक्टरों, सामाजिक संगठनों, नर्सिंग और पैरामेडिकल संस्थाओं में से लिए जाएं. आज चिकित्सक समुदाय अपना महत्व बनाए रखने के लिए नर्सिंग और पैरामेडिकल एजुकेशन को दबा रहा है.
मेडिकल कॉलेजों में स्नातक (यूजी) और स्नातकोत्तर (पीजी) स्तर पर सीटें बराबर करें. इस समय देश में पीजी स्तर पर 12,500 सीटों की तुलना में यूजी स्तर पर करीब 50,000 सीटें हैं जबकि अमेरिका में पीजी स्तर पर 32,000 सीटों की तुलना में यूजी स्तर पर करीब 19,000 सीटें हैं. अधिक संख्या में विशेषज्ञ चिकित्सकों के बिना एमएमआर और आइएमआर में कमी नहीं की जा सकती.
उत्तर और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में हर जिले के सदर अस्पताल को मेडिकल स्कूल बनाएं. इसके लिए भारतीय चिकित्सा परिषद के नियमों में बदलाव करें.
नर्सों को करियर में आगे बढऩे की सुविधा दी जाए ताकि वे नर्स प्रैक्टिशनर, नर्स एनेस्थिसिस्ट और नर्स इंटेंसिविस्ट बन सकें. अन्यथा भारत में नॄसग का पेशा धीरे-धीरे मर जाएगा.
मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए पीजी की सीटें बढ़ाएं.
महाराष्ट्र के कॉलेज ऑफ फिजिशियंस ऐंड सर्जंस से डिप्लोमा/डिग्री को मान्यता दी जाए. पीजी डिग्री देने वाला यह विश्वविद्यालय सौ वर्ष से ज्यादा पुराना है.
एम्स और एमसीआइ की तरह राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीई) बनाएं जो नेशनल बोर्ड का डिप्लोमा दे और जिसे नए-नए कोर्स शुरू करने की आजादी हो.
अमेरिका और यूरोप के ज्यादातर देशों की तरह पेशे में गड़बड़ी पर मुआवजे की सीमा तय करें वर्ना बेहिसाब मुआवजा स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की लागत बढ़ाता रहेगा.
दवाइयां, सिर्फ एक बार इस्तेमाल होने वाली सामग्री, मेडिकल मशीनों, उपकरणों और इंप्लांट पर उत्पादन और बिक्री, दोनों स्तरों पर टैक्स हटा दें. स्वास्थ्य सेवाओं पर सिर्फ इनकम टैक्स लगना चाहिए.
स्वास्थ्य सेवा उद्योग को बुनियादी ढांचा क्षेत्र का दर्जा दें और अस्पतालों पर लागू बिजली की दरें उद्योगों के स्तर तक कम करें. अभी अस्पतालों को मनोरंजन सुविधाओं के बराबर माना जाता है और उन्हें सिनेमा घरों जितना बिजली शुल्क देना पड़ता है.
हर शहर में महत्वपूर्ण स्थानों पर 1-2 एकड़ जमीन अस्पतालों या मदद से जीवन जीने की सुविधा देने वाले केंद्रों के लिए निर्धारित करें.
पीजी सीटें बढ़ाकर विदेशी डॉक्टरों को उच्च शिक्षा की सुविधा दें. इससे दुनियाभर से समर्पित डॉक्टर अनुभव और प्रशिक्षण के लिए दूर-दराज के इलाकों में काम करने आएंगे और हमें कम लागत पर उनकी सेवाएं मिलेंगी.
क्लिनिकल परीक्षण फिर शुरू कराएं ताकि विदेशी कंपनियां परीक्षण करने आएं और उचित दिशा निर्देशों के साथ नियम तय करें.
मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, बंगलुरू आदि में प्रतिष्ठित सरकारी अस्पतालों में सभी प्रक्रियाओं की लागत तय कराने के लिए कोई बड़ी विदेशी सलाहकार कंपनी नियुक्त करें. स्वास्थ्य सेवा की लागत कम करने की बात सब करते हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि आज किसी सरकारी अस्पताल में बाइपास ग्राफ्टिंग या हिस्टिरेक्टोमी पर कितना खर्च आता है.
इस तरह निर्धारित लागत आकलन के आधार पर सरकार केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सेवा योजना के लिए शुल्क की दरें तय कर सकती है.
जवाबदेही के लिए हर सरकारी अस्पताल में मूल्य और सेवा देने की लागत का निर्धारण गतिविधि के आधार पर होना चाहिए ताकि समझ में आ सके कि करदाता का पैसा कैसे इस्तेमाल हो रहा है.
माइक्रो स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को सहारा देने के लिए आइआरडीए के तहत अलग नियामक संस्था बनाएं, जिस तरह कर्नाटक में यशस्विनी योजना है. मौजूदा नियम सिर्फ बड़ी निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के लिए उपयुक्त हैं जो अमीरों को पॉलिसी देती हैं.
वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य बीमा सब्सिडी दें.
स्नातक स्तर पर मेडिकल एजुकेशन की लागत घटाएं ताकि गरीब परिवारों के विद्यार्थी भी डॉक्टर बन सकें.
सरकारी बीमा का लाभ उठाने वाला हर मरीज उसकी किस्त देता है इसलिए उसे अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज कराने की अनुमति दें.
सभी बड़े मेडिकल जर्नल के साथ अनुबंध करें और हर भारतीय डॉक्टर तथा मेडिकल स्टुडेंट से कुछ मासिक/वार्षिक राशि लेकर उन्हें ये पत्रिकाएं उपलब्ध कराएं.
स्थानीय बायोमेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों को मिलने वाला दान इनकम टैक्स से मुक्त करें ताकि स्थानीय उत्पादन बढ़े और आयात कम हो.
सरकारी अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के पते और मोबाइल नंबर रखने का आदेश दें ताकि गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद उनकी निगरानी तथा देखभाल हो सके.
विकासशील देशों में स्वास्थ्य सेवाकर्मियों की जरूरत पूरी करने के लिए एक वैश्विक मेडिकल, नर्सिंग और पैरामेडिकल यूनिवर्सिटी बनाएं. इससे इन देशों में चीन के अरबों डॉलर के निवेश से ज्यादा सद्भाव भारत के लिए पैदा होगा.
इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड्स को प्रोत्साहन दें. ये सेवा देने वाली कंपनियों को टैक्स में छूट दें.
(देवी शेट्टी कार्डिएक सर्जन और फिलेंथ्रॉपिस्ट हैं)

