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कार्यपालिका में क्रांति की राह

सरकारी विभागों में कैलेंडर देखकर नहीं, बल्कि कार्यकुशलता के आधार पर अधिकारियों की पदोन्नति की व्यवस्था होनी चाहिए.

अपडेटेड 2 जून , 2014
प्रशासनिक सुधार ऐसा नाजुक मसला है, जिसे लेकर शोर-शराबा तो बहुत होता है लेकिन पिछले 66 साल में किसी ने इस दिशा में गंभीरता से काम नहीं किया. हर बार यही हुआ कि यथास्थिति अपना ली गई. विभिन्न सुधार समितियों ने बदलाव के लिए जो भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, उन पर अमल का काम सतही रहा है.

इन सुझावों पर अमल भी इस तरह से किया गया, जिससे सत्ता-प्रतिष्ठान को खरोंच भी नहीं आई. नई सरकार में इस परंपरा में भारी बदलाव करना ही होगा. नौकरशाही के समूचे तंत्र को बदलना होगा. नौकरशाही के बुनियादी ढांचे से लेकर प्रक्रिया और कर्मियों तक, चौतरफा बदलाव की यह कोशिश दिखाई देनी चाहिए.

चाहे स्थायी हो या राजनैतिक, कार्यपालिका अकसर न्यायपालिका पर उसके अधिकार क्षेत्र में दखलअंदाजी का आरोप लगाती है. लेकिन यह जिम्मेदारी नहीं लेती कि उसने अपनी नाकामी से न्यायपालिका को ऐसा मौका दिया है. ऐसा लगता है कि नौकरशाह किसी पुरातन युग में जी रहे हैं और बदलती दुनिया की सच्चाई को समझ पाने में अक्षम हैं. कमजोर प्रशासन के लिए नौकरशाहों से ज्यादा राजनेताओं को दोष दिया जाता है, जबकि असल में दोष तो नौकरशाहों का है.

सैद्धांतिक तौर पर नौकरशाहों को राजनैतिक व्यवस्था के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए पर शायद ही कभी ऐसा होता है. मेरे विचार में एक सिविल सर्विसेज बोर्ड को सभी नौकरशाहों के कामकाज पर नजर रखनी चाहिए. उनके फैसलों की नियमित समीक्षा करने के साथ-साथ उन्हें उनके लिए जवाबदेह भी ठहराया जाना चाहिए.

एक स्वतंत्र बोर्ड को कर्मचारियों के तबादले, नियुक्ति, कार्यकाल और कार्मिकों से जुड़े सभी मामलों में पेशेवर नजरिए के साथ पारदर्शिता और निष्पक्षता का ध्यान रखना चाहिए. इस बोर्ड में सिर्फ  सेवानिवृत्त सरकारी अफसरों को रखने की बजाए न्यायपालिका और समाज के विभिन्न वर्गों को भी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.

विशेषज्ञों की नियुक्ति पर भी जोर देने की आवश्यकता है. किसी भी अधिकारी को अपने कार्यकाल में कभी-न-कभी बुनियादी ढांचा, परिवहन, वाणिज्य या वित्त जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता की ओर जरूर ध्यान देना चाहिए.

बदलाव के मामले में अकसर बुनियादी ढांचे में सुधार की बात आसानी से समझ में नहीं आती. उन सुधारों पर परिचर्चा में कोई रास्ता निकालने की बजाए तीखी बहसें और गर्मागर्मी ज्यादा होती है. हमें नौकरशाही के इन ढांचों को बदलते वक्त और जरूरतों के अनुरूप ढालना होगा. केंद्र सरकार के कामकाज को तर्कसंगत बनाना प्रशासनिक सुधार की बुनियादी शर्त है. अर्थ खो चुके कुछ मंत्रालयों को समाप्त करने की संभावना पर भी गंभीरता से विचार करना जरूरी है.

कई विशेषज्ञ यह बता चुके हैं कि जब स्वतंत्र प्रसार भारती बोर्ड से काम चल सकता है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय रखना बेमानी है. जिस तरह कॉर्पोरेट जगत में विलय असरदार साबित हुआ है, ठीक उसी तरह सरकार में भी यह कमाल कर सकता है. आज हमारे यहां ऊर्जा के क्षेत्र में बिजली, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, अक्षय ऊर्जा और कोयला नाम से चार अलग-अलग मंत्रालय हैं. पूरी ऊर्जा सुरक्षा को एक ही नजर से देखने के लिए यह जरूरी है कि इन सबको एक ही ऊर्जा मंत्रालय में विलीन कर दिया जाए, जैसा कि दुनिया की अधिक प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाओं में होता है.

1975 में एक इंटीग्रेटेड फाइनेंस यूनिट (आइएफयू) का गठन हुआ था ताकि वित्त मंत्रालय का नियंत्रण कम किए बिना प्रशासनिक मंत्रालयों में वित्तीय अनुमति की प्रक्रिया को तेज और चुस्त किया जा सके. पर्यावरण और वन संबंधी मामलों में तेजी से मंजूरी के लिए इसी तरह की व्यवस्था जरूरी है क्योंकि यह मंजूरी आर्थिक वृद्धि की राह में सबसे बड़ी रुकावट बन गई है.

बुनियादी ढांचागत सुविधाओं से संबद्ध मंत्रालयों में आइएफयू की तरह इंटीग्रेटेड एन्वायरनमेंट ऐंड फॉरेस्ट यूनिट का गठन होना चाहिए. इसमें भारतीय वन सेवा के विशेषज्ञ अधिकारी तैनात किए जाएं और पर्यावरण तथा वानिकी सलाहकार भी शामिल हों. ये अधिकारी अपने प्रशासनिक मंत्रालय और पर्यावरण तथा वन मंत्रालय, दोनों के अधीन काम कर सकते हैं. इससे बिना विलंब के परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी मिलने में बहुत मदद होगी.

प्रक्रिया और ढांचे, दोनों को बचाने के लिए कार्मिक सुधार जरूरी है. किसी भी स्तर पर प्रवेश को सरकार के भीतर अधिक महत्व और स्वीकार्यता मिलनी जरूरी है. जिस तरह न्यायपालिका हर साल आत्ममंथन करती है और मजिस्ट्रेटों और जजों को हटा देती है, उसी तरह नौकरशाही में भी सभी स्तरों पर अकुशल अधिकारियों को नियमित रूप से निकालते रहना चाहिए.

यह काम स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की तरह गोल्डन हैंडशेक के रूप में हो सकता है पर हर वर्ष यह होना अनिवार्य है. कैलेंडर देखकर नहीं, बल्कि कार्यकुशलता के आधार पर अधिकारियों की पदोन्नति की व्यवस्था होनी चाहिए. सरकारी विभागों में संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के पदों पर नियुक्ति के लिए लिखित और व्यक्तित्व परीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए. नौकरशाही को चुस्त बनाने वाले नियमों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए.

अंत में यह कहा जा सकता है कि यथास्थिति बनाए रखने में नौकरशाही का निहित स्वार्थ भले ही हो, राजनैतिक नेतृत्व के लिए पूरे तंत्र में बदलाव जरूरी है, ताकि चुनावी वायदे पूरे किए जा सकें. राजनैतिक स्तर पर दृढ़ इच्छाशक्ति से निराशा के दलदल में डूबी नौकरशाही में विश्वास जगाया जा सकता है. भले इस निराशा के लिए वह खुद पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हैं. यश और कीर्ति के दिन लौटाने की यह राह कठिन है और सबसे दृढ़ नेतृत्व ही देश को इस पर चला सकता है.

(लेखक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव हैं)
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