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नए रिश्तों पर पडऩे न पाए नफरत के सौदागरों का साया

पाकिस्तान के साथ रिश्तों में शांति रहेगी तो नरेंद्र मोदी अपने विकास के एजेंडे पर अमल कर सकेंगे. मोदी के तरकश में सोची-समझी पाकिस्तानी नीति होनी चाहिए.

अपडेटेड 2 जून , 2014
पाकिस्तान के पड़ोस में जबरदस्त राजनैतिक उलट-फेर हो रहा है. भारत के मतदाताओं ने बड़ी तादाद में खानदानी शासन की बजाए मजबूत नेतृत्व, सरकारी मेहरबानी की जगह नौकरी और भारत के विविध समुदायों को तुष्ट करने और लुभाने की नीति की जगह सुशासन के हक में वोट दिया है. ये सभी विकल्प मोदीनॉमिक्स के लोकलुभावन नारे और भ्रष्टाचार मुक्त प्रगतिशील भारत के वादे के रथ पर सवार रहे हैं.

कुछ कर दिखाने की क्षमता को चुनने की यह प्रवृत्ति मई, 2013 में भी सामने आई थी, जब पाकिस्तान के मतदाताओं ने नई सरकार चुनी थी और भारत की ही तरह पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को ठुकराकर विकास के लिए ज्यादा अनुकूल नवाज शरीफ को चुना था. कुल मिलाकर यह इस क्षेत्र के लिए अच्छा शगुन है कि मतदाता समझदार हो रहा है और अतीत से कटी हुई युवा आबादी बेहतर जिंदगी पाने को बेताब है.

दक्षिणपंथ की तरफ भारत का झुकाव भी पाकिस्तान से कुछ अलग नहीं है. 2013 के चुनाव में जीती पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान के नेतृत्व में उभरी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी का दुनिया का नजरिया भी दक्षिणपंथी है. अब दोनों देशों को अल्पसंख्यकों के मुद्दे से निबटना होगा. पाकिस्तान में मामूली-सी गैर-मुस्लिम आबादी और शिया अल्पसंख्यक आबादी पर हमले हो रहे हैं. 2014 के चुनाव के बाद भारत की संसद में मुस्लिम सांसदों की संख्या सबसे कम है.

राजनीति और धर्म की इस जबरदस्त पहचान से एक शताब्दी पहले शुरू हुई राजनैतिक प्रक्रिया की परिणिति वहां हुई, जहां राजनीति में धर्म का समावेश हुआ और आस्था राजनैतिक विचारधारा का एक अंग बन गई. इसलिए पाकिस्तान में बहुत-से लोग, खासकर धुर दक्षिणपंथी तत्व मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने पर चुपचाप खुशी मना रहे हैं. मोदी हिंदुत्व की देन होने के साथ-साथ उसका आधुनिक चेहरा भी हैं.

इससे पाकिस्तान के अस्तित्व का औचित्य सिद्ध हो जाता है. सचाई भले ही इस सरल व्याख्या से बहुत दूर हो, लेकिन धारणाओं को हवा देने और उनका फायदा उठाने की ही कला का नाम राजनीति है. मिसाल के तौर पर पाकिस्तान में प्रमुख भारत विरोधी स्वर जमात-उद-दावा के हाफिज मोहम्मद सईद का कहना था कि भारत के चुनाव में बीजेपी की जीत ने ‘‘भारतीय धर्मनिरपेक्षता की पोल खोल दी है.’’

हम में से बहुत-से लोग अपने बड़़े और थोड़े टेढ़े पड़ोसी के साथ अधिक सामान्य और परिपक्व संबंध चाहते हैं. ऐसे लोगों को सावधान करते हुए सईद ने कहा कि दोस्ती (मानो मौजूद हो) को अब जारी नहीं रखा जा सकता. सईद जैसे बहुत से लोगों का मानना है कि भारत में चुनाव पाकिस्तान और इस्लाम विरोधी भावनाओं पर लड़ा गया. हालांकि यह अतिशयोक्ति है, फिर भी मोदी ने गुजरात के छोटे-से मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग के साथ जैसा बेरहम बर्ताव किया है, उससे पाकिस्तानी जनमत में ऐसे विचारों को ताकत मिलती है.

दक्षिण से हटकर मध्य के रास्ते पर आएं तो संसद की रक्षा समिति के अध्यक्ष सीनेटर मुशाहिद हुसैन जैसे आशावादी अधिक उत्साहित हैं. भारतीय चुनाव पर राय देते हुए उन्होंने कहा कि मोदी अपने आर्थिक एजेंडे से संचालित होंगे और उम्मीद है कि अटल बिहारी वाजपेयी की कार्यशैली से प्रेरणा लेंगे. पाकिस्तान के अधिकतर विश्लेषक और राजनैतिक दल भी शायद यही मानते हैं.

प्रधानमंत्री वाजपेयी ने बस से पाकिस्तान आकर जो पहल की थी और 1940 के लाहौर प्रस्ताव के स्मारक पर जाने के लिए जो विशेष प्रयास किया था, उसकी दोनों देशों के संबंधों पर छाप अमिट है. शरीफ और परवेज मुशर्रफ दोनों ने वाजपेयी के साथ संबंध रखे थे और इस क्षेत्र के साथ संवाद रखने का उनका निक्सन जैसा नजरिया भारत के नए प्रधानमंत्री के लिए ऐसी विरासत है, जिसे देश की विदेश नीति बनाते समय याद रखना फायदेमंद साबित होगा.

नई सरकार के साथ पाकिस्तान के संबंध इस बात पर निर्भर हैं कि मोदी देश में कौन-सा रास्ता अपनाते हैं. अगर मोदी आर्थिक वृद्धि, व्यापार और संपन्नता के अपने बहुत से वादे पूरे करने वाले हैं तो इस क्षेत्र में शांति भारत के सबसे अधिक हित में होगी. इसके विपरीत यदि बहुत कम प्रचारित लेकिन हर जगह मौजूद अतिराष्ट्रवाद और मर्दानगी दिखाने के रास्ते को चुना गया, तो पाकिस्तान को फिक्र करनी चाहिए.

जानकारों ने पाकिस्तान की तरफ रणनीतिक दृष्टि से बेरुखी अपनाने की सलाह दी होगी. फिर भी नई सरकार के लिए एक पाकिस्तान नीति बनाना बेहद जरूरी है. अब तक यह नीति आतंकी घटनाओं पर जल्दबाज प्रतिक्रिया से लेकर पुरानी पीढ़ी के राजनेताओं की खट्टी-मीठी यादों से जुड़े अपनेपन के बीच झूलती रही है.

26 नवंबर को मुंबई में हुए हमलों के बारे में मीडिया से संचालित जनता की याददाश्त आज भी आम जनमत पर हावी है. ऐसा नहीं है कि इस घटना को भुला दिया जाना चाहिए, क्योंकि आतंक की कोई भी घटना अस्वीकार्य है, लेकिन राजनयिक विकल्पों को सीमित करना, खासकर उस देश के लिए कतई अक्लमंदी नहीं है, जो क्षेत्रीय नेतृत्व की आकांक्षा रखता हो.

अगर भारतीय मीडिया के संकेत सच हैं, तो मोदी देश की विदेश और सुरक्षा नीतियों को बदलने वाले हैं. अगर वे बीजेपी के घोषणा पत्र को सरकार की नीतियों में शामिल करने की भी कोशिश करने वाले हैं, तो भारत-पाक संबंधों में जबरदस्त होड़ का दौर शुरू होने वाला है. इसकी शुरुआत सबसे पहले अफगानिस्तान में दिखाई देगी. बहुत-से लोगों को डर है कि अगर दोनों देश संवाद के महत्व से इनकार करते रहे, तो भारत और पाकिस्तान के बीच छद्म युद्ध और तेज हो सकता है.

दिल्ली में बैठे आक्रामक सोच वाले लोग मोदी पर पाकिस्तान की तरफ से ताकत के असमान प्रदर्शन का जवाब देने की आक्रामक नीति अपनाने के लिए दबाव डाल सकते हैं. ऐसा हुआ, तो पाकिस्तान, खासकर उसके सुरक्षा प्रतिष्ठान के तेवर भी और गरम हो जाएंगे. उम्मीद करते हैं कि ऐसी स्थिति पैदा नहीं होगी. पाकिस्तान के रणनीतिक विचारकों में से एक वर्ग को चिंता है कि बीजेपी ने हमेशा भारतीय सेना में निवेश किया है और उसे आधुनिक बनाने की कोशिश की है. इससे भी पाकिस्तानी सतर्क होंगे.

भारतीय सेना की पाकिस्तान की परमाणु शक्ति के दायरे से नीचे पारंपरिक युद्ध जारी रखने की नीति का पाकिस्तान पहले से ही जवाब दे रहा है. जब दोनों देशों के नेता विकास, नौकरी और बुलेट ट्रेन के सपने दिखा रहे हैं, तो हथियारों की होड़ की दोनों को ही जरूरत नहीं है. भारत और पाकिस्तान के संबंधों को नौकरशाही के जाल और सेना के गुणा-भाग, दोनों से मुक्त करने की जरूरत है और उन्हें आपसी आर्थिक सहयोग पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जिससे धीरे-धीरे विश्वास पैदा हो सके. क्या मोदी यह रास्ता चुनने को तैयार होंगे? यह तो वक्त ही बताएगा.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने मोदी को बधाई दी है और अपने यहां आने का न्यौता दिया है. देश के प्रशासनिक प्रतिष्ठान में बहुत से लोगों का मानना है कि पाकिस्तान मोदी के साथ काम कर सकता है. ऐसी खबरें भी हैं कि हाल के महीनों में पर्दे के पीछे संपर्क हुए हैं. पर जब भारत का सुरक्षा प्रतिष्ठान, मीडिया के कुछ हिस्से और बीजेपी के कार्यकर्ता पाकिस्तान को सिर्फ आतंकवाद के नजरिए से देखते हैं, तो क्या मोदी उसके साथ बेहतर संबंध रखना चाहेंगे?  उससे भी बड़ा सवाल यह है कि सत्ता के व्यवहार और नीति निर्धारण पर बीजेपी की विचारधारा का असर किस हद तक होगा?

मोदी और उनके साथी चाहे कोई भी रास्ता चुनें, उन्हें वाजपेयी की यह भावपूर्ण कविता याद रखनी चाहिए, ‘‘अब जंग न होने देंगे.’’ दोस्ती भले ही कोसों दूर हो, लेकिन भारत और पाकिस्तान की जनता को अपने नेताओं से परिपक्व संवाद की अपेक्षा करने का हक तो जरूर है. पाकिस्तान में प्रधानंमत्री नवाज शरीफ धीरे-धीरे लेकिन लगातार भारत के प्रति नीति अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों पक्ष वैचारिक स्तर पर चाहे जो भी रुख अपनाएं, पर्दे के पीछे संवाद सहित आपसी राजनय जारी रहना चाहिए.

भारत में मोदी का उदय संभावनाओं से भरा हुआ है. उनके तरकश में सोची-समझी पाकिस्तानी नीति होनी चाहिए और पाकिस्तान की असैनिक सरकार के साथ बातचीत फलदायी होगी. पिछले वर्ष दिसंबर में सैन्य संचालन महानिदेशकों की बैठक से प्रेरणा लेते हुए सेना के बीच संपर्क भी बेहतर होना चाहिए. पाकिस्तान में इस बात पर आम सहमति है कि रिश्ते सामान्य हों और व्यापार बढ़े. बीजेपी सरकार के लिए चुनौती नीति को बदलने और आपसी संबंधों को नया रूप देने के बेहतर रास्ते तलाशने की हो सकती है.
 
(रज़ा रूमी द फ्राइडे टाइम्स पाकिस्तान के सलाहकार संपादक और दिल्ली बाइ हार्टः इंप्रेशंस ऑफ अ पाकिस्तानी ट्रैवलर के लेखक हैं)
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