पारंपरिक सोच यह है कि अपने पहले कार्यकाल में यूपीए ने कामयाबी से सरकार चलाई इसलिए दोबारा सरकार चलाने का उसे बेहतर जनादेश मिला. दूसरी पारी में उसने अहंकार, भ्रष्टाचार, आत्ममुग्धता और आलस्य के चलते पहली पारी में बनी अच्छी छवि को मटियामेट कर डाला. इसी का नतीजा है कि यूपीए-2 आज लगातार एक के बाद एक संकट से जूझ रहा है.
दूसरी पारी में यूपीए के प्रदर्शन का बचाव करना वास्तव में मुश्किल है. लेकिन पहली पारी को लेकर बरती जाने वाली नरमी का हमें दोबारा आकलन कर लेना चाहिए. आज सरकार जो भी दिक्कतें झेल रही है, अधिकतर की जड़ें उसके पहले कार्यकाल से जुड़ी हैं. अपनी पहली पारी में यूपीए ने विशेष तौर से तीन अहम गलतियां की थीं.
पहली गलती आर्थिक सुधारों की परिभाषा को बेहद संकरा रखने की थी. मनमोहन सिंह ने मान लिया कि सुधारों का मतलब भारत को पश्चिम के करीब ले जाना और विदेशी निवेश के मानकों को लचीला बनाना है. पहली पारी में इन उद्देश्यों का कुछ अर्थ निकल सकता था लेकिन यूपीए सरकार चूंकि वाम दलों के समर्थन पर टिकी थी इसलिए इन्हें नाकाम रहना ही था. इसीलिए प्रधानमंत्री जब इस एजेंडे को पारित नहीं करवा सके तो उन्होंने कमोबेश सुधारों को भुला देना ही बेहतर समझा.
इनके अलावा भी भारत को कुछ गैर-आर्थिक सुधारों की भी सख्त जरूरत थी और इन्हें हरेक दल से समर्थन मिलना ही था. हम सभी इस पर सहमत हैं कि न सही ढंग से ट्रेंड है, न ही उनकी संख्या पर्याप्त है. जिन सुधारों की जरूरत थी उन्हें एक के बाद एक पुलिस आयोग की रपटों में गिनवाया जा चुका है. बस यूपीए को इन सिफारिशों को लागू करना था.
यह बात भी सबको मालूम है कि हमारे यहां अपराधियों को कानून का डर इसलिए नहीं रहता क्योंकि हमारी न्याय व्यवस्था चरमरा रही है. सुनवाई के चरण तक आने में मुकदमों को बरसों लग जाते हैं और अपराधी जमानत लेकर दोबारा अपराध करके घूमते हैं. आखिरकार सुनवाई होती भी है तब तक जांच अधिकारियों का तबादला हो चुका होता है, सबूत नष्ट कर दिए गए होते हैं और गवाहों को डराया-धमकाया जा चुका होता है. इस संकट का समाधान तो बिलकुल सामने दिखता है: ज्यादा अदालतें बनाइए और ज्यादा जजों की नियुक्ति करिए. इसके बावजूद यूपीए ने इस दिशा में कुछ नहीं किया है.
आज, जब बलात्कारी, बच्चों और महिलाओं का शिकार करते खुलेआम घूम रहे हैं और जनता पुलिस से भी उतनी ही डरी हुई है जितनी अपराधियों से, तो ऐसे में भारत दरअसल जरूरी सुधारों को लागू करने में यूपीए सरकार की नाकामी की ही कीमत चुका रहा है. जो प्रदर्शनकारी सड़कों पर नारे लगा रहे हैं, वे दरअसल आम आदमी के मौलिक अधिकार की ही तो मांग कर रहे हैंरू सुरक्षा का अधिकार. एक आम भारतीय के लिए वालमार्ट में खरीदारी करने के मौके से कहीं ज्यादा अहम सुरक्षा का मामला है.
यूपीए की दूसरी गलती राष्ट्रीय संसाधनों के आवंटन से नजर फेर लेना था जो उसकी पहुंच के भीतर था. हर किसी को यह बात पता थी कि डीएमके टेलीकॉम लाइसेंस से अरबों बना रहा है. यूपीए के शुरुआती दिनों में कोयला घोटाले के बारे में हर कोई जानता था.
सरकार को नीलामी और आवंटन की पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी जिससे अपना मुनाफा बनाने के लिए व्यवस्था को तोडऩा-मरोडऩा नेताओं के लिए मुश्किल हो जाता. इसके लिए पश्चिमी देशों में वैश्विक मानक लागू होते हैं जिन्हें आसानी से अपनाया जा सकता था. सरकार ने ऐसा किया होता तो कुछ घोटालों जो यूपीए-1 में हुए और आज यूपीए-2 को झकझोर रहे हैं, उनसे बचा जा सकता था.
सवाल यह है कि यूपीए ने प्रक्रिया को पारदर्शी क्यों नहीं बनाया? इसलिए क्योंकि वह अपने साथियों को कमाने का मौका देने के अधिकार को अपने हाथ से ऐसे ही नहीं जाने देना चाहता था और यह मानता था कि डीएमके जैसे साझीदारों को उनकी वफादारी के बदले कमाने का मौका मिलना चाहिए.
सरकार के लिए उसकी तीसरी गलती सबसे खतरनाक साबित हुई है. यूपीए के राज वाले पिछले नौ साल के दौरान मध्यवर्ग के उभार ने देश को बदल डाला है. वे दिन लद गए जब नेता हत्याएं करके बच जाया करते थे. मध्यवर्ग अब इतना जागरूक हो गया है कि हर चीज जांच के दायरे में आ गई है और जनता का आक्रोश कहीं ज्यादा रौद्र रूप लेने लगा है.
आज भी मोटे तौर पर उतने ही अखबार और टीवी चैनल हैं जितने यूपीए की पहली पारी में थे, लेकिन नेताओं के प्रति जिस तरह मीडिया का व्यवहार बदला है वह हमेशा से अकल्पनीय था. अब पुराने जमाने वाली मर्यादाएं नहीं रहीं, जवाबदेही की मांग बढ़ी है और सोशल मीडिया के आक्रमण ने मुख्यधारा के मीडिया को और ज्यादा आक्रामक बनने पर मजबूर किया है. विडंबना यह है कि ये 1991 की मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियां ही थीं जिन्होंने सीधे तौर पर इतना आग्रही मध्यवर्ग पैदा करने का काम किया है. बावजूद इसके न तो मनमोहन सिंह और न ही उनकी पार्टी ने इस बात को समझा कि भारत कितनी तेजी से बदल रहा है या इन बदलावों के अनुकूल बनने के लिए नेताओं को क्या करना होगा.
आज जब वे इस नए भारत के साथ कदमताल करने को जूझ रहे हैं, ऐसा लग रहा है गोया वे अनाड़ी लोगों का कोई समूह हो जो घड़ी के कांटों को जबरन पीछे घुमाने की कोशिश में लगा है.
लेखक स्तंभकार और टीवी एंकर हैं.

