भारत में सियासी चर्चाओं-परिचर्चाओं के दौरान अतिरंजना वाले कुछ शब्द बड़ी उदारता के साथ फेंटे जाने लगे हैं. इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है, अप्रत्याशित या ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. बड़ी ही बेरहमी के साथ इसका इस्तेमाल किया जाता है.
दिल्ली में योजना आयोग के बाहर ममता बनर्जी और उनके वित्त मंत्री अमित मित्रा के साथ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बदसलूकी की. प्रतिक्रिया में पश्चिम बंगाल में हिंसा भड़क उठी. तय था कि यह मामला बुरी तरह से बिगड़ेगा और ऐसा हुआ भी. इसकी चिंगारी उड़ी थी पुलिस हिरासत में हुई वामपंथी छात्र कार्यकर्ता की दुखद मौत से. लेकिन पश्चिम बंगाल में फैली इस अराजकता पर उस वक्त गंभीर चिंता उठी जब प्रेसीडेंसी युनिवर्सिटी की बेकर प्रयोगशाला में तोडफ़ोड़ मचाई गई. तमाम तरह से गरीब पश्चिम बंगाल में इसे कम-से-कम राज्य की शान माना जाता रहा है.
इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद टीवी पर छिड़ी बहस और विरोध मार्च में ‘‘ऐसा पहले कभी नहीं हुआ’’ यानी अभूतपूर्व का बेहिसाब इस्तेमाल हुआ, जिससे यही महसूस हुआ कि कोलकाता ने इस तरह का उबाल पहले कभी नहीं देखा. विडंबना है कि शीर्ष पर रहे शिक्षा के इस केंद्र के लिए यह शर्मनाक घटना कुछ खास नहीं थी. 1960 के दशक के मध्य से 1975 के आपातकाल तक का समय जिसमें एक खूनी सन्नाटे ने आकार लिया था, कॉलेज स्ट्रीट और प्रेसीडेंसी कॉलेज, दोनों ही विभिन्न वामपंथी दलों और कांग्रेस के बीच की अंतहीन लड़ाई के साक्षी रहे.
बम, पाइप गन और बाहुबल से लड़ी गई ऐसी राजनीति, जिसे बेवजह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता रहा है. बेकर लैब में 1966 और 1970 में भी तोडफ़ोड़ की गई थी. 1967 में वाम दलों के वर्चस्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार के शिक्षा मंत्री ने कॉलेज स्ट्रीट में एक रैली को संबोधित करते हुए संभावित वर्गीय लड़ाई के लिए हथियार मुहैया कराने का वादा किया था. प्रेसीडेंसी से सड़क की दूसरी तरफ स्थित कॉफी हाउस में कॉलेज के कट्टरपंथी छात्रों में इस बात पर बहस छिड़ी होती कि वर्गीय दुश्मन का खात्मा करने के लिए चाकू मुफीद है या बंदूक?
ऐसे में कॉलेज लैब में हुआ हुड़दंग ‘‘कभी नहीं हुआ’’ की श्रेणी में कतई नहीं आता. यह कोई प्रशासनिक लापरवाही भी नहीं थी, जिसके लिए राज्यपाल एम.के. नारायणन ने छात्रों से माफी मांगी. हालांकि, यह घटना निश्चित तौर पर एक इशारा है. पश्चिम बंगाल की समस्या यह नहीं है कि एक चमत्कारी नेता सड़क की राजनीति से उठकर सरकार में जा पहुंची है. समस्या कहीं ज्यादा गहरी है. राजनैतिक हिंसा ने सबसे पहले 20वीं सदी की शुरुआत में बंगालियों के खून में प्रवेश किया. हालांकि, घटना सिर्फ उन ‘‘आंदोलनकारी’’ समूहों तक ही सीमित नहीं थी, जिन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या या सशस्त्र विद्रोह की कोशिश की.
युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे समूहों ने कांग्रेस की मुख्यधारा में प्रवेश किया और गांधीवादी आदर्शों के मुकाबले दूसरी परंपरा खड़ी की. बाद में, एक बड़ा तबका कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गया. 1947 तक बंगाल में हिंसा का मतलब था सांप्रदायिक दंगे. आजादी के बाद सारा ध्यान राजनैतिक हिंसा में तब्दील हो गया. 1948 में नए आजाद राज्य के प्रति अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अतिवादी वामपंथी कार्यकर्ताओं ने कारखाने के फायर बायलर में एक यूरोपीय सुपरवाइजर को फेंक दिया था. 1950 के दशक के शुरू में कोलकाता में ट्राम के किराए में एक पैसे के इजाफे के विरोध में वामपंथियों ने कई ट्रामें जला दी थीं.
1970 के दशक में नक्सली छात्र अक्सर महात्मा गांधी और दूसरे प्रख्यात भारतीयों की मूर्तियों को तोड़ डालते, व्यस्त सड़कों पर काम कर रहे यातायात पुलिसकर्मियों का गला रेतकर मार डालते, यहां तक कि जादवपुर युनिवर्सिटी के कुलपति को भी उस वक्त मौत के घाट उतार दिया, जब वे शाम को अपने परिसर में टहल रहे थे. माकपा ने बर्बर हिंसा का अलग ही इतिहास रचा है. बर्दवान में कांग्रेस समर्थक सेन भाइयों को उनकी मां के सामने बेरहमी से मार डाला गया था.
हिंसा हमेशा गुंडों और मवालियों की करतूत नहीं होती. कई बर्बर हत्याओं के पीछे अभिजात कॉलेजों के छात्र भी शामिल रहे, जिन्होंने क्रांति में अपने योगदान के नाम पर इन्हें अंजाम दिया. इन शिक्षित अपराधियों में से कइयों को पुलिस की मिलीभगत से यूरोप और अमेरिका का एकतरफा टिकट थमा विदा कर दिया गया. 1972 के बाद ‘‘श्वेत आतंक’’ की लहर ने नक्सलियों और माकपा पर नकेल कसी और उन्हें काबू कर लिया. लेकिन तब तक पश्चिम बंगाल की जमीन पर हिंसा की संस्कृति की जड़ें गहरे पैठ चुकी थीं.
32 वर्षों के वाम मोर्चा शासन ने ऊपरी तौर पर शांति बहाल कर रखी थी. पर हकीकत यह थी कि जीवन के हर पहलू पर एक ही पार्टी का वर्चस्व था. वाम के खिलाफ ममता की लंबी और कठोर लड़ाई में दिखाई गई जुझारू हताशा उस असामान्य राजनैतिक संस्कृति का अपरिहार्य नतीजा थी, जो असहिष्णुता और अपराधी मानसिकता पर केंद्रित थी.
जरा 1991 का वाकया याद कीजिए, जब वामपंथी कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक जगह पर लोहे की छड़ों से उन पर वार किए और उन्हें अधमरा कर दिया था. तृणमूल में वाम मोर्चे की तरह कोई सधी हुई कमान व्यवस्था नहीं है. यह कई शक्ति-केंद्रों की बेडिय़ों में कैद है, जहां अपनी अलग-अलग प्राथमिकताएं लिए स्थानीय ‘‘दादा’’ अवतरित होते रहते हैं. लेकिन अकेली जान को घेरकर कई लोगों का टूट पडऩा एक ऐसी परंपरा को दर्शाता है जो 1960 के दशक से जस की तस बनी है.
पश्चिम बंगाल को और भी ज्यादा प्रशासनिक चुस्ती की जरूरत है. समय की मांग है कि राज्य और यहां के समाज में घुले जहरीले तत्वों को निकाल फेंकने की प्रक्रिया शुरू हो और इसका जितना राजनीतिकरण हो चुका है, उसे कम किया जा सके. जब तक बंगाल हाल की अपनी राजनैतिक विरासत के बुनियादी बिंदुओं पर सवाल नहीं उठाता, वह इन्हीं हालात में घुटने को अभिशप्त रहेगा.
स्वपन दासगुप्त राजनैतिक टीकाकार हैं

