भारत में शिक्षा से जुड़े मसलों पर पंद्रह साल से काम करते-करते मैं सब्र रखना सीख गया हूं. इस क्षेत्र में विशेषज्ञों की भरमार है. अपने काम में इनकी गहरी निष्ठा है, ये जानकार हैं, इरादे नेक हैं और पूरे अधिकार के साथ अपनी बात कहते हैं.
ये सभी विशेषज्ञ उन नए लोगों के साथ थोड़े बेसब्र हो जाते हैं, जो आंकड़ों और सबूतों की बातें करते हैं और कभी-कभी गहरा हस्तक्षेप करते हैं, जबकि इन लोगों ने शिक्षा के सिद्धांतों पर दशकों तक सिरखपाई तो की नहीं होती है. ऐसे ही एक विशेषज्ञ ने कुछेक साल पहले एक दिन ऐसे ही एक नए-नवेले से कहा था कि जो पढ़ाई की बात करते हैं, उन्हें खुद पढऩा नहीं आता.” समझ में आया आपको?
सब्र जरूरी है क्योंकि शिक्षा नीति पर विशेषज्ञों का खासा असर रहता है. उन्होंने ही हर बच्चे को बेहद उम्दा किस्म की तालीम देने का अपना सपना सच करने के लिए शिक्षा का अधिकार (आरटीई) विधेयक तैयार किया. सपना हमारा भी यही है, लेकिन उस पर चर्चा के दौरान हमें नहीं बुलाया गया. असल में आज हमें जो 'अधिकार’ मिला है, उसमें शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में एक खास नजरिए को तरजीह दी गई है. यह बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश के गांवों की बजाय शहरी दिल्ली के लिए ज्यादा व्यावहारिक लगती है. हम उन गांवों में काम करते हैं.
क्या वाकई हमने मान लिया है कि गरीब भारतीय अभिभावक ऐसे स्कूल चाहते हैं, जिनमें खेल के मैदान हों और अध्यापकों के पास प्रामाणिक डिग्री हो? तो फिर सरकारी स्कूलों के बच्चे पिछले एक दशक से आखिर क्यों निकल भाग रहे हैं, जबकि वहां ऐसे शिक्षक और खेल के मैदान दोनों होते हैं? वही बच्चे जिन निजी स्कूलों में पहुंचते हैं, वे अकसर किसी के खाली पड़े कमरों में चल रहे होते हैं और शिक्षक के पास सारे जरूरी प्रमाण-पत्र मिल पाना भी जरूरी नहीं. पर मां-बाप यही दोहराते रहते हैं कि वह कम-से-कम पढ़ाने तो आता है और कुछ तो मेहनत करता है. हम नहीं मानते कि सिर्फ निजी स्कूल शिक्षा की हमारी सारी समस्याएं सुलझ देंगे, पर बच्चों के स्कूल अगर इस कानून की शर्तें पूरी न करने की वजह से बंद हो जाएं तो अभिभावकों को कैसा लगेगा?
शायद अब सब्र खोने का वक्त आ गया है. प्रथम ने हाल ही में शिक्षा की वार्षिक दशा-दिशा की रिपोर्ट जारी की है. इससे पिछले साल पहली बार दिखे चिंताजनक रुझान की पुष्टि हो जाती है. लगभग समूचे भारत में 567 जिलों में फैले 16,166 गांवों के (5 से 16 वर्ष आयु के) 4,48,545 बच्चों की परीक्षा से मिले आंकड़ों से एक बात साफ हो जाती है: भारत में बुनियादी जोड़-घटाव कर पाने और सीधे-सादे पैराग्राफ पढ़ पाने वाले बच्चों का अनुपात तेजी से गिर रहा है. कामयाबी की इक्का-दुक्का मिसालें दिखती हैं पर कुल जमा तस्वीर धुंधली है.
फिर भी विशेषज्ञों ने (जैसा कि आरटीई के शिल्पियों में से एक विनोद रैना ने इंडिया टुडे के एक अंक में लिखा भी है) हैरतअंगेज ढंग से सारा दोष टेस्ट पर डाल दिया है. रैना के कहने का लब्बोलुबाब यही है कि बच्चे को बुखार है, तो थर्मामीटर तोड़ दो. थर्मामीटर बच्चे में तनाव पैदा करता है और इसी वजह से उसे बुखार आता होगा.
रैना की टिप्पणी में टेस्ट और टेस्ट के नंबरों के आधार पर दिए जाने वाले प्रोत्साहनों को लेकर तगड़ी भ्रांति है. शिक्षा की दशा-दिशा वाली वार्षिक रिपोर्ट यह जानने का एक मौका देती है कि यह देश खड़ा कहां है. उसका संदेश यह है कि बच्चे फेल नहीं हो रहे बल्कि बच्चों के लिए अग्नि परीक्षा में देश फेल हो रहा है. सीधी-सी बात है कि ऐसी परीक्षा का वास्तव में बहुत मामूली असर होता है, इससे इतना भर हो सकता है कि सबको, सभी स्तरों पर ज्यादा कोशिश और बेहतर करने की प्रेरणा मिले.
चूंकि असली समस्या टेस्टिंग की है, सो रैना की दुनिया में कोई संकट नहीं. कम-से-कम नया संकट तो नहीं ही है. हालात 1986 में खराब थे और आज भी खराब हैं. उसी सिलसिले में रैना की सिफारिशें तो ऐसी लगती हैं कि पिछले तीन दशक में शिक्षा महकमे का कोई भी कारिंदा कभी भी उन्हें तैयार कर सकता था (और असल में कई बार ऐसा हुआ भी): सरकारी स्कूलों में ज्यादा पैसा लगाओ; ज्यादा शिक्षक रखो (पर ठेके वाले नहीं); शिक्षकों को ज्यादा ट्रेनिंग दो और प्राइवेट स्कूलों को हावी मत होने दो.
सारी बातों को जोड़कर देखें तो साफ जाहिर हो जाता है कि इसकी जड़ें कहां हैं: विनोद रैना की मूल फिक्र अध्यापक हैं, छात्र नहीं. वे ऐसी हर चीज से लडऩे को तैयार हैं, जिससे अध्यापकों के रसूख और उनकी तनख्वाह पर असर पड़ता हो. इसीलिए वे और बहुत सारे दूसरे प्रतिष्ठित विशेषज्ञ हमेशा शिक्षा की दशा-दिशा की वार्षिक रिपोर्ट और कुल मिलाकर सार्वजनिक परीक्षाओं से बेचैन रहे हैं. शिक्षा के अधिकार में यह पता लगाने का अधिकार आखिर क्यों नहीं दिया गया है कि शिक्षा वास्तव में दी जा रही है या नहीं? परीक्षा शिक्षकों की पोल खोल देती है. निरक्षर माता-पिता को पता लगता है कि उनके बच्चे फेल हो रहे हैं. लगातार और व्यापक मूल्यांकन से यह समस्या दूर हो जाएगी क्योंकि इनमें से अधिकतर माता-पिता उसका कोई मतलब नहीं समझ पाएंगे.
शिक्षकों का अपना महत्व है. शिक्षा संबंधी किसी भी पहल की कामयाबी की कुंजी उन्हीं के हाथ में है. पर स्कूल व्यवस्था तो बच्चों के हिसाब से डिजाइन होनी चाहिए, न कि शिक्षकों के हिसाब से, उनके लिए भी नहीं, जो शिक्षकों को पढ़ाते हैं और उनके लिए भी नहीं, जो पाठ्यक्रम बनाते हैं, पाठ्य पुस्तकें लिखते हैं. प्राथमिकता उसे मिलनी चाहिए जो पढऩे में बच्चों की मदद करे.
अभिजीत वी. बनर्जी और एस्थर डफलो ने मिलकर पुस्तक लिखी है: पुअर इकॉनॉमिक्स: अ रैडिकल रीथिंकग ऑफ द वे टु फाइट ग्लोबल पावर्टी

