गुजरात में नरेंद्र मोदी की चुनावी जीत की तुलना करने के लिए क्रिकेट मैच से बेहतर नज़ीर भला और क्या हो सकती है. आखिर इस देश का मीडिया जितना दीवाना क्रिकेट के लिए है, उतना ही दीवाना मोदी के लिए भी है. गुजरात में नरेंद्र मोदी की जीत बाजी पलटने वाली हो सकती है.
लगातार तीन गेंदों पर तीन विकेट लेने के बाद एक गेंदबाज में जैसा आत्मविश्वास दिखता है, वैसा ही तीन चुनावों में लगातार जीतने के बाद मोदी में दिख रहा है. ऐसा गेंदबाज जिस तरह अपनी टीम के लिए नज़ीर और दूसरों के लिए चेतावनी बन जाता है, ठीक वही हाल मोदी का भी है.
अब ऐसे में यह पूछा जा सकता है कि मोदी कौन-सी नज़ीर पेश कर रहे हैं? यह बात बिल्कुल साफ है कि मोदी ने वंशवाद की राजनीति से संचालित एक पार्टी पर सिर्फ अपनी लगन के बूते स्पष्ट बढ़त ले ली है और वह भी तब जबकि राजनीतिक वंशवाद का अभी अंत नहीं हुआ है. वे जितनी देर जगे होते हैं, काम में लगे रहते हैं और बताया जाता है कि परिवार के साथ उनका रिश्ता साल में सिर्फ एक बार अपनी मां को फोन करने तक सीमित है.
आरएसएस के एक मामूली कार्यकर्ता से गुजरात के मुख्यमंत्री के पद तक उनका उभार इस तेजी से हुआ कि वे राष्ट्रीय परिदृश्य पर छा गए हैं. अतीत में हमें इस किस्म की शख्सियतों में सिर्फ शिवाजी या हैदर अली ही याद आते हैं जो मामूली हैसियत से राजनीतिक प्रभुत्व की स्थिति तक तलवार या गोलियों के दम पर पहुंचे और जिन्होंने अपना साम्राज्य कायम किया. यह देखना सचमुच सुखद है कि हमारे लोकतांत्रिक दौर में ऐसी उपलब्धि मतपत्रों के माध्यम से भी हासिल की जा सकती है.
मोदी की जीत कुछ और भी कहती है: वह यह कि अगर चुनाव नियमित तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से कराए जाएं तो चुनावी प्रणाली पुरस्कार और दंड के एक विधान के तौर पर काम करती है. मोदी की जीत इस भरोसे में हमारी आस्था को दोबारा कायम करती है कि अगर आप सबके लिए काम करते हैं तो ज्यादातर लोग आपका समर्थन करेंगे और भारी मतों से करेंगे.
मोदी ने विकास के बारे में अपनी अपील को काफी सतर्कता से लोगों के बीच रखा और लोगों ने भी शायद यह महसूस किया कि जब ज्वार आता है तो सारी नावें अपने आप ऊपर की ओर उठ जाती हैं. लोगों को यह भी लगा कि विकास काफी हद तक जाति और धर्मनिरपेक्ष होता है.
एक तरीके से देखें तो इसने मार्क्सवाद को सिर के बल ला खड़ा किया है, जो दावा करता है कि आर्थिक हितों का पोषण संघर्षों को जन्म देता है, जबकि यहां तथ्य यह है कि जब एक का भला सबके भले से जुड़ा हो, तो आर्थिक हितों को पुष्ट करने की कवायद सबको एक जगह ला खड़ा कर सकती है. और यहीं, मोदी की जीत एक और तरीके से नज़ीर बन कर सामने आती है, वह यह कि निजी ईमानदारी और विश्वसनीयता का राजनीतिक फल मिलता है.
उनके कई प्रचार संबोधनों में हमने सुना है, ‘‘मैं पैसे नहीं लेता और दूसरों को भी ऐसा नहीं करने देता हूं.’’ जरूरी नहीं कि सत्ता हमेशा भ्रष्ट ही बनाती हो, इसका इस्तेमाल भ्रष्ट को जड़ से उखाड़ कर फेंकने में भी किया जा सकता है.
कुछ लोग मोदी की जीत को तानाशाही की लोकप्रियता और सांप्रदायिकता की उपलब्धि के तौर पर देख रहे हैं. मसलन यह तथ्य कि उन्होंने चुनाव में एक भी मुसलमान प्रत्याशी खड़ा नहीं किया. सांप्रदायिक तनाव के नहीं होने को वे इस तरह देखते हैं कि एक समुदाय विशेष का इतना दमन किया गया है कि उसने समर्पण ही कर डाला है. अगर तकरीबन दो-तिहाई गुजरात सांप्रदायिक है, तो फिर हमें सांप्रदायिकता को नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा.
बहरहाल, कुछ ऐसे लोग तो आपको हमेशा ही मिलेंगे जो लोकतंत्र में अराजकता, साहस में हिंसा और संकल्प में सनक को खोजेंगे. वे शायद इस बात को समझ ही नहीं सकते कि मोदी का उभार किस तरह हिंदू धर्म की मूल भावना में हो रहे स्वागतयोग्य बदलाव का सशक्त उदाहरण है.
चौथी सदी से ही हिंदू धर्म अपने भीतर पलने वाले तनावों से ग्रस्त रहा है, जब महिलाओं और शूद्रों को वेद पढऩे से रोका गया. इस तनाव के केंद्र में यह सवाल था-बल्कि अब भी है-कि कौन तय करेगा कि हिंदू धर्म का मतलब क्या होना चाहिए? तीनों उच्च वर्णों के पुरुष या फिर सभी हिंदू नर-नारी? धर्म के क्षेत्र में रामदेव और राजनीति के क्षेत्र में राष्ट्रीय पैमाने पर मोदी जैसे ‘‘पिछड़ी जात्यि के प्रतिनिधियों का उभार यह दिखाता है कि इस सवाल का हल अब उन सभी हिंदू नर-नारियों के पक्ष में हो रहा है जिनकी बराबर हिस्सेदारी उसकी संरचना में है.
बीजेपी आज अगर सिर्फ मराठी ब्राह्मणों के निजी हितों की रक्षक नहीं रह गई है, तो इसका श्रेय उसके भीतर मोदी जैसे लोगों के उभार को जाता है, जिन्हें कुछ लोग पार्टी का चेहरा मानने को अब तक तैयार नहीं हैं.
उन्नीसवीं सदी में कहते थे कि बंगाल आज जो सोचता है, बाकी भारत वह कल सोचता है. क्या बीसवीं सदी में इसे कुछ यूं कहना पड़ेगा कि गुजरात आज जो सोचता है, बाकी भारत वह कल सोचता है? एक दौर था जब भारत को गांधी की जरूरत थी और गुजरात ने हाथ बढ़ाया था. क्या आज के भारत को मोदी की जरूरत है, और क्या गुजरात ही एक बार फिर संकटमोचन बन कर उभरेगा?
अरविंद शर्मा मॉन्ट्रियल की मैक्गिल यूनिवर्सिटी में कम्पेरेटिव रिलिजन के प्रोफेसर हैं

