महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर चलने की जगह आज उनका गुणगान ही ज्यादा किया जाता है. 1989 में थियानमेन चौक पर चीन ने जिस तरह प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का प्रयोग किया था और अब वह जिस तरह तिब्बत में भी ताकत का प्रयोग कर रहा है, उससे शांतिपूर्ण या अहिंसक विरोध की बात बेमानी ही मालूम होती है. सीरिया में भी इस तरह का विरोध बेमानी साबित हो रहा है क्योंकि वहां भी लोग राष्ट्रपति असद की निर्ममतापूर्ण कार्रवाई का सामना कर रहे हैं. आज बाजार का अर्थशास्त्र भी गांधीवादी अर्थशास्त्र के स्वदेशीवाद को झुठला चुका है.
नैतिकता की बजाए अवसरवाद पर आधारित आज की यथार्थवादी भ्रष्ट राजनीति के दौर में नैतिकता की बात हास्यास्पद ही लगती है. इसके बावजूद जब मैंने दुनिया के कुछ बड़े गांधीवादी विद्वानों में शुमार एक महिला को दिल्ली में भाषण देते सुना और उनका इंटरव्यू लिया तो मुझे आज के दौर में गांधी की प्रासंगिकता का एहसास हुआ. वह चाहे अरब देशों में तानाशाही शासकों के खिलाफ विरोध हो, भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन हो, इस देश में सरकारों की वैधता को चुनौती की बात हो, भारतीय कुलीन वर्ग में राजनीति के प्रति तिरस्कार की बात हो या फिर अर्थव्यवस्था में नैतिकता की भूमिका की बात हो.
व्याख्यान देने वाली महिला थीं जूडिथ ब्राउन, जो अभी हाल तक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कॉमनवेल्थ हिस्ट्री की प्रोफेसर रही थीं. वे ‘‘गांधी और सविनय अवज्ञा: नैतिक राजनीति की सीमाएं’’ विषय पर बोल रही थीं. नेहरू मेमोरियल संग्रहालय और पुस्तकालय के संस्थापक-निदेशक और प्रसिद्ध इतिहासकार बी.आर. नंदा के सम्मान में आयोजित वार्षिक कार्यक्रम में यह दूसरा व्याख्यान था. ब्राउन ने गांधी पर नंदा की लिखी हुई जीवनी के बारे में कहा कि यह गांधी के जीवन और उनके कार्यों पर गंभीर शोधकार्य की परंपरा का उदाहरण है.
जुडिथ ब्राउन अपने विषय में प्रवीण हैं. उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘मैंने गांधी को बहुत करीब से जिया है.’’ एक प्रोफेशनल इतिहासकार के तौर पर वे महात्मा गांधी की जीवनी लिख चुकी हैं और बाद में उन्होंने नेहरू की भी जीवनी लिखी. उसमें भी वे गांधी पर ही लौट आती हैं. वे गांधी से काफी सहानुभूति रखती हैं.
उत्तर प्रदेश में मेरठ के नजदीक उनका जन्म हुआ था. उनके पिता वहां अंग्रेज पादरियों के एक धार्मिक स्कूल के प्रिंसिपल थे. वे अब खुद भी एक अंग्रेज पादरी हैं. ब्राउन नैतिकतापूर्ण राजनीति की पक्षधर हैं. उन्होंने श्रोताओं को बताया, ‘‘नैतिकतावादी राजनीति की गांधीवादी परंपरा राजनीतिक गतिविधियों का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है.’’ उन्होंने अपना व्याख्यान यह कहते हुए खत्म किया कि ‘‘गांधी दुनिया में प्रेरणा की मूर्ति बन चुके हैं.’’
ब्राउन ने नंदा को इतिहासकारों के इतिहासकार की संज्ञा दी, जबकि यही संज्ञा उन्हें भी दी जा सकती है. उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘मैं व्याख्यान के अंत में नोट्स मुहैया कराने से रोक नहीं सकी.’’ उनका व्याख्यान बहुत संतुलित था, जिसमें कहीं से भी गांधी की खोखली तारीफ नहीं झ्लकती थी. उन्होंने यह कहकर दो श्रोताओं को नाराज कर दिया कि ‘‘ब्रिटिश शासन को हटाने में सविनय अवज्ञा की कोई भूमिका नहीं थी.’’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘भारत की आजादी के संघर्ष में अहिंसक आंदोलन की सीमित भूमिका ही थी.’’
अपने इस दृष्टिकोण को सही साबित करते हुए ब्राउन ने कहा कि आजादी का आंदोलन उन दिनों दुनिया में घटित हो रही घटनाओं और भारत में हो रही हलचल से प्रभावित था. उन्होंने कहा कि अमेरिका ने मांग की थी कि द्वितीय विश्व युद्ध में दी गई सहायता की कीमत के रूप में ब्रिटेन भारत को आजाद करने की गारंटी दे. उन्होंने मुझे बताया कि युद्ध के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने महसूस किया कि ब्रिटेन अब भारत को अपने कब्जे में ज्यादा दिन तक नहीं रख सकता और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि अंग्रेजी शासन को बनाए रखने के उद्देश्य से ब्रिटिश सेना को अगर भारत में लडऩे के लिए वापस जाने को कहा गया तो वह बगावत कर देगी.
वैधता का सवाल
लेकिन ब्राउन ने यह माना कि स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी की बड़ी भूमिका थी. उन्होंने बताया कि गांधी की उपलब्धियों में से एक बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने ब्रिटिश राज की वैधता को चुनौती दी. यह महत्वपूर्ण बात थी. प्रोफेसर ब्राउन ने कहा, ‘‘यह सोचना गलत है कि ब्रिटेन ने ताकत के बूते भारत पर शासन किया.’’ उनका कहना था, ‘‘ब्रिटेन अपने भारतीय सहयोगियों पर निर्भर था, कुछ सहयोगी सीधे सरकार के लिए काम कर रहे थे तो कुछ वे थे जो न्यायिक व्यवस्था से जुड़े थे. इसके अलावा भारत के रजवाड़ों का भी सहयोग था.’’ इन सहयोगियों के महत्व को बताने के लिए ब्राउन ने ऐसे आंकड़े पेश किए जिन्होंने न सिर्फ मुझे हैरान कर दिया, बल्कि उनकी एक पुस्तक के प्रकाशक को भी चकित कर दिया.
प्रकाशक को जैसे उन पर विश्वास ही नहीं हुआ और उसने कहा कि वे दोबारा उन आंकड़ों को जांच-समझ लें. ये आंकड़े 1921 की जनगणना से लिए गए थे. इस जनगणना से पता चलता था कि ब्रिटिश भारत में यूरोपीय लोगों की आबादी मात्र 1,57,000 थी और इनमें से लगभग एक-तिहाई महिलाएं थीं.
ब्रिटिश शासन के अधीन भारत की कुल आबादी 24.7 करोड़ थी. ब्राउन ने मुझे बताया, ‘‘इसीलिए गांधी ने महसूस किया कि अगर वे ब्रिटिश शासन की वैधता पर सवाल खड़ा करते हैं तो उसके भारतीय सहयोगियों की वैधता भी सवालों के घेरे में आ जाएगी और इस प्रकार ब्रिटिश राज पूरी तरह से कमजोर हो जाएगा.’’
जब मैंने उनसे पूछा कि अरब में आंदोलन के दौरान काहिरा के तहरीर चौक पर जो भीड़ जुटी थी, क्या उसमें गांधी की प्रासंगिकता दिखाई दी थी, तो ब्राउन का जवाब था, ‘‘मैं समझती हूं कि हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा लोग गांधी का नाम सुन चुके थे और जाने या अनजाने उनके नाम पर जुट रहे थे.’’
भारत में वैधता का सवाल मेरी नजर में आज भी प्रासंगिक है. भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने वाला आंदोलन एक प्रकार से सरकार की वैधता को सीधी चुनौती है. पिछले साल जनता ने जिस तरह से इस आंदोलन को भारी समर्थन दिया था, वह सभी नेताओं के लिए एक चेतावनी है. भारत के लिए खतरे की बात यह है कि उस आंदोलन के कमजोर पडऩे और आंदोलन के नेतृत्व में फू ट पडऩे से देश के राजनेता यह सोचने लगेंगे कि उन्हें अपनी वैधता को लेकर किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है.
गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन पर जूडिथ ब्राउन का विश्लेषण भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नेताओं के लिए कुछ व्यावहारिक संकेत उपलब्ध कराता है. उन्होंने कहा कि इस तरह के आंदोलनों के लिए कोई निश्चित ब्लू प्रिंट नहीं होता, उन्हें विशेष परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करना पड़ता है. उन्होंने बताया कि गांधी अपने विरोधी की सबसे कमजोर नस को अपना निशाना बनाते थे, जैसा कि उन्होंने ब्रिटिश राज की वैधता पर निशाना साधा था, जो कि उसकी सबसे कमजोर नस थी. वे उस जगह पर कभी वार नहीं करते थे, जो ज्यादा मजबूत होती थी.
यानी वे ऐसे बिंदु को निशाना बनाने से बचते थे, जो आंदोलन के खिलाफ सरकार के बल प्रयोग को सही ठहराए. इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को यह कहकर कुछ हद तक सही ठहराने की कोशिश की थी कि उनके विरोधी केंद्र सरकार के कामकाज को पंगु बनाना चाहते थे.
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध
जब मैंने ब्राउन से पूछा कि गांधी आज होते तो भारत में व्याप्त उस भ्रष्टाचार के बारे में क्या सोचते, जो इतना बड़ा मुद्दा बन चुका है, तो उनका जवाब था, ‘‘वे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार का बुनियादी नैतिक डर दिखाते और कहते, एक बड़ी समस्या यह है कि भारत 1947 के बाद से ज्यादा नहीं बदला है.’’ यहां एक बार फिर गांधी आज के भारत में सीधे प्रासंगिक हो जाते हैं.
प्रोफेसर ब्राउन के मुताबिक, गांधी ने 1937 में प्रांतीय विधानसभाओं में चुने गए कांग्रेस के राजनेताओं से कहा था, ‘‘तुम लोग मोटरगाडिय़ों में चलते हो. तुम लोग औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी तौर-तरीके अपनाते हो, इसलिए मैं समझता हूं कि कुछ खास नहीं बदला है.’’ ब्राउन ने आजाद भारत में बदलाव लाने में नाकाम रहने के विषय पर भी बात की. ऐसा बदलाव जिसमें ‘‘पूरी तरह से प्रशासनिक सुधार किए गए हों और जिनके आधार पर जमीन पर कोई बड़ा परिवर्तन दिखाई देता.’’
लेकिन सभी राजनेताओं को भ्रष्ट कहकर खारिज कर देना सही नहीं है, क्योंकि आज भी देश में कई ईमानदार सांसद और विधायक हैं. इसी तरह सभी प्रशासनिक अधिकारियों को बाबू कह देना भी ठीक नहीं है. इसके विपरीत राजनीति को गंदा खेल बताते हुए अपने आपको सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कर लेना बहुत आसान है. ब्राउन ने अपने व्याख्यान में कहा, ‘‘मानव जीवन के स्वभाव की नैतिक समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति गांधी के विचारों और उनके आचरण से प्रभावित होकर राजनीति से जुडऩे के लिए विवश हो जाता था.’’ इसलिए गांधी कहते थे कि भारत के संभ्रांत वर्ग के राजनीति से मुंह मोड़े रखने या उसके प्रति तिरस्कार का भाव रखने के पीछे नैतिक या आध्यात्मिक बहाना खोजने का कोई मतलब नहीं है.
अपने इंटरव्यू में जब हमने गांधी के आर्थिक विचारों की प्रासंगिकता पर चर्चा की तो प्रोफेसर ब्राउन ने एक आश्चर्य में डालने वाली तुलना सामने रखी. उन्होंने कहा कि भारत अगर गांधी के आर्थिक उपदेशों का पालन करना चाहता है तो उसे उत्तर कोरिया का अनुकरण करना चाहिए. जब मैंने कहा कि गांधी के विचारों की तुलना उस तानाशाही वाले देश से भला कैसे की जा सकती है, तो वे हंसने लगीं और जवाब दिया, ‘‘उत्तर कोरिया ने बाकी दुनिया से खुद को अलग कर लिया है और भारत को गांधी के रास्ते पर चलना है तो उसे भी दुनिया के उपभोक्तावाद और दूसरी शक्तियों से बचने के लिए खुद को अलग करना होगा.’’
नैतिक नजरिए की दरकार
मैंने सवाल किया, ‘‘तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि गांधी का अर्थशास्त्र अप्रासंगिक हो गया है या मैं दूसरे शब्दों में कहूं तो अव्यावहारिक है?’’ इस पर ब्राउन ने कहा, ‘‘मैं गांधी की नैतिक परिकल्पना को खारिज नहीं कर सकती. समाज के लिए नैतिक परिकल्पना ऐसी होनी चाहिए, जिसमें वह देखे कि वह किधर जा रहा है और वह राजनीतिक ऐक्शन का आधार बने. हमें नहीं लगता कि हम सिर्फ पैसा बनाने और अपना घर संवारने के लिए दुनिया में आए हैं.’’
हमें सचमुच एक ऐसे नैतिकतावादी नजरिए की जरूरत है, जो आज गांधी की प्रासंगिकता पर ब्राउन के नजरिए को सही ठहराता हो. उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘भारत की समस्याओं पर गांधी के सभी जवाब भारतीय समाज की पूरी तरह से अलग नैतिक परिकल्पना पर आधारित थे. अपने भाषण में उन्होंने यह भी बताया कि क्यों भारत गांधी की नैतिकता में रुचि नहीं रखता. उन्होंने बी.आर. नंदा का एक उद्धरण सुनाया, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘‘यह जरूरी है कि गांधी की छवि भगवान की न बने.’’
नंदा चाहते थे कि गांधी को एक मनुष्य के तौर पर याद किया जाए, न कि भगवान के रूप में. ‘‘उन्हें एक इंसान के तौर पर याद किया जाए जिसने बड़ी मेहनत से ऐसे मूल्यों को स्थापित किया. उसका सम्मान तो सभी करते हैं, लेकिन व्यवहार में उसका पालन नहीं करते.’’ भारत ने भले ही गांधी को भगवान का दर्जा न दिया हो लेकिन उन्हें एक चौकी पर जरूर विराजमान कर दिया है. किसी को अप्रासंगिक बनाने के लिए इससे अच्छा कोई तरीका नहीं.
-मार्क टुली जाने-माने पत्रकार हैं

