बलात्कार से पीड़ित महिलाएं जिंदा लाश नहीं होतीं. यह कहना पिछड़ी हुई सामाजिक धारणा है जो स्त्री की देह को ही स्त्रीत्व के सार के तौर पर प्रचारित करती है और बलात्कार को मौत के बराबर करार देती है. इसका मतलब यह नहीं कि हम किसी भी तरह एक ऐसे अपराध की बर्बर प्रकृति का सरलीकरण कर रहे हों जो एक स्त्री देह की स्वायत्तता को भंग करता है और उसमें इतनी हिंसक सेंध लगाता है जितना और कुछ भी नहीं हो सकता. लेकिन बलात्कार की शिकार महिला जिंदा रहती ही है, पूरी उम्र जीती है और सामान्य ढंग से जीती है, बशर्ते उसका समाज उसे जल्द इंसाफ दिलवाए, उसके अपराधियों को कठोर दंड दे और उसे जिंदगी को दोबारा गढऩे के मौके दे.
सफदरजंग अस्पताल में मौत से जंग लड़ती उस युवती (जिसे अब इलाज के लिए सिंगापुर भेज दिया गया है) ने अपनी मां को कथित तौर पर यही तो लिखा था, ‘‘मैं जीना चाहती हूं.” उसे नहीं पता है कि वह इस व्यवस्था की नाइंसाफी और इंसाफ के लिए संघर्ष, दोनों का ही प्रतीक बन चुकी है.
यह दुखदायक सचाई है कि राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस को दिए गए दिशा-निर्देशों का यदि पालन किया गया होता, मसलन काले शीशे लगाने वाली बसों के मालिकों को दंडित किया गया होता, तो ऐसा जघन्य अपराध नहीं हो सकता था. यह बहुत मामूली-सा कदम था, लेकिन सिर्फ इसके न उठाए जाने से ही एक युवती जानलेवा जख्मों की वजह से मौत से लड़ रही है. इस दिशा-निर्देश का उल्लंघन करने वाले शीर्ष पुलिस अफसरों को क्या दंडित नहीं किया जाना चाहिए? लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
वह साहसी लड़की अभी जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही है जबकि पूरा देश और खासकर वह शहर उस पर हुई हिंसा के खिलाफ भारी आक्रोश में उबल पड़ा है, जहां वह रोजगार की तलाश में आई थी. यही वह शहर है जिसका महिलाओं और बच्चों से बलात्कार और यौन उत्पीडऩ के मामले में बहुत खराब और निंदनीय रिकॉर्ड रहा है—एक साल में बलात्कार के 600 मामले दर्ज हुए, जिनमें आधे से ज्यादा नाबालिगों के खिलाफ हैं.
हर दिन हजारों महिलाओं को बसों में, सड़कों पर और मेट्रो में अलग-अलग स्तर पर यौन उत्पीडऩ से गुजरना पड़ता है. कामकाजी महिलाएं खासकर निशाना बनाई जाती हैं. इतने दिनों से यह सब जारी है, इसके बावजूद चुप्पी की एक साजिश लगातार रची गई है जबकि सबसे जघन्य अपराध महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होते रहे. आज जो नारे हम सुन रहे हैं, वे चुप्पी के टूटने का संकेत हैं. इसीलिए हमें इस जन उभार का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए, भले ही उसमें माहौल खराब करने के लिए कुछ शराब पीकर शामिल हुए लंपट तत्व मौजूद हों.
दिल्ली की सड़कों पर पीड़ित लड़की के लिए इंसाफ की मांग कर रहे हजारों नौजवान शायद इन प्रदर्शनों के माध्यम से संवेदनशील बन सकें और महिलाओं को वस्तु की तरह देखने की बजाए बराबरी का दर्जा दे सकें. हो सकता है, वे अपने साथी के यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए और सक्रिय हस्तक्षेप कर सकें, या फिर अपने घरों के भीतर जहां उनकी बहनों के साथ भेदभाव बरता जाता हो. हो सकता है, वे दहेज मांगने से इनकार कर दें. आखिरकार, महिलाओं के खिलाफ हिंसा करने वाले पुरुष ही तो हैं.
युवाओं के बरताव में बदलाव लाना होगा
इसकी कुंजी विशेष तौर पर युवाओं के बरताव में बदलाव है और उम्मीद है कि ये प्रदर्शन हमारे टीवी चैनलों के मुकाबले कहीं ज्यादा लंबे समय तक टिके रहने वाला असर उन पर छोड़ सकेंगे. हालांकि इसके बाद लड़कों और युवाओं को विरासत में मिली पुरुष वर्चस्व और लड़कियों के प्रति भेदभाव की धारणा के खिलाफ काफी सुनियोजित तरीके से शिक्षित किया जाना होगा.
देश के कुछ हिस्सों में ऐतिहासिक रूप से सामाजिक सुधार के मजबूत आंदोलनों के नहीं होने के चलते महिलाओं के प्रति पुरुषों के रवैए में आक्रामकता और नफरत का भाव है. ऐसा रवैया खासकर जवान लड़कियों के मामले में पाया जाता है जब लोग कहते हैं कि महिलाएं अच्छी बेटी, मां, बहन और पत्नी होने की लक्ष्मण रेखा को लांघ रही हैं. जब कोई महिला अपनी जरूरतों और आकांक्षाओं की वजह से एक स्वतंत्र नागरिक के तौर पर अपनी अस्मिता को अभिव्यक्त करती है, तो उसके खिलाफ हिंसा को और व्यापक सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है.
महिलाओं की सेक्सुअलिटी की किसी भी अभिव्यक्ति को दंडित किया जाना चाहिए, चाहे वह अपनी मर्जी से अंतरजातीय/अंतरसामुदायिक साहचर्य का मामला हो या फिर किसी महिला के कपड़े, बोली या घूमने-फिरने पर दी गई प्रतिक्रिया. मौजूदा मामले में अपराधियों ने पीड़िता और उसके मित्र पर यही यही फिकरा कसा था कि वे इतनी रात गए बाहर क्या कर रहे हैं.
भारतीय अर्थव्यवस्था के तथाकथित आधुनिकीकरण और उसके साथ आई बाजार आधारित उपभोक्तावाद की संस्कृति में द्विअर्थी विज्ञापनों के माध्यम से स्त्री देह का वस्तुकरण बड़ी आसानी से हमारे यहां मौजूद महिला विरोधी पितृसत्ता के साथ मेल बैठा लेता है. इसका असर इतना तगड़ा है कि यह भारत के हर हिस्से में फैल चुका है, यहां तक कि उन जगहों पर भी जहां औरतों ने सार्वजनिक जीवन में कहीं ज्यादा स्वतंत्र भूमिका निभाई है. अब भी इस बात पर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि बाजार की आक्रामक संस्कृति स्त्री देह के बरक्स हारे सामाजिक जीवन में किस किस्म की पाशविक भावनाओं को जन्म दे रही है और इसके प्रतिरोध की संस्कृति भी हमारे यहां पहले से नाकाफी है.
प्रदर्शनों से महिलाओं को मिलेगा सवाल पूछने का साहस
इस प्रदर्शन का सबसे चैंकाने वाला अहम पहलू नौजवान लड़कियों की इसमें सक्रिय और स्वतरू स्फूर्त भागीदारी है. बर्बरता की शिकार पीड़ित लड़की के साहस ने इस देश की युवतियों के दिल को छू लिया है. इन सभी को सार्वजनिक स्थलों पर जो अपमान सहना पड़ता है, वही इन्हें एकसूत्र में पिरोता है. ऐसा इनमें से किसी के साथ भी हो सकता था.
लड़कियां जो नारे लगा रही थीं और जैसे प्लेकार्ड थामे हुए थीं, वे स्वतंत्र नागरिक के तौर पर उनकी पहचान को जाहिर करते हैं जिनके पास अपनी मर्जी के हिसाब से कपड़े पहनने, बोलने-चालने और व्यवहार का अधिकार है. ऐसा लगता है कि उनके भीतर छुपे गुस्से को अंततरू एक मंच मिल गया हो. जाहिर तौर पर यह मौजूदा घटना से ही जुड़ा है, लेकिन उन्हें इसी बहाने अब अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ अपनी चुनौती की ताकत और उसके नैतिक रूप से जायज होने का एहसास हो चला है. निजी स्तर पर भी देखें तो जो महिलाएं इन प्रदर्शनों में गई थीं, उन्हें अपने घर समेत हर कहीं भेदभावपूर्ण बरताव पर सवाल खड़ा करने की ताकत जरूर मिलेगी.
इन घटनाओं से हमारी उस न्याय प्रणाली और कानूनी ढांचे पर गंभीर पुनर्विचार का एक रास्ता खुलना चाहिए जो इंसाफ नहीं, बल्कि सिर्फ नाइंसाफी पैदा करता है. महिला संगठन लंबे समय से यौन उत्पीडऩ पर एक समग्र विधेयक पर काफी मेहनत से काम कर रहे हैं. सरकार ने उसे कमजोर करने की कोशिश इस हद तक की है कि वह बलात्कार को लिंग निरपेक्ष बनाने पर आमादा है.
कठोर कानून बनाने के नाम पर यदि नाकारा और नुकसानदायक कानूनों को ही अपना लिया गया, तो संसद का विशेष सत्र बुलाना निरर्थक होगा. इस क्षेत्र में महिला कार्यकर्ताओं और संगठनों ने चूंकि काफी काम पहले ही कर लिया है, इसलिए जरूरी बदलावों को करने में बमुश्किल एक दिन का वक्त लगेगा. लेकिन औरतों को इंसाफ दिलवाने के लिए देश के नेतृत्व में राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी.
बृंदा कारत राज्यसभा सांसद और सीपीएम की पोलितब्यूरो सदस्य हैं.

