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महात्मा की सरजमीं पर मोदी

गुजरात में सिर्फ हिंसा का मामला नहीं है, बल्कि कमजोरों पर वर्चस्व कायम करने, अल्पसंख्यकों को उनकी औकात दिखाने और हिंदू प्रभुत्व स्थापित करने की मंशा है. मोदी की राजनीति को यही बात गांधीवाद विरोधी बनाती है.

अपडेटेड 5 जनवरी , 2013

नरेंद्र मोदी अपने ओर से लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने की तैयारी कर चुके हैं, जिसके नतीजे इस महीने के अंत तक आने हैं. वे 2014 में होने वाले आम चुनावों में बीजेपी से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर भी खुद को पेश कर रहे हैं. लेकिन सेकुलर भारतीयों के मन में गुजरात 2002 लोकतांत्रिक राजनीति पर एक अनर्थकारी सदमे की तरह पैबस्त है.

मोदी कैबिनेट में मंत्री रही माया कोडनानी को नरोदा पाटिया नरसंहार मामले में मिली सजा ने मोदी के इस दावे को झुठला दिया है कि 2002 में गुजरात के मुसलमानों पर हुए अत्याचार में सरकार का हाथ नहीं था. नरोदा पाटिया मामले में आए फैसले ने पुराने जख्मों को फिर से कुरेदने का काम किया है कि आखिर महात्मा गांधी का गुजरात क्यों, कैसे और कब धार्मिक राजनीति, सांप्रदायिक विभाजन तथा पूर्वनियोजित हिंसा के रंगमंच में तब्दील हो गया?

गांधी ने 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में अपने राजनैतिक दर्शन की परिभाषा अहिंसा नाम के शब्द से दी थी. आज हमें ऐसा लगता है कि अहिंसा गांधी का दिया हुआ दर्शन है, लेकिन भारतीय धार्मिक और दार्शनिक विचार परंपरा में, खासकर जैन और बौद्ध दर्शन में यह दो सहस्राब्दियों से मौजूद रहा है. गुजरात के अभिजात्य समाज में जैनियों की अहम मौजूदगी की वजह से गांधी का साक्षात्कार छोटी उम्र में ही अहिंसा से हो गया. अहिंसा का शाब्दिक अर्थ है, ‘‘दूसरों को चोट पहुंचाने की इच्छा का न होना.’’ भारत के स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व हाथ में लेकर उन्होंने जैन दर्शन में मौजूद अहिंसा के सिद्धांत को लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा बनाया.

गांधी के लिए भारत का राजनैतिक लक्ष्य था स्वराज प्राप्त करना, जो न सिर्फ विदेशी राज से मुक्ति का पर्याय था बल्कि दूसरों को नुकसान पहुंचाने की इच्छा से भी मुक्ति यानी अपने भीतर की हिंसक प्रवृत्तियों पर भी काबू रखना था. गांधीवादी संघर्ष में अहिंसा और स्वराज अविछिन्न थे. इसका अर्थ था कि अहिंसा के बगैर न तो निजी और न ही राष्ट्रीय स्तर पर सच्ची आजादी प्राप्त की जा सकती है.

अगस्त, 1947 में भारत का हिंसक तरीके से जो विभाजन हुआ, उसने एक अहिंसक राष्ट्रवादी आंदोलन के गांधी के प्रयासों पर पानी फेर दिया. बमुश्किल छह माह बाद उन्हें हिंदू कट्टरपंथी गोडसे ने गोली मार दी. गोडसे ऐसे कई भारतीयों का प्रतिनिधित्व करता था जिनका मानना था कि गांधी के न रहने पर अहिंसा जैसी अप्रासंगिक चीज पर कोई चर्चा नहीं करेगा. उन लोगों का मानना था कि उत्तर औपनिवेशिक भविष्य में अहिंसा एक नए राष्ट्र के हिंसक तरीकों से प्रवेश की राह में बाधा थी. इतिहास की इस क्रूर करवट के बाद वह गांधी की अपनी धरती थी जिसने सबसे पहले उनकी ओर से अपनी आंखें मूंद लीं और उन्हें भुलाकर आगे बढ़ गई.

आज गुजरात का प्रतीक गांधी नहीं मोदी हैं, जो प्रशासन और विकास के लिए एक जरूरी औजार के तौर पर पूरी बेशर्मी से हिंसा को उसके शाब्दिक अर्थ और भावना में लागू करने के प्रति कटिबद्ध हैं. दरअसल, यहां सिर्फ हिंसा का मामला नहीं है, बल्कि कमजोरों पर वर्चस्व कायम करने, अल्पसंख्यकों को उनकी औकात दिखाने और हिंदू प्रभुत्व स्थापित करने की मंशा है जो मोदी की राजनीति को गांधीवाद विरोधी बनाती है.

गुजरात के मुसलमानों के लिए 2002 के वसंत में मोदी का प्रशासन संरक्षण की बजाए खतरे का स्रोत बन गया था. औपनिवेशिक समय से ही सांप्रदायिक हिंसा के संदर्भ में सरकार को दोष और जिम्मेदारी से मुक्त करने के लिए जिस शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है, वह है ‘‘सांप्रदायिक दंगा’’! दिल्ली 1984, बंबई 1992-93 और गुजरात 2002 को कानून-व्यवस्था लागू करने वाले सरकारी अमले की मदद से अल्पसंख्यक समुदायों के पूर्वनियोजित नरसंहार को स्वत:स्फूर्त दंगे के रूप में प्रचारित किया गया है.

गांधी ने जब अहिंसा की बात की थी, तो वे अपने अनुयायियों को हिंसक प्रवृत्ति छोड़ देने की शिक्षा दे रहे थे. वे अंग्रेजी हुकूम की जोर-जबरदस्ती के बरअक्स लोगों को अपनी ‘‘दंगाई’’ प्रवृत्ति पर संयम रखने का उपदेश दे रहे थे. इसके उलट हमारे नेताओं ने लगातार सुलगती राजनैतिक जमीन के नीचे लावा की तरह दबी हिंसक प्रवृत्ति को भड़काने का काम किया है. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के नवंबर में करीब 3,000 सिखों की हत्या पर राजीव गांधी ने इसे अपरिहार्य बताते हुए कहा था कि ‘‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है.’’ गुजरात 2002 पर मुख्यमंत्री मोदी ने न्यूटन के तीसरे सिद्धांत के तर्ज पर सामाजिक कुपरिभाषा गढ़ते हुए श्क्रिया्य और ‘‘प्रतिक्रिया’’ का सिद्धांत दे डाला.

ऐसा लगता है कि राज्य की संस्थाएं, राजनैतिक दल और सिविल सोसाइटी एक गोल घेरे में स्थित हैं, और कभी-कभी-ऐसे मौकों पर जिनके बारे में पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन वे पूरी तरह निरर्थक नहीं होते-उस गोल घेरे के केंद्र में अकल्पनीय हिंसा का विस्फोट होता है.

महात्मा गांधी ने आशंका जताई थी कि सामाजिक शृंखलाओं और वैयक्तिक चेतना के केंर्द्र में प्रेरक प्रवृत्ति के तौर पर हिंसा ही होती है. लिहाजा निजी संप्रभुता का अर्थ इस आदिम प्रवृत्ति पर काबू पाना होता है. सच्चा स्वराज किसी संप्रभु राज्य के हिंसा पर एकाधिकार में निहित नहीं होता बल्कि व्यक्ति में हिंसा की इच्छा को ही सिरे से खत्म करने में निहित होता है.

आधुनिक राज्य और नफरत के बीच भी एक सक्रिय रिश्ता होता है. आज लोकतांत्रिक भारत के नागरिकों को इन दो तत्वों के प्रति कहीं ज्यादा अपनी आंखें खोलने की जरूरत है. उन्होंने अपने गणराज्य की स्थापना के वक्त इसकी इतनी उम्मीद नहीं की होगी.

अनन्या वाजपेयी की नई पुस्तक राइटियस रिपब्लिक: दी पॉलिटिकल फाउंडेशंस ऑफ मॉडर्न इंडिया हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित हुई है.

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