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रोमांस का उठ गया जनाजा

खोज करने का सौंदर्य खत्म हो चुका है क्योंकि अब हम ऐसी दुनिया के आदी हो चुके हैं जिसमें एक बटन दबाने से फौरन सूचनाएं हम तक पहुंच जाती हैं. फिल्म की कहानी का पूरा मोड़ जानने के लिए तीन घंटे बैठकर फिल्म देखना मौत की सजा जैसा है.

अपडेटेड 16 दिसंबर , 2012

बारह साल की उम्र में मुझे पहली बार वीरेंद्र प्रताप सिंह से प्यार हुआ, यश चोपड़ा की फिल्म लम्हे का वही शांत और परिपक्व वीरेंद्र प्रताप जिसका किरदार अनिल कपूर ने निभाया है. इसके बाद 17 वर्ष की उम्र में द इंग्लिश पेशेंट के काउंट लासज्लो से प्यार हुआ. मैं अपनी ट्वेंटीज में ऐसे हर शांत, कम बोलने वाले लड़के में इन्हें तलाशती कि उसके दिल में उफनता प्रेम का बांध सिर्फ मेरे लिए टूटेगा. अफसोस की बात यह कि सब बेजार और बेसुध निकले.

वीरेंद्र और लासज्लो को मैं कभी नहीं पा सकी क्योंकि उनका कोई वजूद ही नहीं था. वे ऐसे कल्पित किरदार थे जिनके आसपास सपने बुने जाते हैं. रोमांटिक फिल्में हमें फैंटेसी बुनने का मौका देती हैं और हम उम्मीद में जीते रहते हैं. आज उम्मीद बुद्धुओं के लिए होती है और बुद्धुओं पर सिर्फ दया ही की जा सकती है. क्या कहीं, कोई हमारे लिए है? अगर वह हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन या शादी डॉट कॉम पर नहीं ढूंढ़ पाया या पाई है तो हम उसका इंतजार नहीं करने जा रहे हैं.

रोमांटिक फिल्मों की जगह निश्चित रूप से रोमांटिक कॉमेडी ने ले ली है. साउंडट्रैक में वायलिन की लहराती आवाज की जगह तेज धमाके वाले संगीत, पॉप, सीटियां और फ्लश साउंड ने ली है. अपने आशिक के लिए इंतजार करती या उसकी बांहों में समाने के लिए दौड़ती औरत अब पुराने जमाने की मानी जाती है. दर्शक हंसना चाहता है, आंसू बहाने वाले फसाने नहीं चाहता. डायलॉग भी हास-परिहास के तड़के वाले होने चाहिए.

अगर कोई मर्द किसी औरत को बांहों में समेटता है तो उसे ऐसे ‘हंसी वाले जोरदार’ क्षण लाने के लिए अपना सिर उसके सिर से टकराना होगा. अगर वह प्रपोज करता है तो उसे इसे नामंजूर करना होगा क्योंकि शादी की संस्था पुरानी पड़ चुकी है. अब हीरो को ठुकराया नहीं जाता, एक बेस्ट फ्रेंड के रूप में अपनी मूर्खता से ही हीरो उपहास का पात्र बन सकता है. एसएमएस भाषा और शब्द संक्षेप की दुनिया में रोमांस पुराने फैशन की बात हो चुका है, तब सच्चे प्यार का मतलब बलिदान होता था.

रोमांस मर्द और औरत के बीच में होता है. अब रोमांटिक कॉमेडी का मुख्य नायक लड़के और लड़कियों से बड़ा होकर मर्द और औरत में बदल गया है. प्यार सेक्सुअल केमिस्ट्री का पर्याय बन गया है. वे, और शायद हम सब कुर्बानी जैसी चीजों से निपटने के मामले में बहुत अपरिपक्व और आत्मकेंद्रित हैं. यह ‘पहले मैं’ का युग है. 

प्यार का विचार बदल चुका है इसलिए शायद रोमांस की अवधारणा अब वास्तव में कॉमेडी पैदा करने वाली है. मैं इसे जिगसॉ लव सिंड्रोम कहती हूं. हमारे पास अपने को किसी के अनुकूल बनाने या बदलने के लिए अब धैर्य या समय नहीं बचा है. हमें ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो हमारे जीवन में रच-बस जाए.

जैसे ही फेसबुक पर कोई हमारे फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट को स्वीकार करता है, हम अपने संभावित पार्टनर के अतीत, वर्तमान, उसकी पसंद और नापसंद का पता लगा सकते हैं. हमने उनके बारे में राय भी कायम कर ली है और अपना निर्णय भी ले लिया है. समस्या बस इतनी है कि वह व्यक्ति ‘वही’ नहीं है. हर जिगसॉ पीस के चार साइड होते हैं, इसलिए उससे चार निश्चित संभावना हो सकती है. एक के साथ ही क्यों टिके रहें जब तीन अन्य मौजूद हों.

हमारी अपनी आकांक्षा के अलावा हमारे ऊपर और किसी बाहरी ताकत का दबाव नहीं है. हमारे ऊपर मां-बाप का नियंत्रण नहीं है, और  धन, फोन या इंटरनेट के बिना प्रेमी के साथ भागकर किसी नदी के किनारे बने झोंपड़े में रहना बिलकुल अव्यावहारिक बात है. आज मेरी 15 वर्ष की भतीजी और उसके दोस्तों की अपने भविष्य के लिए बस एक इच्छा है: वह बेशक सफेद घोड़े पर सवार कोई सुंदर राजकुमार न हो, लेकिन वह खूब धनी हो.

बिना किसी द्वंद्व के यह कहना होगा कि उपभोगवाद में लिप्त होने की हमारी निरंकुश इच्छा के अलावा रोमांस बदनसीब बेवकूफों के लिए है. अपनी प्रेमिका के साथ गिटार के तार छेड़ते हुए प्रेमगीत गाते लड़के विश्वसनीय नहीं हैं. केवल वेबकूफ-रोमांटिक फूल्स-ही बेपनाह जज्बे के साथ प्यार करते हैं. यथार्थवादी तो महंगी कार हासिल करने की कोशिश करता है.

परीकथाएं बच्चों के लिए होती हैं. वयस्कों के लिए ट्विटर है जहां किसी फिल्म के उसके शुरुआती हफ्ते से पहले ही हिट या फ्लॉप होने का पूर्वानुमान लगा लिया जाता है. दर्शक फिल्म देखने से पहले ही उसकी कहानी जानना चाहते हैं. खोज करने का सौंदर्य खत्म हो चुका है क्योंकि अब हम ऐसी दुनिया के आदी हो चुके हैं जिसमें

एक बटन दबाने से तत्काल सूचनाएं हम तक पहुंच जाती हैं. फिल्म की कहानी का पूरा मोड़ जानने के लिए तीन घंटे बैठकर फिल्म देखना मौत की सजा जैसा है. बैटरी लाइफ  घटते ही फोन और रिश्ते दोनों व्यर्थ लगने लगते हैं. डाटा ट्रांसफर में तस्वीरें और संदेश गुम हो जाते हैं. अब ऐसे बक्से नहीं होते जिनमें भरी तस्वीरें और लेटर धीरे-धीरे संपदा में बदल जाएं. भावनाओं की बंजर भूमि लगातार बड़ी और बड़ी होती जा रही है. हम नवीनतम ऑपरेटिंग प्लेटफॉर्म और एक खाली मेमोरी कार्ड के दम पर आजाद और बोझमुक्त बने हुए हैं.

अब ऐसा लगता है कि रोमांटिक फिल्में किसी गुजरे जमाने की चीज हैं. शायद हमने ऐसी अंतिम फिल्म देख ली है. इसके लिए हमें खुद को और अपने स्मार्टफोन को दोष देना होगा.
देविका भगत पटकथा लेखक हैं

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