अरे मां! सच में.’’ झल्लाकर अपने होंठ भींचते हुए मैं बड़बड़ाई, ‘‘तुम नहीं समझेगी.’’ 20-22 साल की उम्र में दुनिया को अपनी मुट्ठी में भर लेने के एहसास का दंभ मेरी आवाज में उतर आया था. मुझे नहीं पता कि हम किस बात पर बहस कर रहे थे, मैं बस इतना जानती हूं कि मैं सही थी. ‘‘आप मुझसे 25 साल बड़ी हैं!’’ मैंने आंखें नचाकर बात खत्म की और सिर झटकते हुए जता दिया कि मेरा गुस्सा जायज है.
मैं रसोई से अभी निकली भी नहीं थी कि मेरे बदमिजाज लफ्जों को वास्तविकता की बुनियाद पर तौलती आंखों के तेज ने भस्म कर दिया. गला साफ कर सर्वज्ञाता के स्थितप्रज्ञ आत्मविश्वास से भरपूर मेरी मां ने कहा, ‘‘23 साल.’’ वे मुस्कराईं. उसके आगे कुछ नहीं कहा.
मैं सकते में थी, क्योंकि अचानक मुझे अपना वजूद सारहीन लगने लगा था. मैं पलटकर कोई जवाब नहीं दे पाई. कोई विरोध नहीं. कुछ भी नहीं. एक अडिय़ल जिद टिकी थी. अनकहे लफ्जों का करारा तमाचा मुझे अपनी वास्तविकता का आईना दिखा पानी-पानी कर रहा था.
उनकी शादी 22वें साल में हो गई थी, अगले साल मैं उनकी कोख में आ गई और जब उन्होंने एम.ए. किया तो मैं दुधमुंही बच्ची के रूप में उनकी गोद में थी. उन्होंने न सिर्फ मां की अहम भूमिका बखूबी निभाई, बल्कि अपनी पढ़ाई भी सही तरीके से पूरी की. इसके ठीक उलट मैं 24 साल की होने पर भी अनब्याही थी, कुछ ज्यादा ही पढ़ चुकी थी, फिलहाल बेरोजगार थी और अपने मां-बाप के पास रह रही थी. मेरे लिए उस समय सबसे सही शब्द था-हारा हुआ इंसान.
मुझे शायद पहले विचार कर लेना चाहिए था कि शिकागो के उस छोटे-से कस्बे की गप्पें हांकती बेकार बैठी आंटियों के बीच आने की बजाए अगर मैं अफ्रीका चली जाती तो अच्छा होता, क्योंकि वहां मुझे कोई नहीं पहचानता. पर मैं ऐसा नहीं कर सकती थी, क्योंकि मैं अकेली नहीं थी.
महानगरों में पलते-बढ़ते और 20 साल की आयु पार करते सारे लोगों का कमोबेश वही हाल था ठीक मेरी तरह. मेरे ज्यादातर दोस्त अविवाहित थे और टीन एज से ही डेटिंग कर रहे थे, करियर को लेकर इरादा पुख्ता था, खुशियों को शिद्दत से जीने की अकुलाहट और सप्ताह के अंत में मस्ती भरी शराब का दौर.
शादी और बच्चों की जिम्मेदारी या कर्ज चुकाने जैसे काम स्कूल में पढ़ाए जाने वाले उबाऊ सिद्धांत सरीखे थे जिसे समय आने पर हम ‘‘संभाल लेंगे,’’ सौ साल बाद ही सही, क्या फर्क पड़ता है. वैसे हम छठे दशक के उन निठल्ले, गंदे-मटमैले कपड़ों वाले स्वच्छंद हिप्पियों जैसे भी नहीं थे, हम तो एक अलग किस्म की आग से खेल रहे हैं पैसा और आजादी.
महज एक पीढ़ी पहले एक ‘‘छोटे से शहर’’ लखनऊ में मेरे मां-बाप को इनमें से कुछ भी नहीं हासिल था. जिम्मेदारियों के नाम पर मेज पर खाना परोसना, बच्चों को पढ़ाना और बहनों की शादी कराना जैसी चीजें थीं. मां-बाप का कहा मानना ही सब कुछ था. खुशहाली का मतलब था परिवार की जिम्मेदारियों और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन और साधारण आय के भरोसे एक सुरक्षित भविष्य तैयार करना. उनकी जिंदगी का एक खास ढर्रा था. सबकी भूमिकाएं तय थीं और शायद ही उन पर सवाल उठाए जाते. औरतें घर और बच्चों को संभालतीं और मर्द कमाते. असंतोष किसी खराब मौसम-सा ही बर्दाश्त कर लिया जाता कि चलो, यह बीत जाएगा या हम खुद को इसके अनुसार ढाल लेंगे. लेकिन क्या वे खुश नहीं थे?
मैंने बीटल्स स्टाइल बेलबॉटम में अपने पापा की कई तस्वीरें देखी हैं और सहेलियों के साथ सैलून से लौटने के बाद अपनी मां को हंसते देखा है. यह काफी है समझने के लिए कि वे भी हमारी तरह ही सामान्य बच्चे थे जो जीवन को अमर मानते थे. सेलफोन और इंटरनेट नहीं थे, लिहाजा दुनिया छोटी थी और जिंदगी ज्यादा आसान दिखती थी.
आज बड़े, बदमिजाज शहरों में चीजें बिल्कुल अलग हैं. जहां 30 साल पहले बड़े-बुजुर्ग शादी तय करते, वहीं आज प्रेम-विवाह का चलन नजर आ रहा है. और यही नहीं, उसमें भी कई प्रयोग हो रहे हैं. जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति के कारण शादियों में देरी हो रही है, क्योंकि हम अपने साथी में ‘‘पर्फेक्शन’’ तलाश रहे हैं, हमें एक ऐसा आईना चाहिए जो हमारी ख्वाहिशों को तो पूरा करे पर हमारे दोष न दिखाए. बच्चों को जन्म देने की कोई चाह नहीं, क्योंकि तलाक की आशंका सहमा देती है. हम अपने करियर को एक सफल मुकाम पर पहुंचाना चाहते हैं, किसी दूसरे इंसान के अपने जीवन में आने से पहले जी भरकर इसका आनंद उठाना चाहते हैं.
तलाक, देखा जाए तो इस लफ्ज ने हमारे मां-बाप की पीढ़ी से ही अपने डैने पसारने शुरू कर दिए थे. हो सकता है कि उनके बच्चों की उम्र 20 साल से ऊपर हो, लेकिन उन्होंने भी खुशियां ढूंढ ली थीं, जो शादीशुदा जिंदगी में तो कतई मौजूद नहीं थीं. रिश्ते में अलगाव, विषाद, बेडिय़ों में बंधी भूमिकाएं ऐसे मसले थे जिन्हें आवश्यक व्यक्तिगत या मेडिकल देखरेख नहीं मिली और अगर उस तरफ नजर गई भी तो बच्चों की कॉलेज की पढ़ाई या कर्ज चुकाने के नाम पर नजरअंदाज कर दिए गए.
क्या मेरे मां-बाप की पीढ़ी की औरतों को ऐसा मौका मिला कि वे अपनी निजी प्रतिभा को पहचान सकें? उनके कॉलेज डिप्लोमा पर धूल जमती गई, क्योंकि वे परिवार के सदस्यों के मनपसंद पकवान तैयार करने में लगी थीं. क्या मुखिया के ओहदे पर बैठे हमारे पिता ने अपने दायित्व से कभी भी आंखें फेरीं? फिर भी, इतना त्याग करने के बावजूद क्या हमारी सारी आजादी और वित्तीय सक्षमता को देखते हुए वे हमारी जगह लेना चाहेंगी?
आज शादी के लिए कोई सांस्कृतिक दबाव नहीं है, लेकिन शादी के टूटने और अपनी मर्जी से पैसे खर्च करने की आजादी को खोने का डर एक नई पौध को जन्म दे रहा हैरू आजाद और खुद को तलाश रहा अकेला जीव, जो 40 साल की उम्र की ओर बढ़ रहा है, यूरोपियन कारों में घूम रहा है, डिजाइनर चीजें पहन रहा है, शहर के सबसे महंगे इलाके में फ्लैट खरीदकर रह रहा है और परिवार के नाम पर पत्नी या बच्चों की बजाए उसके पास हैं बेहद नफासत से चुने गए खास दोस्त. बीमार मां-बाप की देखभाल करने की ओर बेशक उनका ध्यान नहीं, लेकिन इसमें कम-से-कम वह मलाल तो नहीं कि बच्चों ने शादी कर ली और उन्हें दरकिनार कर दिया. क्या यही है खुशी का नया चेहरा?
महज एक दशक पहले और हाल तक 30 साल के करीब पहुंचती आयु की लड़की के बारे में कहा जाता था कि उसकी शादी की उम्र निकली जा रही है. आज उम्र के बारे में शायद ही पूछा जाता है. शारीरिक चुस्ती चिरयुवा रहने की निशानी है. विज्ञान ऐसी सुविधा दे रहा है कि आप बाद में बच्चों को जन्म दे सकेंगे. सेक्स आज संबंध या सामाजिक खेल बनकर रह गया है, इसका बच्चे को जन्म देने से कोई सरोकार नहीं. यौन अभिरुचि को पहचान मिल रही है और लोग खुद को गे-स्ट्रेट वर्गों में अलग-अलग बांट रहे हैं. सब कुछ मंजूर है.
जाने-अनजाने अपने मां-बाप को चोट पहुंचाते हम ऐसी दिशाओं में भी बढ़ रहे हैं जिसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी. हमारी पीढ़ी के जो लोग हमारे मां-बाप की राह चुनकर एकल परिवार की नींव डाल रहे हैं, उनके लिए शादी की परिभाषा और मर्द-औरत की भूमिकाएं भी बेहतर हो रही हैं. दोनों ही कमा रहे हैं, कभी-कभी औरत भी बतौर मुखिया कमान संभालती दिख रही है. पति-पत्नी के बीच उभरी खटास से विवाहेतर संबंध या ओपन मैरिज पनपने लगे हैं. शादियों में देरी के कारण तलाक की संभावनाएं कम हुई हैं, लेकिन अब ये वैवाहिक संबंध विशेषज्ञों की सलाहों के मुहताज बनने लगे हैं, कभी-कभी तो शादी के पहले ही एक्सपर्ट सलाह की जरूरत पड़ जाती है.
हालांकि बड़े शहरों में तय शादियां अब भी दिखती हैं, लेकिन ये अपवाद बनकर रह गई हैं. नई पीढ़ी बेझिझक अंतरजातीय, भिन्नधर्मी और समलैंगिक विवाह को आजमा रही है. हमारे मां-बाप को इस सीमा तक प्रयोग करने का मौका नहीं मिला होगा, लेकिन उन्होंने गरिमा के साथ अपनी पहचान बनाई.
उनकी आंखों की आस साफ कहती है कि हमारी जिंदगी में खुशियां हों. पर सच्चाई यह है कि हमारी पीढ़ी उस आग को नहीं संभाल सकती जिससे खेल रही है. अकेलापन एक नया एहसास है जिससे अतीत की पीढ़ी को जूझना नहीं पड़ा था. अंतहीन फैले विकल्पों ने बेहिसाब चीजें परोस दी हैं. लेकिन अंधेरे से एक सच अवतरित हो रहा है, हमने गिरकर खड़ा होना सीख लिया है.
मां के साथ हुई उस दिन की बहस के बाद वक्त के साथ मैंने शब्दों के मनकों में अपने रास्ते के संकेत ढूंढ लिए हैं. महानगरों में बसे अपने कई दोस्तों की तरह मैं जानती हूं कि पत्नी और मां की भूमिका मेरा भी इंतजार कर रही है. हर पीढ़ी को एक तूफान से गुजरना होता है. फर्क इतना ही है कि सफर के दौरान छतरी बदल जाती है.

