एक ऐसे वक्त में जब चीन की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों ही तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं और देश अपने पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद में उलझा हुआ है, बीजिंग में एक दशक में एक बार होने वाला राजनैतिक बदलाव अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा है. इसने चीनी समाज के भीतर जारी हलचल से ध्यान बंटाने की कोशिश की है. चीन आज चौराहे पर खड़ा है और शी जिनपिंग के नेतृत्व में अगला दशक देश की दिशा के लिए निर्णायक साबित होगा.
चीन के इतिहास में सत्ता का हस्तांतरण उथल-पुथल और खूंरेजी के लिए जाना जाता है. पहले शांग वंश से लेकर अब तक हुए सियासी बदलाव अकसर हिंसक रहे हैं और सत्ता को वापस पाने के लिए भी यहां बल प्रयोग हुआ है. चीनी विश्लेषक जियाओ हान इसे ‘‘कुल्हाड़ी गिरोह’’ (फू तोउ बांग) की परंपरा की संज्ञा देते हैं, जहां प्राचीन समय से कुल्हाड़ी ही सत्ता का पर्याय रही है. इसी का आधुनिक संस्करण माओत्से तुंग ने अपने शब्दों में कुछ यूं रखा था, ‘‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है.’’
1949 की सांस्कृतिक क्रांति के बाद जन्मे पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में घरेलू साजिशों और राजनैतिक सफाए का सिलसिला लंबा रहा है. माओ और देंग शियाओपिंग ने अपने दौर में कुल पांच ऐसे लोगों से छुटकारा पा लिया जो सत्ता के उत्तराधिकारी हो सकते थे. इनकी या तो अचानक रहस्यमय तरीके से मौत हो गई या इन्हें हिरासत में ले लिया गया.
सत्ता में पहला अहिंसक बदलाव 2002 में हुआ था जब जियांग जेमिन ने जिंताओ के लिए गद्दी खाली कर दी थी. शी के गद्दी संभालने से पहले जमकर सत्ता संघर्ष हुआ जिसमें एक उभरते हुए सितारे बो शिलाई का नामोनिशान मिट गया. उनकी पत्नी को एक ब्रिटिश नागरिक की हत्या में फंसा दिया गया. फर्जी मुकदमों के इतिहास में यह सबसे ताजा और खतरनाक है.
आज चीन में सत्ता बंदूक की नली से भले ही न निकलती हो, जैसा कि माओ के वक्त में था-उन्हें लाखों लोगों की हत्या का जिम्मेदार माना जाता है-लेकिन यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि शी का शीर्ष पर पहुंचना दरअसल उनके करीबी सैन्य समर्थन से जुड़ा है. इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि चीन के दूसरे नेताओं के मुकाबले शी इस मामले में अलग हैं कि फौज के साथ उनके रिश्ते अच्छे हैं और सेना उन्हें अपना आदमी मानती है.
कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर उभरते हुए शी ने संरक्षणवादी के तौर पर सेना से अपने संबंध मजबूत किए, एक प्रांतीय सेना की कमान अपने हाथ में ली और रक्षा मंत्री के वरिष्ठ परामर्शदाता बने रहे. उनकी पत्नी पेंग लिउआन भी सेना में हैं और उसकी संगीत टुकड़ी की असैन्य सदस्य रह चुकी हैं.
संरक्षणवादियों के वर्चस्व वाली पोलितब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी के गठन का लाभ सेना को मिला है, जिसका पिछले दिनों नीतिगत मामलों में दखल बढ़ा है. इसे चीन के मजबूत होते आग्रहों से भी समझा जा सकता है. पार्टी अब किसी एक नेता की आज्ञाकारी इकाई नहीं रह गई है, बल्कि उसे अपनी राजनैतिक वैधता और घरेलू स्तर पर व्यवस्था कायम रखने के लिए सेना पर निर्भर होना पड़ा है.
आधिकारिक रूप से ग्रामीण इलाकों में 10 फीसदी सालाना से ज्यादा दर से बढ़ रहे असंतोष प्रदर्शनों और तिब्बत के विशाल पठार, जिनजियांग व मंगोलिया में मजबूत होते अलगाववादियों के साथ चीन ऐसा देश हो गया है जिसका आंतरिक सुरक्षा पर खर्च राष्ट्रीय रक्षा बजट को पार कर चुका है.
चीन में राष्ट्रवाद और सैन्यवाद किस कदर मजबूत हो रहा है, इसे ‘‘राजकुमारों’’ यानी क्रांतिकारी नायकों के बच्चों की उस नई फसल से समझा जा सकता है जिनके सेना के भीतर व्यापक संपर्क हैं. शी भी उसी कतार से आते हैं. ऐसे युवा सैकड़ों की संख्या में हैं और नई स्टैंडिंग कमेटी में इनका प्रभुत्व है. आपसी खींचतान के बावजूद सरकार और अर्थव्यवस्था में इनकी भूमिका अहम है.
उपरोक्त तथ्यों के निहितार्थ जितने घरेलू मोर्चे पर अहम हैं उतने ही महत्वपूर्ण बाहर के लिए भी हैं. सत्ता शीर्ष की लड़ाई में सुधारवादी ताकतों के संरक्षणवादियों के समक्ष कमजोर होते जाने के चलते बड़े आर्थिक सुधारों की तस्वीर धुंधली नजर आ रही है. देंग शियाओपिंग के बाद से चीन ने मार्क्सवाद को तो तिलांजलि दे दी है, लेकिन लेनिनवाद को बचाए रखा है. तानाशाही एक ऐसा तत्व है जिसके दरवाजे सुधार के लिए अब भी बंद हैं. चीन की भ्रष्ट और धड़ेबाज राजनैतिक संस्कृति और रक्तरंजित इतिहास कभी भी राजनैतिक सुधारों के लिए खुला नहीं रहा. उसने हमेशा राजनैतिक क्रांति को रास्ता दिया है.
चीन की आंतरिक नीति का असर उसकी विदेश नीति पर भी पड़ेगा. नागरिक नेतृत्व की कीमत पर जिस कदर सेना मजबूत हुई है (माओ के बाद से हर चीनी नेता अपने पूर्वज से कमजोर ही साबित हुआ है), अपने पड़ोसियों के प्रति उसके रूखे होते जा रहे व्यवहार में यह साफ झलकता रहा है. बढ़ता हुआ आंतरिक दमन और भौगोलिक विस्तार के उद्देश्य से बाहरी देशों के प्रति आक्रामक रवैया एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
भारत के लिए चीन में सत्ता संक्रमण का यह वक्त इससे बुरा नहीं हो सकता था-कम्युनिस्ट पार्टी की 18वीं राष्ट्रीय कांग्रेस और नए नेतृत्व का सामने आना ऐसे समय में हो रहा है जब 1962 के युद्ध के 50 साल पूरे हुए हैं. अब तक उस जंग की आहट एक-दूसरे के प्रति हमारे ऐतिहासिक शिकवे-शिकायतों में गूंजती है. चीन ने अब तक 1962 की उस जंग पर अपनी चुप्पी साधे रखी है. भारत और चीन के दूसरे पड़ोसियों के लिए समझदारी भरी सलाह यही होगी कि वे ‘‘अपने बुनियादी हितों’’ के विस्तार के प्रति कटिबद्ध पहले से ज्यादा आक्रामक चीन को झेलने के लिए खुद को तैयार कर लें.
ब्रह्म चेलानी भू-रणनीतिक मामलों के जानकार और लेखक हैं

