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अब खेलने की इच्छा नहीं: मो. अज़हरुद्दीन

''कपिल पाजी, राजसिंह डूंगरपुर, कमल मोरारका वगैरह ने वास्तव में मेरा साथ दिया. ये लोग पूरी तरह से मेरे साथ खड़े रहे.”

अपडेटेड 24 नवंबर , 2012

आजकल मिलने पर सबसे पहले लोग मुझसे यही पूछ रहे हैं कि मैं अपने ऊपर से आजीवन प्रतिबंध हटने की बात से कितना खुश हूं? या फिर यह कि पिछले कुछेक दिन मेरी जिंदगी के बीते 12 वर्षों से किस तरह से अलग रहे हैं?

मैं बहुत जज्बाती आदमी नहीं हूं. अपने जज्बात को काबू में रखना मैं अच्छी तरह से जानता हूं. मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि मेरे नाम के ऊपर लगा दाग हट गया है. (दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 2000 में खेले गए) अपने आखिरी टेस्ट मैच में जब मैंने शतक ठोका था तो मैं पूरी तरह से फिट था और अगले दो साल और खेल सकता था. यही एक चीज थी जो इन सालों में मुझे लगातार सालती रही.

मैं उम्मीद कर रहा था कि मेरी अग्निपरीक्षा का दौर जल्द खत्म होगा. लेकिन शायद उसे अभी ही जाकर खत्म होना था. यह पहले खत्म हो गया होता तो मुझे ज्यादा खुशी होती. लेकिन आपको हमेशा धैर्य बनाए रखना होता है क्योंकि भविष्य में उसका बेहतर नतीजा होता है. मेरा मजहब भी मुझे यही सिखाता है. बीच-बीच में ऐसा भी समय आता है जब हमें हद दर्जे तक कसौटी पर कसा जाता है. तब आपको साबित करना होता है कि आपमें कितना सब्र है.

मुझे उस वक्त बड़ी तिलमिलाहट महसूस होती थी जब कुछ लोग टीवी पर एक विशेषज्ञ के रूप में खेल के बारे में बात करते वक्त मेरे बारे में बतंगड़ बनाने की कोशिश करते थे. मुझे लगता है कि मेरे बारे में लोगों ने कुछ ज्यादा ही छूट ले ली. हर किसी को अपनी रोजी-रोटी कमाने का हक है, यहां तक कि कैदियों को भी काम के बदले पैसे मिलते हैं. लेकिन मैंने कभी किसी पर कोई सवालिया निशान नहीं लगाया, सब कुछ बरदाश्त किया.

मुश्किल में फंसने पर आप खुद ही बहुत सारी चीजें सीखते हैं. बुरे दौर में मेरे साथ बहुत कम ही लोग खड़े हुए. मैं किसी पर इल्जाम नहीं लगा रहा. जब आपके ऊपर आरोप लगे हों तो लोग आपके संपर्क में नहीं आना चाहेंगे, दूर रहने की कोशिश करेंगे. उन्हें इस बात का अंदेशा रहेगा कि कहीं उन्हें भी न लपेट लिया जाए. लेकिन यह सब आपकी अपनी निजी राय होती है. मैं उस आदमी का हमेशा साथ दूंगा जो मुश्किल में फंस गया है क्योंकि ऐसे ही वक्त में तो आपको मदद की जरूरत होती है.

लेकिन मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. मैं किसी से भी यह उम्मीद नहीं करता था कि वह मेरे समर्थन में कुछ कहे. कपिल पाजी, (मरहूम) राजसिंह डूंगरपुर, कमल मोरारका वगैरह ने वास्तव में मेरा साथ दिया. कई ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने परदे के पीछे रहकर मेरा समर्थन किया, लेकिन ये तीन लोग वास्तव में मजबूती से मेरे साथ खड़े रहे. हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया भर के मेरे प्रशंसक मुझे फोन करते रहे और संदेश भेजते रहे.

अब मेरा सबसे बड़ा काम मुरादाबाद के लोगों की सेवा करना है क्योंकि उनके प्रति मेरी बड़ी जिम्मेदारी है. सिर्फ  इसलिए नहीं कि मैं वहां से सांसद हूं, बल्कि इसलिए भी कि उनके साथ मेरी भावनाएं जुड़ गई हैं. मुझे अब भी याद है कि जब चुनाव के लिए टिकट हासिल करने के बाद मैं पहली बार वहां गया तो लोगों ने मेरे प्रति जबरदस्त प्यार और लगाव दिखाया. लोग मेरे करीब आने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे थे. मेरे शरीर को इतनी धक्का-मुक्की तो उस वक्त भी नहीं झेलनी पड़ी थी जब मैं खेलता था. मैंने महसूस किया कि अल्लाह की बरकत हासिल करने के लिए मुझे कुछ अच्छा करना होगा.

बीती बातें भूलकर अब मैं आगे बढ़ चुका हूं. मुझसे बार-बार पूछा गया कि क्या मुझे अपने करियर का 100वां टेस्ट न खेल पाने का अफसोस है. देखिए, रिकॉर्डों की परवाह मैंने कभी भी नहीं की. आप जब एक लंबे समय तक खेलते हैं तो रिकॉर्ड बनते ही हैं और एक दिन वे टूटते भी हैं. लोग पूछते हैं कि 100वां टेस्ट न खेल पाने का दुख तो होगा ही. इस पर मैं उनसे कहता हूं कि 99 टेस्ट खेलना भी मेरे लिए खुशी की बात है क्योंकि इतना खेलने वाले भी बहुत कम खिलाड़ी हैं.

प्रतिबंध के दौरान मैंने कभी यह कोशिश नहीं कि मुझे कहीं क्रिकेट खेलने का मौका मिल जाए. सांसदों के कुछ मैच और एक वेटरन सीरीज के अलावा मुझे कुछ और खास खेलने को नहीं मिला. किसी को दिली दुख पहुंचाए बगैर मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि सांसदों के ये मैत्री मैच कोई बहुत रोचक नहीं होते. उन्होंने मुझसे अपनी टीम का कप्तान बनने को कहा लेकिन उनकी कप्तानी करना बहुत कठिन होता है. मैं सिर्फ खेल का मजा लेना चाहता था और वास्तव में मुझे पाकिस्तानी वेटरंस के साथ सीरीज में बल्लेबाजी करने में खासा मजा आया था. ये कोई बहुत कांटे वाले मैच नहीं थे लेकिन आप तो जानते ही हैं कि भारत-पाकिस्तान के बीच खेल आम तौर पर किस तरह से होता है. मजे के लिए रविवार को भी मैच खेलने में मुझे झिझक नहीं होती.

मैं आज भी अपना वक्त उसी रूटीन में गुजारने की कोशिश करता हूं जैसा कि पूरे जीवन में किया है—मसलन जिम जाना. मेरे लिए फिटनेस कोई एक बार की चीज नहीं बल्कि जीवनभर चलने वाली चीज है. आप यह नहीं कर सकते कि 15 दिन में वजन घट जाए और अगले छह महीने तक जीभर खाते रहें. आपको हमेशा यह देखना होगा कि आप दिनभर में दो से तीन बार खाना किस तरह से खाते हैं.

अब 49 वर्ष का हो जाने के बावजूद अपने फिटनेस को देखते हुए मैं अब भी चाहूंगा तो खेलने के बारे में सोच सकता हूं लेकिन मुझे नहीं लगता कि अब मेरे अंदर और खेलने की कोई इच्छा बची है. हां, अगर मुझे मौका मिला तो मैं क्रिकेट का अपना ज्ञान युवाओं के बीच जरूर बांटना चाहूंगा.

(जी.एस. विवेक से बातचीत पर आधारित)

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