पश्चिमी यूरोप में बाड़ाबंदी आंदोलन (एनक्लोजर मूवमेंट) ने औद्योगिक क्रांति से भी पहले भूमि बाजार को मुक्त किया. लेकिन हम अब भी इसे लेकर जूझ रहे हैं. विकास के लिए सभी संसाधनों का कुशल इस्तेमाल जरूरी है. इन जरूरी संसाधनों में जमीन भी है, सिर्फ पूंजी और श्रम ही नहीं. इन तीनों मामलों में अकुशल नीति इनके सक्षम उपयोग में बाधा डालती है.
शहरीकरण और विकास से दुर्लभ संसाधनों की मांग बढ़ रही है. लगभग 2,500 वर्ग मीटर प्रति व्यक्ति जमीन के साथ भारत की स्थिति खराब भी नहीं है. कई देशों ने इससे कम जमीन में अच्छे से काम चलाया है. यहां जमीन की गुणवत्ता बहुत सारे देशों से बेहतर है. इसलिए मामला यह नहीं है कि हमारे पास जमीन नहीं है, बल्कि हम इसका ठीक से उपयोग नहीं करते हैं.
इस पर विचार-विमर्श अकसर बुनियादी ढांचा, औद्योगीकरण और खनन के लिए भूमि अधिग्रहण, मुआवजे और पुनर्वास तक सीमित रहता है. लेकिन इस बाजार को ढंग से नहीं चलने देने वाली विकृतियां ज्यादा गहरी हैं. इसके कुछ कारण तो ऐतिहासिक और औपनिवेशिक हैं. हम आगे बढ़ नहीं पाए हैं. सक्षम श्रम बाजार की खोज में हम उम्मीद करते हैं कि भारतीय उद्यमी चीन और पूर्वी एशियाई देशों की तरफ रुख करें. सक्षम भूमि बाजार की तलाश में हम उम्मीद करते हैं कि भारतीय उद्यमी अफ्रीका चले जाएं. यह हास्यास्पद है.
पहली बात, लोगों को कृषि कार्य से बाहर निकलना है. लगभग 85 प्रतिशत भूस्वामियों के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है. वैसे तो जमीन से काम चल पाना मिट्टी की गुणवत्ता और उसके उपयोग पर निर्भर करता है, लेकिन बड़े स्तर पर खेती का आर्थिक लाभ इतने छोटे रकबे में नहीं मिल पाता है.
भूमि अधिग्रहण का विरोध अकसर कौशल यानी स्किल संबंधी समस्या के कारण होता है. कौशल की कमी के कारण वर्तमान और अगली पीढ़ी के लिए कृषि से अलग किसी और क्षेत्र में रोजगार पाना कठिन होता है. ऐसे में वर्तमान और प्रस्तावित कानूनों में हम अधिग्रहण/क्षतिपूर्ति को पुनर्वास समझ लेते हैं. जहां मुआवजा जमीन के मालिक के लिए होता है, वहीं पुनर्वास सभी के लिए होता है.
दूसरी बात यह है कि लगान के पुराने सर्वेक्षणों के कारण स्वामित्व पर काफी विवाद है. भूमि दस्तावेजों का कंप्यूटरीकरण दरअसल राजस्व के दस्तावेजों और पंजीकरण का कंप्यूटरीकरण है. यह न तो स्वामित्व तय करता है, न ही विवादों और मुकदमों से बचाता है.
तीसरी बात, भूमि की चकबंदी का काम कुछ ही राज्यों ने गंभीरता से किया है. चौथे, जमीन पर अधिकार को अलग भी किया जा सकता है, जिससे स्वामित्व और काश्तकारी को अलग किया जा सकता है. यह अंतर नहीं रखने के कारण काश्तकारी गैरकानूनी हो जाती है (विभिन्न राज्यों में अलग-अलग स्थितियां हो सकती हैं). पांचवां, स्टांप शुल्क की दर ऊंची होने के कारण लोग सौदे की रकम कम दिखाते हैं. अप्रत्यक्ष करों में मुकम्मल सुधार करके स्टांप शुल्क को खत्म करना चाहिए.
छठी बात, कृषि भूमि गैर-किसानों को बेचने या जनजातीय भूमि गैर-जनजातीय लोगों को बेचने पर प्रतिबंध है. लेकिन इन कानूनों का शायद ही पालन होता है. सातवें, कृषि भूमि को गैरकृषि भूमि में बदलने पर प्रतिबंध है. लेकिन ऐसे बदलाव में एक तरह की मनमानी और अपारदर्शिता ही है, जिससे इन नियमों का दुरुपयोग आसान हो जाता है. यह क्षेत्र नेताओं के लिए पैसा जुटाने का प्रमुख जरिया बन गया है. यहां तक कि जमीन के सरकारी अधिग्रहण में भी किसानों को कृषि भूमि का ही मुआवजा दिया जाता है और जमीन के उपयोग में बदलाव से होने वाले फायदे से उन्हें वंचित कर दिया जाता है.
आठवीं बात, अलग-अलग कानूनों की धाराओं से शहरी और ग्रामीण जमीन के बीच कृत्रिम अंतर बना दिया गया है. यह अंतर प्रस्तावित कानून में भी है. शहरी और ग्रामीण परिभाषाएं जनगणना में भी हैं. ग्रामीण इलाके लगातार शहरी इलाकों में बदल रहे हैं. ऐसे में कानून के जरिए ऐसी कटेगरी बनाकर विभेद पैदा करने का विचार ही गलत है. नौवीं बात, शहरी जमीन पर बहुत-सी बातों का असर होता है, जैसे सर्किल रेट, भवन संबंधी कानून, किराया नियंत्रण और सरकार के पास बड़ी मात्रा में जमीन होना जो बाजार भाव पर खरीदी हुई नहीं है. जमीन की यह कमी वास्तविक नहीं, कृत्रिम है. इसके अलावा, इन नियमों में भी दुरुपयोग की गुंजाइश रहती है.
किसी भी बाजार को श्रेणियों में बांट देने से वह कारगर नहीं हो सकता. भूमि बाजार इसका अच्छा उदाहरण है. अगर अर्थशास्त्री इस विभाजन को खराब मानते हैं तो आखिर यह क्यों जारी है? इसे पूरा तो नहीं, पर कुछ हद तक विरोध के राजनैतिक अर्थशास्त्र से समझा जा सकता है. साफ तौर पर नेता और नौकरशाह इस बात को समझते हैं कि आम लोगों के लिए खराब अर्थशास्त्र कुछ खास लोगों के लिए अच्छा अर्थशास्त्र है. इससे सरकारी राजस्व भले ही कम हो, पर निजी कंपनियों या व्यक्तियों की आय में इजाफा ही होता है.
कृषि ही नहीं, सभी तरह की जमीन को सातवीं अनुसूची में दर्ज राज्य सूची में रखना अच्छा विचार हो सकता है. तब जो भी राज्य भूमि सुधार करना चाहेंगे, उनके लिए ऐसा करना संभव होगा और केंद्रीय कानून उनकी राह में बाधा नहीं बनेगा. राज्य इस मामले में ज्यादा प्रगतिशील हो सकते हैं. आखिर क्यों रैयतवाड़ी और यहां तक कि महलवाड़ी व्यवस्था वाले राज्यों ने जमींदारी व्यवस्था वाले राज्यों से अच्छा प्रदर्शन किया? विकास के कारण कभी एकतरफा नहीं होते. लेकिन अलग-अलग राज्यों में भू-स्वामित्व को अलग करने और विकेंद्रीकरण करने के आधार पर विकास में अंतर के पहलू पर जरूर विचार करना चाहिए.
बिबेक देबरॉय दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में प्रोफेसर हैं.

