तब मलाला यूसुफजई सिर्फ 11 बरस की थी. मोती जैसा शफ्फाक सफेद रंग, बड़ी-बड़ी काली आंखें और उनमें भरा बेहिसाब आत्मविश्वास. वह सातवीं कक्षा में थी. उसका स्कूल उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के खूबसूरत स्वात जिले के सबसे बड़े शहर मिंगोरा में था, जिसे एक दिन तालिबान के फरमान पर बंद कर दिया गया. तब मलाला को सियासत का अलिफ-बे भी नहीं मालूम था. वह सिर्फ इतना जानती थी कि उसे और उसकी सारी सहेलियों को स्कूल जाना बहुत अच्छा लगता है और शायद अब वे कभी स्कूल नहीं जा पाएंगी.
मलाला कहती हैं, ‘‘शायद यही वह दिन था, जब मुझे तालीम की अहमियत का अंदाजा हुआ. पहले मैं नहीं जानती थी कि मैं क्यों स्कूल जाती हूं.” स्कूल के दरवाजे बंद हो गए, लेकिन किताबों के दरवाजे खुल गए.
आज मलाला तहरीक-ए-तालिबान के जानलेवा हमले के बाद जिंदगी और मौत से जूझ रही है. 9 अक्तूबर को जब वह स्कूल से घर वापस लौट रही थी, तब तालिबान लड़ाकों ने उसके सिर में गोली मार दी. गोली तो अब निकल गई है, लेकिन बुधवार को उसके अब्बा नम आंखों से कह रहे थे, ‘‘अगले चैबीस घंटे मलाला के लिए बहुत निर्णायक होंगे.” समूचा मुल्क शोक में डूबा है. बुधवार की रात लाहौर में मॉल रोड पर तमाम तरक्कीपसंद लोगों ने मलाला के समर्थन में विरोध प्रदर्शन किया. हाथों में बैनर-पोस्टर लिए वे नारे लगा रहे थे-
डरते हैं बंदूकों वाले एक निहत्थी लड़की से
फैले हैं हिम्मत के उजाले एक निहत्थी लड़की से
निहत्थी लड़की को अपना शिकार बनाने वाला तहरीक-ए-तालिबान गर्व से फूला नहीं समा रहा. तालिबान के प्रवक्ता एहसानुल्ला एहसान ने बीबीसी को दिए अपने बयान में कहा है, ‘‘मलाला बच भी गई तो उसकी जान बख्शी नहीं जाएगी.” और पाकिस्तान की सरकार सिर्फ झूठे दिखावे और बयानबाजियों में उलझी है. सरकार ने हमलावरों की जानकारी देने वाले के लिए एक करोड़ रु. के इनाम का ऐलान किया है, जबकि हमलावर साफ कह रहे हैं कि ‘‘हां, हमने मारा है.” सरकार एक शख्स को पकड़कर सजा देना चाहती है, जबकि सवाल यह है कि क्या तालिबान कोई एक शख्स है? और एक शख्स को सजा दे देने से क्या दहशतगर्दी का यह सिलसिला थम जाएगा?
आखिर 14 साल की उस मासूम बच्ची में ऐसा क्या था, जो कट्टर, ताकतवर, बंदूकों और हथियारों से लैस दहशतगर्द उससे डर गए?
हां, वे डर गए क्योंकि उस बच्ची ने वह करने का साहस दिखाया, जो इस्लामाबाद में बैठे बड़े-बड़े सियासतदां भी नहीं कर पाते. 2007 में मलाला का स्कूल बंद होने के बाद उसने अपने इलाके में लड़कियों की तालीम के लिए मुहिम छेड़ दी और जल्दी ही उसका नाम उस इलाके के बड़े एक्टिविस्टों में शुमार हो गया.
मलाला के अब्बा खुद एक शायर और एजुकेशन एक्टिविस्ट थे. मलाला में हमेशा ही कुछ खास था. रात में जब उसके दोनों भाई सो जाते, वह अपने अब्बा से सियासत पर लंबी बहसें करती. 2009 की शुरुआत में बीबीसी उर्दू पर ‘गुल मकई’ नाम से उसने एक डायरी लिखनी शुरू की, विषय था. ‘‘तालिबान के साये में जिंदगी.”
मलाला ने लिखा, ‘‘आज मैंने अखबार में बीबीसी उर्दू के लिए लिखी अपनी डायरी पढ़ी. मां को मेरा नाम ‘गुल मकई’ बहुत पसंद आया और उन्होंने मेरे अब्बा से कहा, ‘क्यों न हम इसका नाम बदलकर गुल मकई रख दें?’ मुझे भी ये नाम पसंद है क्योंकि मेरे असली नाम का मतलब है, गम में डूबा हुआ इनसान.”
गुल मकई की डायरी के चर्चे दूर-दूर तक फैल गए, लेकिन तब लोग जानते नहीं थे कि यह गुल है कौन? यहां तक कि मिंगोरा में भी कोई यह नहीं जानता था. उसने अपनी डायरी में लिखा, ‘‘आज स्कूल का आखिरी दिन था, इसलिए मैंने और मेरी सहेलियों ने कुछ देर और खेलने का फैसला किया. मुझे यकीन था कि एक दिन स्कूल फिर खुलेगा, लेकिन घर वापस जाते समय जाने क्यों मैं स्कूल की इमारत को ऐसे देख रही थी कि शायद यहां फिर कभी न आऊं.”
वर्ष 2011 में उसका नाम बच्चों के लिए इंटरनेशनल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट होने के बाद सुर्खियों में आया और लोगों को पता चला कि गुल मकई कौन है.
स्वात वादी में लंबे समय तक तालिबान का कब्जा रहा है, लेकिन पिछले साल फौज ने उन्हें वादी से उखाड़ फेंका. ऊपरी तौर पर फौज का कब्जा हो गया, लेकिन तालिबान अब भी कमजोर नहीं पड़ा है. क्या 14 साल की बच्ची पर जानलेवा हमला इस बात की ओर इशारा है कि वह फिर सिर उठा रहा है? आखिर कौन जिम्मेदार है इस दहशतगर्दी का? पाकिस्तान बनने के बाद जिस तरक्कीपसंद जम्हूरी मुल्क और माशरा (समाज) के ख्वाब देखे गए थे, एक के बाद एक पाकिस्तान की फौजी हुकूमतों और मतलबपरस्त सरकारों ने उस ख्वाब को कुचलने का काम किया है. यह बरबस नहीं है कि औरतों के हक और बराबरी के मामले में आज पाकिस्तान दुनिया के सबसे बदतरीन मुल्कों में शुमार है?
क्या इस्लामाबाद की गद्दी पर बैठे लोग नहीं जानते कि कौन इनसान के ऊपर मजहब की सियासत कर रहा है? क्या वे नहीं जानते कि तालिबान क्यों कभी जड़ से नेस्त-नाबूद नहीं होने पाता? क्या वे नहीं जानते कि स्कूलों को क्यों गिराया जा रहा है? तालीम के रास्ते में रोड़े क्यों अटकाए जा रहे हैं? वे जानते हैं, लेकिन यही तो उनकी खुदगर्जी, बुजदिली और दोहरापन है. पाकिस्तान की सरकार तरक्कीपसंद होने का दिखावा तो करती है, लेकिन मजहबपरस्तों को बढ़ावा देती है. तालिबान के सख्त खिलाफ होने की बात तो करती है, लेकिन कभी मुकम्मल तौर पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती. और पाकिस्तान की अवाम कनफ्यूज है.
कभी पाकिस्तान का आम आदमी सेकुलर सियासत का हिमायती हुआ करता था, लेकिन जनरल जिया के बाद जिस तरह मुल्क में मजहबी कट्टता बढ़ी, उसने एक पूरी-की-पूरी पीढ़ी तैयार की है, जो कनफ्यूज और रिएक्शनरी है. तकलीफदेह बात यह है कि उस पीढ़ी के लोग आज के ऊंचे, फैसलाकुन ओहदों पर बैठे हैं और मुल्क की तकदीर तय कर रहे हैं.
शायद पाकिस्तान इस वक्त अपने इतिहास के अब तक के सबसे रिएक्शनरी दौर से गुजर रहा है. यह मुश्किलों और उथल-पुथल का दौर है, लेकिन फिर भी हम पुरउम्मीद हैं. यह हमारा घर है और इसे हमें ही दुरुस्त करना है. एक से दो, दो से सौ, सौ से हजार और लाख मलाला की आज हमें जरूरत है. जो दहशतगर्द एक निहत्थी लड़की के हौसले से डरते हों, वे लाखों लड़कियों का मुकाबला कैसे करेंगे. किसी भी समाज में बदलाव का बीज तारीख के सबसे तकलीफदेह दौर में ही पनपता है. पाकिस्तान इस वक्त उसी दौर से गुजर रहा है.
—मनीषा पांडेय के साथ बातचीत पर आधारित

