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लिट्ल मीडिया का जवाबी हमला

एक ऐसी सरकार जो पहरा लगाना चाहती है और मनमौजी है, उसे विचारों और खबरों का यह मुक्त बाजार बेचैन करने वाला और विध्वंसक लग रहा है.

अपडेटेड 5 सितंबर , 2012

पिछले दो दशक में आत्मविश्वास से भरपूर हिंदुस्तानियों की एक ऐसी फौज आई है जिसे लगता है कि आर्थिक तरक्की, मध्यवर्ग की समृद्धि, तकनीक के विस्तार और दुनिया के संपर्क में आने की वजह से भारत की नौकरशाही में लगी जंग हट जाएगी. यह उम्मीद थी कि उभरते भारत और काहिल-नाकारा नौकरशाही के बीच का फासला घटेगा. हालांकि नौकरशाही में भी चंद चुस्त-दुरुस्त लोग हैं.

नौकरशाही काबिल और फर्राटेदार हो जाए, ऐसी कामना तो शायद ही किसी ने की होगी, लेकिन इतनी-सी तमन्ना तो की ही जाती है कि नौकरशाही की बेवकूफियां कम हो जाएंगी.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पिछले पखवाड़े रयूमर फैक्टरी, जिसे बंगलुरू, हैदराबाद, पुणे से पूर्वोत्तर के लोगों के पलायन के लिए जिम्मेदार बताया गया, पर कार्रवाई के लिए सरकार ने 'इंस्पेक्टर क्लूज़ो' (ब्लैक एडवर्ड की द पिंक पैथर सीरीज का पात्र) का अनुकरण किया. इस गुस्सा दिलाने वाले फ्रांसीसी पुलिसकर्मी के विपरीत, जो सफलता पाने के लिए हमेशा भारी गलतियां करता है, हमारे ताकतवर गृह मंत्रालय और उसके साइबर जासूसों के प्रयास भयंकर रूप से उलटे नतीजे देने वाले साबित हुए हैं. इस पूरी कवायद के बाद सरकार अनाड़ी, कट्टर और बेवकूफ साबित हुई.

सोशल मीडिया के बारे में बाबुओं की नासमझी ही इस भारी दुर्गति की जड़ थी. बाबू लोग लंबे समय से एक संगठित मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक) के अभ्यस्त रहे हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि शासन में उसका भी हित होता है जिसकी वजह से उसे नियंत्रित और नरम कर सकते हैं. इस बार उनका सामना आंदोलनकारियों की ऐसी नई नस्ल से हुआ जो स्वाभाविक रूप से बेअदब और लापरवाह थी.

मौजूद आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 1.3 करोड़ भारतीयों के ही (जनसंख्या के मात्र एक फीसदी के करीब) ट्विटर एकाउंट हैं. इसका और बारीक विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि ज्यादातर सक्रिय ट्विटरेटी (ट्विट करने वाले) 40 वर्ष से कम उम्र के, ग्रेजुएट या उच्च शिक्षा में अध्ययनरत और अंग्रेजी में ठीक-ठाक संवाद कर सकने वाले हैं. राजनैतिक पदों में इन्हें महत्वहीन और यहां तक कि वोट न देने वाली जमात माना जा सकता है.

यह बात ज्यादा जरूरी तथ्यों को छिपा देती है. पहला, उनकी शिक्षा और भौगोलिक रूप से पूरे भारत में फैले होने (और निश्चित रूप से प्रवासियों के रूप में पूरी दुनिया में) की वजह से ट्विटर और उससे कुछ कम हद तक फेसबुक, जनमत निर्माण और समाचार प्रसार के वैकल्पिक माध्यम बन गए हैं. अब खबरों को दबाना एक तरह से असंभव ही हो गया है. दूसरे, इसके वैकल्पिक जगह लेने की वजह काफी हद तक मुख्यधारा के मीडिया के प्रति बढ़ता असंतोष भी है.

ट्विटर पर सरसरी नजर डालने से पता चलता है कि सोशल मीडिया में यह सोच घर कर गई है कि मुख्यधारा का मीडिया पक्षपाती, भ्रमित और समानांतर एजेंडे पर काम करने वाला है और उसकी बात को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता. यह तर्क भी दिया गया कि भारत में ट्विटर समुदाय पर दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों का कब्जा है. यह दावा कुछ बढ़ा-चढ़ा कर किया गया हो सकता है, पर इस बात में जरा भी संदेह नहीं है कि नरेंद्र मोदी ट्विटरेटियों के पसंदीदा नेता के रूप में उभरे हैं.

निस्संदेह यह कुछ हद तक मोदी के करिश्मे और निर्णय लेने की क्षमता और कोई बेतुका काम न करने वाले नेता के रूप में उनकी छवि की वजह से है. इसकी एक बड़ी वजह यह सोच भी है कि मुख्यधारा का मीडिया अनुचित रूप से मोदी को विलेन बनाता रहा है.

आखिरकार ट्विटर की टिप्पणियां भारत में सार्वजनिक जीवन में हावी वाम-उदारवादी तर्क-वितर्क के विकल्प के रूप में उभरी हैं. उदारवादी भारत को मुख्यधारा का मीडिया में अच्छे से जगह मिलती रही है. उसे वैकल्पिक प्लेटफार्म की तलाश की ज्यादा जरूरत नहीं है. फिर भी, सोशल मीडिया आंदोलनकारियों को क्रांतिकारी नहीं कहा जा सकता, उन्हें बस सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी माना जा सकता है.

अंतिम बात, ट्विटर के संदेश थोड़े रूखे होते हैं, ऐसे लोगों को चिढ़ाने लायक, जो यह सोचते हैं कि संयत अंग्रेजी बोलने वालों की भाषा है. इसकी काफी हद तक वजह आंदोलनकारियों में भद्रता की कमी नहीं बल्कि 140 शब्दों की वह सीमा है जो इस प्लेटफॉर्म द्वारा संदेशों के लिए थोपी गई है. इस संक्षिप्तता ने तीखे, सीधे तमाचे जैसे संदेशों को जन्म दिया है जो मुख्यधारा तक पहुंच रखने वाले उदारवादियों को परेशान करने वाली, घृणास्पद लगती है, लेकिन अपनी आवाज कहीं और न रख पाने वालों को आकर्षित करती है.

एक ऐसी सरकार जो नियंत्रण और रेगुलेशन पर चलती है, जो अराजक है, उसे विचारों और खबरों का यह मुक्त बाजार बेचैन करने वाला और विध्वंसक लग रहा है. सोनिया गांधी और उनके बेटे पर निर्दयी तरीके से हमला किया जा सकता है और उनकी निंदा की जा सकती है और प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाया जा सकता है, इस तथ्य को आधिकारिक सत्ताधारी निंदनीय और राजद्रोह जैसा मान रहे हैं.

इससे ज्यादा कुढ़ने वाले मंत्री और अधिकारी काफी लंबे समय से इंटरनेट और खासकर सोशल मीडिया को एक 'रेगुलेशन' के तहत लाने की कोशिशों में लगे हैं. असम दंगों के बाद शांति बनाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के आवरण में इंटरनेट साइट्स और सोशल मीडिया पर जो हास्यास्पद कार्रवाई हुई है, वह बांह मरोड़ने की इसी कोशिश का हिस्सा थी.

यह आश्वस्त करने वाली बात है कि यह कवायद फूहड़ थी. भारत में ऐसे सेंसरशिप की जरूरत नहीं है जिसका उद्देश्य उन लोगों के गुस्से का गला घोंटना हो जो बिग मीडिया से खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं. 

लेखक राजनैतिक टिप्पणीकार हैं.

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