एक बार सिलिकन वैली में किसी ने कहा था कि अगर आप कोई पत्थर उछालेंगे तो वह किसी भारतीय को लगेगा. इतना ही नहीं, जब वह पत्थर टकराकर उछले तो शायद किसी दूसरे भारतीय ही को लगेगा. आइटी के क्षेत्र में भारत का योगदान सबको मालूम है. लेकिन जो बात कम लोगों को पता है वह यह है कि 'कंप्यूटर के जनक' कहे जाने वाले खुद एलेन ट्यूरिंग का भारत से गहरा रिश्ता था.
ट्यूरिंग का जन्म ठीक सौ साल पहले 1912 में हुआ था. उन्होंने मुख्य रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध में अभेद्य जर्मन एनिग्मा कोड को हल करने में अहम भूमिका निभाकर युद्ध जीतने में मदद की थी. लेकिन वे कंप्यूटर साइंस के महान प्रणेताओं में से भी एक थे. टाइम मैग्जीन ने ट्यूरिंग को 20वीं सदी के सौ सबसे महत्वपूर्ण लोगों की सूची में स्थान देते हुए लिखा है, ''हर वह आदमी जो कीबोर्ड पर काम करता है, स्प्रेडशीट या वर्ड प्रोसेसिंग प्रोग्राम खोलता है, वह ट्यूरिंग मशीन के अवतार पर काम कर रहा है.''
इसकी शुरुआत 1936 में लिखे ट्यूरिंग के महत्वपूर्ण शोधपत्र 'ऑन कंप्युटेबल नंबर्स' से हुई थी. तब उनकी उम्र मात्र 24 साल थी. इसी शोधपत्र से कंप्यूटर के निर्माण की राह खुली थी जिसे एनिग्मा कोड तोड़ने के लिए बनाया गया था. उसके बाद से आने वाले हर डिवाइस-चाहे वह आइबीएम से आया हो या ऐपल, ब्लैकबेरी या रास्पबेरी पाई से आया हो-ट्यूरिंग के उस मूल विचार का एक नया रूप है (हालांकि ट्यूरिंग के काम का श्रेय प्रायः जॉन वान न्युमैन को दिया जाता है).
ट्यूरिंग के पिता जूलियस ट्यूरिंग मद्रास प्रेसिडेंसी में आइसीएस अफसर थे. वे धाराप्रवाह तमिल और तेलुगु बोलते थे और 1921 में प्रोन्नत्ति पाकर कृषि एवं वाणिज्य के प्रभारी सचिव बनने से पहले पार्वतीपुरम, अनंतपुर, श्रीकाकुलम, और कुरनूल जैसे सुदूरवर्ती इलाकों में रह चुके थे. उनसे पहले भी 18वीं सदी से ट्यूरिंग उपनाम के कई व्यक्ति भारत में रह चुके थे जिनमें मेजर जॉन ट्यूरिंग भी थे जो श्रीरंगपट्टनम के युद्ध में शामिल थे.
ट्यूरिंग का भारत से दोनों तरफ से संबंध था. उनकी मां सारा स्टोनी रेलवेवाले की लड़की थीं, उनके पिता मद्रास और दक्षिण महरट्टा रेलवे में चीफ इंजीनियर रहे थे. तुंगभद्रा पुल के निर्माण और 'स्टोनी'ज पेटेंट साइलेंट पंखा व्हील' बेहतर नींद सुनिश्चित करने वाले एक बगैर आवाज वाले पंखे के डिजाइन के निर्माण का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. सारा स्टोनी पोडानुर में जन्मी थीं और कोकुनूर के एक घर में पली-बढ़ी थीं (जिसे संयोगवश इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन निलेकणी ने खरीद लिया है. हालांकि उन्हें मेरे बताने से पहले तक इसके ट्यूरिंग से संबंध के बारे में कुछ नहीं पता था).
भारतीय पृष्ठभूमि के ट्यूरिंग खुद इंग्लैंड में पैदा हुए थे (हालांकि उनके जीवनीकार कहते हैं कि जब उनके पिता छत्रपुर, ओडिसा में नियुक्त थे तभी वे गर्भ में आ गए थे). देहाती इलाकों में जन्मे बच्चों के प्रति प्रचलित पूर्वाग्रह से बचने के लिए उस वक्त के रिवाज के मुताबिक उनकी मां उन्हें जन्म देने के लिए इंग्लैंड चली गई थीं. वे बच्चे को अभिभावकों के साथ ससेक्स में छोड़कर भारत लौट आईं.
छह साल की उम्र में बालक ट्यूरिंग को भारत आना था लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वे वहीं रह गए. वे बाद में पब्लिक स्कूल, कैंब्रिज और विख्यात इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी, प्रिंसटन में पढ़ने गए. तभी युद्ध छिड़ गया और उनकी नियुक्ति ब्लेचले पार्क में कोड-ब्रेकर्स के लिए हो गई.
युद्ध के बाद ट्यूरिंग ने दुनिया के पहले कंप्यूटर के विकास पर काम शुरू किया, साथ ही वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (अपने कंप्यूटर को स्ट्रॉबेरी और क्रीम का स्वाद पहचानने की योग्यता देने के सपने) की अवधारणा पर काम कर रहे थे. लेकिन उनका जीवन त्रासदीपूर्ण था. उनके समलैंगिक होने के कारण तत्कालीन ब्रिटिश सिस्टम ने उनके साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया क्योंकि तब समलैंगिकता गैर-कानूनी थी. 1952 में वे 'घोर अभद्रता' के आरोप में गिरफ्तार कर लिए गए. अदालत ने उनके सामने दो विकल्प रखेः जेल जाओ या फिर केमिकल पद्धति से नपुंसक बन जाओ. उन्होंने दूसरा विकल्प चुना.
दो साल बाद, 42 साल की उम्र में ट्यूरिंग ने खुदकुशी कर ली. वाल्ट डिज्नी की स्नो व्हाइट से सम्मोहित ट्यूरिंग ने उस राजकुमारी की तरह जहरीला सेब खा लिया. एक रात उन्होंने एक सेब को सायनाइड में डुबोया, उसे खाया और अध-खाया सेब अपने सिरहाने छोड़कर मर गए. कहा जाता है कि ऐपल कंप्यूटर का लोगो-जिसका एक टुकड़ा कटा हुआ हैक्वएलेन ट्यूरिंग को दी गई गुप्त श्रद्धांजलि है. लेकिन जब स्टीव जॉब्स से पूछा गया कि क्या यह सच है तो उन्होंने कहा कि. ''नहीं, लेकिन मैं सचमुच चाहता हूं कि काश ऐसा ही होता.''
कुछ पीढ़ियां किस तरह का फर्क पैदा कर देती हैं. आज की दुनिया में कंपनियों के वीसी चौबीस वर्षीय ट्यूरिंग का पीछा कर रहे होते, वे एक टेक कंपनी बनाते, आइपीओ लॉन्च करते, 14.9 अरब डॉलर संपत्ति के मालिक होते और गे आइकन बन जाते. इसकी बजाए वे गुमनाम, गरीब, नपुंसक और दुखी मर गए. जैसे कि उनके पिता ने तमिल में कहा हो कि 'इधु दान वाझ्कायी मगाने (यही जिंदगी है, मेरे बेटे).
अनवर अलीखान विज्ञापन प्रोफेशनल हैं और सामाजिक मामलों के टीकाकार हैं.

