
बिहार के जमुई का एक वीडियो 19 सितंबर को वायरल हुआ. इसमें नकाबपोश आदमियों का झुंड कक्षा 10 में पढ़ने वाली एक लड़की से छेड़छाड़ करता दिख रहा था. इससे देश भर में आक्रोश की लहर दौड़ गई. इसने भाजपा की अगुआई वाली सरकार के इस दावे की भी कलई खोल दी कि राज्य में कानून-व्यवस्था बेहतर हुई है.
तीन दिन बाद बिहार पुलिस ने कथित आरोपी नंदन यादव की परेड निकाली, जिसमें वह पैर में गोली लगने की वजह से लंगड़ा रहा था. पुलिस ने दावा किया कि जब वे जमुई-लखीसराय रोड पर कुंदर बराज के नजदीक उसे गिरफ्तार करने गए तो उसने गोली चला दी और जवाबी गोलीबारी में वह घायल हो गया. न्यायिक प्रक्रिया को धता बताकर सजा देने की ऐसी घटनाएं बिहार में इतनी आम हैं कि उन्हें ‘हाफ एनकाउंटर’ यानी आधी मुठभेड़ कहा जाने लगा है.
अब मध्य प्रदेश में आइए. सितंबर की शुरुआत में सागर जिले में जहरीली शराब पीने से हुई त्रासदी में 20 लोग मारे गए (अनधिकृत आंकड़ों में मरने वाले 50 से ज्यादा बताए गए). जांच के दौरान 25 लोग गिरफ्तार किए गए, लेकिन अलग-अलग घटनाओं में दो सरगनाओं मनीष लोधी और रवि लखेरा के पैरों में गोली मार दी गई. मध्य प्रदेश में इन्हें ‘शॉर्ट एनकाउंटर’ या छोटी मुठभेड़ें कहा जाता है.
पड़ोसी उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारियों के बीच भी इस रवायत को अनाधिकारिक उपाधि दी गई है—‘ऑपरेशन लंगड़ा’. पुलिस नहीं मानती कि यह आधिकारिक रणनीति है और बड़े अफसर संदिग्धों को पंगु बनाने की किसी जानी-बूझी कोशिश से इनकार करते हैं, लेकिन आंकड़े चौंकाने वाले पैटर्न की तरफ इशारा करते हैं.
मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ की अगुआई वाली भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने 17,043 मुठभेड़ों में 11,834 कथित अपराधियों को गोली मारकर घायल किया. कथित अपराधियों के घायल होने के बहुत सारे मामले ऐसे हैं जिनमें गोली लगने के जख्म उनके पैरों में थे. पुलिस का कहना है कि वे ऐसा कोई डेटा नहीं रखते जिससे पता चले कि कितने हमेशा के लिए अपाहिज हो गए.
बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश हिंदी पट्टी के ‘बीमारू’ राज्यों में आते हैं और कानून-व्यवस्था के मामले में अक्सर मॉडल राज्य नहीं रहे. ‘मुठभेड़’ में मौतें हमेशा पुलिस के तौर-तरीकों का हिस्सा रही हैं, बीते एक दशक में ‘खौफ पैदा करके अपराध रोकना’ भी इस पटकथा का हिस्सा बनता गया है.
इन सबमें अनोखी समानता दिखती है. पुलिस को अपराधी के आने की गुप्त सूचना मिलती है. इलाका भी आमतौर पर सुनसान होता है. अधिकारी आरोपी को पकड़ने के लिए सुबह तड़के निकलते हैं, जब ज्यादातर लोग सो रहे होते हैं.
पुलिस आरोपी से हथियार डालने के लिए कहती है, लेकिन वह पक्के तौर पर उन पर गोलियां चला देता है. जवाबी गोलीबारी में आरोपी के पैर में और आम तौर पर घुटने और टखने के बीच गोली लगती है. आरोपी का अस्पताल में इलाज होता है. फिर मीडिया के सामने लंगड़ाते हुए उसकी परेड कराई जाती है.



बढ़ती संख्या
विभिन्न राज्यों में अपनाई गई शब्दावली से पता चलता है कि यह पुलिस की तरफ से जनाक्रोश पैदा करने वाले अपराधों का सोचा-समझा जवाब है. जाहिरा तौर पर यह उस वक्त और आसान हो जाता है जब आरोपी ‘आदतन अपराधी’ हो और उसे राजनीतिक समर्थन हासिल न हो.
आंकड़ों के लिहाज से भी गोली चलाकर सीधे मार देने के बजाय पैर में गोली मारना ज्यादा लोकप्रिय विकल्प मालूम देता है.
बिहार स्पेशल टास्क फोर्स के आंकड़े बताते हैं कि इस साल (एक जनवरी से 16 अगस्त तक) 19 मुठभेड़ें दर्ज की गईं, जिनमें तीन अपराधी मारे गए और 18 घायल हुए. बिहार पुलिस के व्यापक आंकड़ों को जोड़ने पर ‘मुठभेड़’ और ‘पैर में गोली लगने वाले लोग’ श्रेणी के आंकड़े और बढ़ जाते हैं.
उत्तर प्रदेश में 2017 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद योगी आदित्यनाथ की ‘अपराधों के खिलाफ सख्त’ हुकूमत के तहत रोज औसतन पांच मुठभेड़ें और हर 12 दिनों में मुठभेड़ में एक मौत हुई. आंकड़ों के मुताबिक 2025 और 2026 में ही ऐसी मुठभेड़ों में 97 लोग मारे गए और 4,000 से ज्यादा घायल हुए.
मध्य प्रदेश में ग्वालियर-चंबल का इलाका ‘छोटी मुठभेड़ों’ के मामले में शीर्ष पर है. मध्य प्रदेश पुलिस हर उस घटना का रिकॉर्ड नहीं रखती जिसमें कथित अपराधी के पैर में गोली मारी जाती है, लेकिन ऐसी हर घटना के बाद वह कर्तव्य भाव से संबंधित लोगों के खिलाफ ‘हत्या की कोशिश’ का मामला जरूर दर्ज कर लेती है.
नाम उजागर न करने की शर्त पर राज्य के एक पूर्व डीजीपी का कहना है कि पैर में गोली मारना “एक तरह से पुलिस की लाचारी का संकेत है”. वे कहते हैं, “ऐसी सजा मिलने की कोई गारंटी नहीं है जिससे अपराधियों के मन में डर पैदा हो. इसमें देरी के लिए न्यायपालिका को पूरा दोष नहीं दिया जा सकता. काफी कुछ दोष पुलिस को भी लेना पड़ेगा.”

अपने आप में कानून
कई राज्यों की पुलिस भले ही अलग सोचती हो लेकिन देश के कानूनों में त्वरित न्याय की कोई अलग व्यवस्था नहीं है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने मुठभेड़ में हत्या से जुड़े 2014 के एक केस (पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य) में यही बात कही थी. कोर्ट ने कहा था कि राज्यसत्ता को अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का उल्लंघन करने का कोई अधिकार नहीं.
तब प्रधान न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा और न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन ने अपने सितंबर 2014 के आदेश में ‘मुठभेड़’ के मामलों की 16 शर्तें तय की थीं. दूसरे नियमों के अलावा इनमें गुप्त सूचना दर्ज करना, गोलीबारी में मौत होने पर एफआइआर, स्वतंत्र एजेंसी से जांच, आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत मजिस्ट्रेट की जांच, फॉरेंसिक जांच, और शामिल अधिकारियों को बिना बारी के पदोन्नति नहीं देना शामिल हैं.
इस फैसले के अलावा मुठभेड़ों के बारे में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशानिर्देश भी मौजूद हैं, लेकिन उनमें भी मुठभेड़ में मौतों पर ही ध्यान दिया गया. पैर में गोली लगने पर अलबत्ता अपने आप कोई जांच शुरू नहीं होती. यही वह कानूनी गैप या शून्य है जिसका ‘आधी मुठभेड़ों’ में फायदा उठाया जाता है.
जमुई के 19 सितंबर के वीडियो ने कुछ ऐसा किया जो पुलिस की फाइल आसानी से नहीं कर पाती. उसने जनाक्रोश पैदा कर दिया. इस जनाक्रोश ने तत्काल जवाब की मांग की. सरकार ने एक जवाब दे भी दिया. तीन दिनों के भीतर कथित मुख्य आरोपी का पता लगाकर गोली मारी गई और वह अस्पताल में था.
सरकार ने ऐसी कार्रवाई की जो लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए काफी थी. मगर भारतीय न्यायिक प्रणाली अपराधियों को गैरकानूनी तरीकों से मार डालने की ठीक ऐसी भीड़ वाली मानसिकता को रोकने के लिए ही बनाई गई है.
आरोपी की पहचान करनी होगी. सबूत इकट्ठा करने होंगे. गवाहों की जांच-पड़ताल करनी होगी. अभियोजन को अपना पक्ष साबित करना होगा. सजा देने से पहले दोष सिद्ध करना होगा. एक गोली इस सिलसिले को उलट देती है. तब भी जब वह जान लेने से पहले रुक जाती है.

लड़खड़ाती वास्तविकता
यह मुद्दा बार-बार न्यायिक जांच के दायरे में आया. उत्तर प्रदेश में मुठभेड़ में हो रही हत्याओं का सिलसिला ध्यान में लाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2019 में ही गंभीर आपत्ति जाहिर की. विपक्षी दल लंबे समय से योगी की सरकार पर “ठोक दो” की नीति अपनाने का आरोप लगाते रहे हैं.
हाल ही इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सबसे तीखा दखल दिया. मुजफ्फरनगर, झांसी और मिर्जापुर में अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किए जाने से पहले पंगु बना दिए गए तीन लोगों की जमानत की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा कि ऐसी मुठभेड़ें राज्य में आम हो गई हैं. अदालत ने कहा कि कुछ मामलों में अधिकारी वरिष्ठों को खुश करने या आरोपियों को सबक सिखाने के लिए इस तरह गोली चलाते हैं.
इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इन मुठभेड़ों का पुरजोर बचाव किया. उनका दावा है कि उनके कमान संभालने के बाद राज्य में न तो कोई दंगा हुआ और न ही गुंडे वसूली कर पाए. दूसरे राज्यों में आलोचना का ज्यादा आम राजनीतिक जवाब यह दिया गया कि अदालतों का कामकाज बहुत सुस्त रहा है.
यह सच है. अदालतों में लंबित मामलों का अंबार है. 13 अगस्त को राज्यसभा में लिखित जवाब में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के हवाले से बताया कि बिहार की जिला और अधीनस्थ अदालतों में करीब 38 लाख मामले लंबित थे, जिनमें 85.5 फीसद (32 लाख) आपराधिक मामले थे. करीब 21 लाख मामले पांच साल से ज्यादा समय से लटके हैं. मध्य प्रदेश में पांच साल से लटके मामलों की संख्या 3,82,500 है.
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) एस.आर. दारापुरी का मानना है कि इन मुठभेड़ों के पैमाने और पैटर्न से सवाल उठता है कि क्या इन्हें सरकार की नीति के तहत अंजाम दिया जा रहा है? वे कहते हैं, “जब (उत्तर प्रदेश के) मुख्यमंत्री खुद कहते हैं कि अपराधियों को सबक सिखाया जाएगा तो सवाल उठता है कि पुलिस को क्या संदेश दिया जा रहा है? इससे धारणा बनती है कि इन मुठभेड़ों को सरकार का समर्थन हासिल है.”
पटना के वकील के.डी. मिश्र आगाह करते हैं: “कुछ कर दिखाने के दबाव में काम कर रही सरकार को जब पता चलता है कि मुकदमा चलाने के मुकाबले गोली चलाना ज्यादा तेजी से नतीजे देने वाला है तो खतरा वास्तविक हो जाता है.”
फिर भी ये तथाकथित ‘आधी मुठभेड़ें’ पुलिस बल के लिए पसंदीदा समाधान बनी हुई हैं, जिनसे वे दिखा सकते हैं कि काम के प्रति वे कितने दृढ़संकल्प हैं. इससे लोगों की त्वरित न्याय की कथित प्यास भी शांत हो जाती है.

