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विधानमंडल के उच्च सदन की 11 सीटों पर मुकाबला भाजपा और सपा के संगठन, जातीय समीकरणों और शिक्षित मतदाताओं में पैठ की परीक्षा. इसके नतीजे कई मायनों में तय करेंगे 2027 के चुनावों की रणनीति

Uttar Pradesh: MLC elections
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक खंड निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार ध्रुव त्रिपाठी के साथ सीएम योगी
अपडेटेड 27 अक्टूबर , 2026

गोरखपुर के महंत दिग्विजयनाथ पार्क में 12 अक्तूबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शिक्षक मतदाता संवाद कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी ध्रुव त्रिपाठी के समर्थन में वोट मांग रहे थे.

उस समय उनके निशाने पर सिर्फ चुनावी प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी (सपा) की उस रणनीति की भी चुनौती थी, जिसने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला दिलचस्प बना दिया है.

योगी ने सपा पर निशाना साधते हुए कहा, “सपा और शिक्षा नदी के दो छोर हैं, जो कभी मिल नहीं सकते. जो शिक्षा का धुर विरोधी होगा, वह कभी शिक्षक का हितैषी नहीं हो सकता.” योगी का बयान बताता है कि 23 अक्तूबर को होने वाले विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव महज एमएलसी चुनने की कवायद नहीं.

इन चुनावों को भाजपा और सपा 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी राजनैतिक ताकत, संगठनात्मक क्षमता और सामाजिक समीकरणों को परखने के अवसर के रूप में देख रही हैं.

गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में योगी की सक्रियता के पीछे सपा की वह चुनौती भी है, जो भाजपा से असंतुष्ट डॉ. संजयन त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाने से पैदा हुई है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पहले से घोषित प्रत्याशी कमलेश यादव का टिकट काटकर संजयन को मैदान में उतारा है.

3 अक्तूबर को लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में संजयन उनके बगल में बैठे दिखाई दिए. अखिलेश ने उन्हें पार्टी में शामिल कराने के साथ ही उम्मीदवार बनाने का ऐलान किया. इसके बाद गोरखपुर में संजयन के समर्थकों ने ‘घायल हूं, इसलिए घातक हूं’ के नारे के साथ प्रचार शुरू कर दिया.

संजयन भाजपा से टिकट न मिलने से नाराज थे. उन्होंने पहली अक्तूबर को निर्दलीय के रूप में नामांकन दाखिल किया था. इसके बाद अपनी गाड़ी से भाजपा का झंडा उतारकर पार्टी से अलग होने का स्पष्ट संकेत दिया.

भाजपा ने इस सीट से मौजूदा एमएलसी ध्रुव त्रिपाठी को ही प्रत्याशी बनाया है. संजयन के सपा में जाने से मुकाबले का राजनैतिक स्वरूप बदल गया है. अखिलेश ने 10 अक्तूबर को देवरिया में भी संजयन के समर्थन में सभा की. सपा को उम्मीद है कि भाजपा से असंतुष्ट नेता का स्थानीय प्रभाव उसके काम आएगा.

भाजपा के लिए चुनौती अपने मौजूदा उम्मीदवार के समर्थन को बनाए रखने के साथ बागी नेता के प्रभाव का सामना करना है. गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी का गृह क्षेत्र है, इसलिए यहां का चुनावी प्रदर्शन राजनैतिक रूप से अतिरिक्त महत्व रखता है.

पूर्व एमएलसी आकाश अग्रवाल और भाजपा के बागी नेता संजयन त्रिपाठी को पार्टी में शामिल कराते सपा प्रमुख अखिलेश यादव

योगी ने इन चुनावों के प्रचार की कमान अपने हाथों में ली है. भाजपा ने सभी 11 स्नातक और श‍िक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी रैलियों की योजना बनाई है. इस चुनाव के जरिए भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले शिक्षकों और स्नातकों के बीच अपनी पहुंच, स्थानीय नेताओं के प्रभाव और बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता का आकलन भी करना चाहती है.

इसी कारण चुनाव संचालन में विधानसभा चुनाव जैसी व्यवस्था अपनाई गई है. भाजपा ने 10 से 15 सदस्यों वाली समन्वय समितियां बनाई हैं. इनका गठन विधानसभा क्षेत्र और मतदान केंद्र के स्तर पर किया गया है. जनप्रतिनिधियों से लेकर संगठन के पदाधिकारियों तक की जिम्मेदारी तय हुई है, ताकि संपर्क और चुनाव प्रबंधन को अलग-अलग स्तर पर संचालित किया जा सके.

भाजपा की रणनीति का दूसरा अहम पहलू जातिगत समीकरण हैं. पार्टी ने 11 सीटों पर प्रत्याशियों के चयन में सामाजिक प्रतिनिधित्व को महत्व दिया है. पांच ब्राह्मण, तीन ओबीसी, दो राजपूत और एक वैश्य प्रत्याशी मैदान में उतारने की रणनीति को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है.

पांच ब्राह्मण चेहरों को टिकट देने के पीछे उस वर्ग तक संदेश पहुंचाने की कोशिश भी मानी जा रही है, जहां यूजीसी के नए नियमों को लेकर सवर्ण समाज के कुछ हिस्सों में असंतोष की खुसफुसाहट रही है.

शिक्षक और स्नातक मतदाता उच्च शिक्षा तथा विश्वविद्यालयों से सीधे जुड़े हैं इसलिए यूजीसी का मुद्दा इस वर्ग के बीच राजनैतिक चर्चा का हिस्सा है. भाजपा के प्रदेश संगठन के कुछ ब्राह्मण और ठाकुर नेताओं ने भी पार्टी के भीतर अपने समुदायों में इन नियमों को लेकर असंतोष की बात रखी थी.

दूसरी ओर, सपा के लिए इन चुनावों का महत्व भाजपा को चुनौती देने के साथ अपनी राजनैतिक स्थिति बचाए रखने से भी जुड़ा है. उत्तर प्रदेश की 100 सदस्यीय विधान परिषद में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास 83 सदस्य हैं. इनमें भाजपा के 79, अपना दल (एस), राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी के एक-एक सदस्य शामिल हैं.

इसके मुकाबले सपा के पास 10 सदस्य हैं. यही संख्या परिषद में विपक्ष के नेता का पद बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण है. सपा के 10 एमएलसी में से सात विधायकों के जरिए निर्वाचित हुए थे. शेष तीन में इलाहाबाद-झांसी स्नातक क्षेत्र से मानसिंह यादव, वाराणसी स्नातक क्षेत्र से आशुतोष सिन्हा और वाराणसी शिक्षक क्षेत्र से लालबिहारी यादव शामिल हैं.

सपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, अगर पार्टी तीन से कम सीटें जीतती है तो परिषद में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा बनाए रखना मुश्किल हो सकता है. यानी यह चुनाव पार्टी के लिए प्रतिष्ठा और संस्थागत राजनैतिक हैसियत का प्रश्न भी है.

वैसे, सपा ने भाजपा से काफी पहले तैयारी शुरू कर दी थी. पार्टी ने 11 में से पांच सीटों पर प्रत्याशियों का ऐलान करीब साल भर पहले ही कर दिया था. इनमें लखनऊ स्नातक क्षेत्र से पूर्व एमएलसी कांति सिंह, गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से कमलेश यादव, वाराणसी स्नातक क्षेत्र से आशुतोष सिन्हा, इलाहाबाद-झांसी स्नातक क्षेत्र से मानसिंह यादव और वाराणसी शिक्षक क्षेत्र से लालबिहारी यादव शामिल थे.

बाद में पार्टी ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट पर कमलेश यादव की जगह संजयन त्रिपाठी को प्रत्याशी बना दिया. आगरा शिक्षक सीट पर भी पहले घोषित प्रत्याशी प्रकाश चंद्र गुप्त की जगह निर्दलीय एमएलसी रहे आकाश अग्रवाल को मैदान में उतारा.

आकाश पहले भाजपा से भी टिकट मांग रहे थे. इन बदलावों से संकेत मिलता है कि सपा ने स्थानीय प्रभाव वाले चेहरों और भाजपा से असंतुष्ट नेताओं को साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई है. सपा की चुनावी रणनीति में पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों के साथ सामाजिक समीकरणों का विस्तार भी शामिल है.

पार्टी ने तीन यादव चेहरों लालबिहारी यादव, शशांक और डॉ. मानसिंह को मैदान में उतारा है. बरेली-मुरादाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से मोहम्मद दानिश अख्तर पार्टी के 11 प्रत्याशियों में से इकलौते मुसलमान हैं.

लखनऊ के प्रति‌िष्ठ‍‌त अवध गर्ल्स डिग्री कालेज की प्राचार्य प्रो. बीना राय बताती हैं “सपा को परंपरागत रूप से किसानों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के बीच समर्थन मिलता रहा है, लेकिन शिक्षकों और शहरी स्नातकों के बीच उसकी पकड़ को लेकर सवाल उठते रहे हैं. विधान परिषद चुनाव में सपा इस धारणा को बदलना चाहती है.”

पार्टी ऐसे उम्मीदवारों को आगे बढ़ाना चाहती है, जिनकी पहचान केवल राजनैतिक गतिविधियों तक सीमित न हो बल्कि वे अपने पेशे और सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय हों. समाजवादी शिक्षक सभा के वरिष्ठ नेता राम सुमिर यादव का कहना है कि सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव खुद शिक्षक थे और पार्टी का इस वर्ग से पुराना भावनात्मक जुड़ाव रहा है.

पार्टी की शिक्षक संगठन इकाई समाजवादी शिक्षक सभा भी लंबे समय से सक्रिय है. पिछले चुनावों में सपा ने शिक्षक संगठनों से जुड़े नेटवर्क के सहारे दो शिक्षक और एक स्नातक सीट जीती थी. मतदाता सूची तैयार कराने और व्यक्तिगत संपर्क बढ़ाने के लिए भी पार्टी ने उम्मीदवारों को पहले से सक्रिय किया था.

इन चुनावों में केवल पंजीकृत और पात्र शिक्षक तथा स्नातक ही मतदान कर सकते हैं. इसलिए सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया, स्थानीय नेटवर्क और मतदाताओं तक व्यक्तिगत पहुंच चुनावी रणनीति के अहम हिस्से हैं. सपा ने चुनाव संचालन के लिए जिलावार प्रभारियों के साथ मतदान केंद्र और बूथ स्तर पर भी जिम्मेदारियां तय की हैं.

राय बताती हैं “इन चुनावों का महत्व इसलिए भी है कि शिक्षक और स्नातक मतदाता अपने-अपने सामाजिक तथा पेशेवर दायरों में राय बनाने वालों के रूप में देखे जाते हैं. हालांकि, विधान परिषद चुनाव के नतीजों को सीधे विधानसभा चुनाव का परिणाम मानना उचित नहीं होगा क्योंकि दोनों की संरचना और प्रक्रिया अलग है. फिर भी इन नतीजों से दलों को अपने संगठन, उम्मीदवार चयन और सामाजिक पहुंच के बारे में संकेत मिलेंगे.”

इस तरह से विधान परिषद के चुनाव 2027 की चुनावी लड़ाई से पहले दोनों दलों के लिए महत्वपूर्ण सेमीफाइनल बन गए हैं.

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