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डार्क मोड

कहां अटका मस्क का सिग्नल

इलॉन मस्क का आरोप है कि निहित स्वार्थ के चलते उनकी स्टारलिंक का भारत में प्रवेश बाधित किया जा रहा. दूसरी ओर सरकार का कहना है कि सुरक्षा नियम सभी ऑपरेटरों के लिए एक जैसे, किसी के साथ भेदभाव नहीं

Upfront  Satellite Internet
वाशिंगटन में 13 फरवरी, 2025 को मोदी से मुलाकात करते इलॉन मस्क
अपडेटेड 27 अक्टूबर , 2026

सात अक्तूबर को स्पेसएक्स के मालिक अरबपति टेक उद्यमी इलॉन मस्क ने आरोप लगाया कि “कुछ ताकतवर लोग” उनकी कंपनी की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा ‘स्टारलिंक’ को रोक रहे हैं ताकि “भारत के लोगों पर उनका एकाधिकार बना रहे”. उन्होंने एक्स पर लिखा, “यह भारत की जनता के खिलाफ अपराध है!”

उन्होंने यह बात एक यूजर के जवाब में कही, जिसका कहना था कि भारत के 11,256 गांवों में अभी भी 4जी की सेवा नहीं पहुंची है. स्टारलिंक के पास पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लो अर्थ ऑर्बिट (एलईओ) में उपग्रहों का एक समूह है जिनसे वह इंटरनेट कनेक्टिविटी देता है.

इसमें वे इलाके भी शामिल हैं जहां मोबाइल नेटवर्क और फाइबर-ऑप्टिक केबल पहुंचाने में दिक्कत होती है. अगले दिन, मस्क ने सीधे सीधे हमला बोल दिया. उन्होंने लिखा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और उसने भारत सरकार के “हरेक कानून और शर्त” को पूरा करने में पांच साल लगाए हैं.

उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज के सीएमडी मुकेश अंबानी का हवाला देते हुए पूछा, “क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं?” अंबानी की कंपनी टेलीकॉम ऑपरेटर रिलायंस जियो की मालिक है.

नई दिल्ली ने तुरंत जवाब दिया. 8 अक्तूबर को एक बयान में संचार मंत्रालय ने उन बातों  को “बेबुनियाद और भ्रामक” बताया जिनमें कहा गया था कि भारत का सैटेलाइट कम्युनिकेशन (सैटकॉम) ढांचा भेदभावपूर्ण है. इसके बाद संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि “भारत किसी भी सेक्टर में एकाधिकार (मोनोपॉली) की इजाजत नहीं देता”.

उनके जूनियर मंत्री चंद्र एस. पेम्मासानी ने बताया कि स्टारलिंक की फाइल गृह मंत्रालय के पास है. संचार मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, तीनों लाइसेंसी ऑपरेटरों—स्टारलिंक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और भारती एयरटेल समर्थित वनवेब इंडिया—का सुरक्षा आकलन “अभी चल रहा है” और वे “मोटे तौर पर एक ही नियामकीय अवस्था में हैं.''

स्टारलिंक का कहना है कि उसने सरकार की सभी शर्तें पूरी कर ली हैं. 7 अक्तूबर को नई दिल्ली में इंडिया मोबाइल कांग्रेस में स्पेसएक्स के वाइस-प्रेसिडेंट स्टारलिंक बिजनेस ऑपरेशंस लॉरेन ड्रेयर ने कहा कि कंपनी ने भारत में 20 गेटवे साइटें (ग्राउंड स्टेशन जो सैटेलाइटों को जमीनी नेटवर्क से जोड़ते हैं) बनाई हैं, “हर स्तर पर” सुरक्षा नियंत्रण बनाए हैं और वह भारतीय यूजर्स का डेटा देश के भीतर ही रखने पर सहमत है.

मस्क के आरोपों और हकीकत के बीच कहीं तालमेल नहीं दिखता क्योंकि भारत के दो सबसे बड़े टेलीकॉम ऑपरेटरों ने स्टारलिंक के साथ अलग-अलग समझौते किए हैं. मार्च 2025 में जियो और भारती एयरटेल ने उसके इक्विपमेंट को डिस्ट्रीब्यूट करने और नियामकीय मंजूरी मिलने पर उसकी सेवाएं देने की संभावना तलाशने पर सहमति जताई थी.

जियो प्लेटफॉर्म्स के प्रबंध निदेशक आकाश अंबानी ने मस्क के आरोपों पर सीधे टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और बिजनेस टुडे टीवी से कहा कि जियो का जोर भारतीय ग्राहकों को गुणवत्ता देने पर है.

अंतहीन इंतजार
स्टारलिंक की भारत में कदम रखने की तमन्ना 2021 से है. उस साल नवंबर में उसने लाइसेंस लेने से पहले ही प्री-ऑर्डर लेना शुरू कर दिया था. तब सरकार ने जनता को इसे सब्स्क्राइब करने के खिलाफ आगाह किया और कंपनी ने बाद में 5,000 से ज्यादा बुकिंग का पैसा वापस कर दिया.

उसने अगले अक्तूबर में ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट (जीएमपीसीएस) लाइसेंस के लिए अर्जी दी ताकि भारत में सैटेलाइट संचार सेवाएं दी जा सकें. जल्द ही नीतिगत बहस स्पेक्ट्रम पर केंद्रित हो गई. 15 अक्तूबर, 2024 को सरकार ने नीलामी के बजाय प्रशासनिक रूप से सैटेलाइट स्पेक्ट्रम आवंटित करने का तरीका चुना. स्टारलिंक ने इस तरीके की पैरवी की थी; जियो ने नीलामी की दलील दी थी.

राजनैतिक माहौल भी बदल रहा था. फरवरी 2025 में अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाशिंगटन में मस्क से मुलाकात की. मुलाकात डोनाल्ड ट्रंप के दूसरा कार्यकाल शुरू करने और मस्क के नेतृत्व में नए डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफीशियंसी (डीओजीई) की स्थापना के कुछ हफ्तों बाद हुई.

मुलाकात के बारे में मोदी की ओर से बताया गया कि उन्होंने “स्पेस, मोबिलिटी, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन” पर चर्चा की. एक महीने बाद, जियो और एयरटेल ने नियामकीय मंजूरी मिलने की शर्त के साथ स्टारलिंक के उपकरण वितरित करने और भारत में उसकी सेवाओं की संभावनाओं के लिए समझौतों का ऐलान किया.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सवाल किया कि क्या ट्रंप को “खुश करने” के लिए यह डील की गई थी? उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर यह चिंता जताई कि जरूरत पड़ने पर स्टारलिंक की कनेक्टिविटी चालू या बंद करने का अधिकार किसके पास होगा?

स्टारलिंक को जून 2025 में जीएमपीसीएस लाइसेंस मिला और अगले महीने भारत के अंतरिक्ष नियामक, इन-स्पेस से मंजूरी मिली. सितंबर में सेवाओं के ट्रायल के लिए स्पेक्ट्रम मिला. फिर भी कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने का आखिरी चरण पूरा नहीं हो सका क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों ने ज्यादा जानकारी और ज्यादा आश्वासन मांगे. यह वह समय भी था जब मस्क और ट्रंप के बीच अनबन हो गई थी, हालांकि बाद में उन्होंने मतभेद सुलझा लिए थे.

मगर देरी सिर्फ स्टारलिंक तक सीमित नहीं. जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और वनवेब इंडिया भी कमर्शियल सर्विस शुरू करने के इंतजार में हैं. 9 अक्तूबर को मीडिया ब्रीफिंग में सिंधिया ने कहा कि एक बार सरकार स्पेक्ट्रम इस्तेमाल शुल्क ढांचा बना ले और तीनों कंपनियां भी सुरक्षा जरूरतों को पूरा कर लें, उसके बाद वे सेवाएं शुरू कर सकती हैं.

इस बीच, 3 सितंबर को डिजिटल संचार आयोग ने पांच साल के लिए एडजस्टेड सकल राजस्व (एजीआर) का पांच फीसद स्पेक्ट्रम यूजेज चार्ज को स्वीकृति दी है; ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के लिए इसे घटाकर चार फीसद रखा गया है. प्रस्ताव को अभी अंतर-मंत्रालयी पैनल और कैबिनेट से मंजूरी मिलनी है.

भारत में स्टारलिंक की सहायक कंपनी का मालिकाना हक स्पेसएक्स के पास है और उसे अपने विदेशी निवेश के लिए मंजूरी का इंतजार है. अमेजन की सहायक भारतीय कंपनी कुइपर सर्विसेज इंडिया, अमेजन लियो ब्रांड के तहत काम करती है और जो सैटकॉम लाइसेंस का इंतजार कर रही है, उसे भी विदेशी निवेश नियमों का पालन करना होगा.

सुरक्षा जांच
सरकार की चिंताएं महज कागजी कार्रवाई नहीं बल्कि उससे ज्यादा हैं. सैटेलाइट नेटवर्क देश की सीमाओं के पार भी काम करते हैं और पारंपरिक जमीनी सिस्टम के मुकाबले इन्हें कंट्रोल करना टेढ़ा मसला है. एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी बताते हैं, “दुनिया भर में हालात तेजी से बदले हैं, खासतौर पर रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद.”

उन्होंने उन शर्तों के बारे में बताया जिन्हें भारत चाहता है कि सभी सैटकॉम ऑपरेटर पूरा करें. इन शर्तों में भारतीय इंटरनेट और टेलीकॉम डेटा को देश के भीतर मौजूद अर्थ-स्टेशन गेटवे से गुजारना शामिल है. साथ ही, डेटा को विदेश में कॉपी या डिक्रिप्ट करने या विदेशी सर्वर पर उसे देखने पर रोक लगाने की भी बात है.

स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक आर. सुंदरम बताते हैं कि स्टारलिंक के उपग्रहों का ताना-बाना एक खास चुनौती है. “यह जमीनी स्टेशन तक पहुंचने से पहले सैटेलाइट के बीच सीधे डेटा ट्रांसमिट करने के लिए लेजर लिंक का इस्तेमाल करता है.”

सरकार इसकी जांच कर रही है कि क्या भारत का डेटा घरेलू गेटवे को पूरी तरह नजरअंदाज कर उपग्रहों के इस जाल के जरिए बाहर जा सकता है. हर गेटवे के लिए अलग सुरक्षा मंजूरी की जरूरत होती है. भारत ने यह आश्वासन मांगा है कि किसी इमरजेंसी या संघर्ष के दौरान आदेश मिलने पर स्टारलिंक को अपनी सेवाएं सीमित या बंद करनी होंगी, भले ही कोई दूसरा देश इससे उलट मांग करे. 

चिंता यह भी है कि भारत के बाहर इस नेटवर्क का किस तरह इस्तेमाल हो सकता है. दिसंबर 2024 में सेना को मणिपुर में हथियारों के साथ एक डिवाइस मिला जिसे स्टारलिंक का बताया गया. मस्क ने जवाब दिया कि भारत में स्टारलिंक बीम “कभी चालू नहीं” की गई थीं.

हाल में ईरान में स्टारलिंक टर्मिनल चलने की खबरें आई हैं जबकि वहां इस सेवा के लिए कोई लाइसेंस नहीं मिला हुआ है. इससे अवैध कनेक्शनों का पता लगाने और उन्हें बंद करने की कंपनी की क्षमता पर सवाल उठे हैं.

सवाल यह है कि क्या स्टारलिंक को भारतीय कानूनों का पालन करने के लिए मजबूर किया जा सकता है, चाहे उसके मालिक की राजनैतिक सोच कुछ भी हो. स्टारलिंक कहता है कि भारत के लिए खास तौर पर बनाए उसके सिस्टम और लोकल डेटा स्टोरेज को लेकर उसकी प्रतिबद्धताएं सरकार की चिंताओं को दूर करती हैं. गृह मंत्रालय ने यह नहीं बताया है कि कौन-सी बातें अभी भी नहीं सुलझी हैं.

बाजार की अपनी सीमाएं
भले ही स्टारलिंक की बाकी बाधाएं दूर हो जाएं, फिर भी भारत मस्क की सोच के मुताबिक कोई आसान बाजार नहीं होगा. जुलाई 2025 में पेम्मासानी ने कहा कि स्टारलिंक की शुरू में 20 लाख कनेक्शन की सीमा होगी और स्पीड 200 एमबीपीएस तक सीमित होगी.

बताते हैं इसकी कीमत 3,000 रुपए महीने है, साथ ही एक बार में उपकरण का खर्च करीब 33,000 रुपए आएगा. यह कीमत जियो और एयरटेल के शुरुआती होम ब्रॉडबैंड प्लान से काफी ज्यादा होगी, जिनकी कीमत अमूमन 500-1,000 रु. महीना है.

मस्क के स्टारलिंक की सबसे बड़ी ताकत उन इलाकों में है जहां फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क और मोबाइल टावर विश्वसनीय तरीके से नहीं पहुंचते. कनेक्टिविटी का अंतर अभी भी काफी ज्यादा है: जून 2026 के भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण इलाकों में दूरसंचार सुविधा 60.9 फीसद थी, जबकि शहरी इलाकों में यह 153.4 फीसद थी.

महाराष्ट्र, गुजरात और मेघालय ने कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए स्टारलिंक के साथ आशयपत्र पर दस्तखत किए हैं. स्टारलिंक और अमेजन ने भारतीय वीसैट यानी वेरी स्मॉल अपर्चर टर्मिनल ऑपरेटरों के साथ भी समझौते किए हैं, जो कारोबारियों और सरकारी एजेंसियों को सैटेलाइट से कनेक्टिविटी मुहैया कराते हैं. लिहाजा मुद्दा स्टारलिंक नहीं बल्कि सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए कनेक्टिविटी बढ़ाने का है.

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