
प्रत्यूष कुमार
जब भी हिंदुस्तान का कोई डॉक्टर किसी केस फाइल की एआइ समरी में कुछ दुरुस्त करता है या कोई वकील गलत पढ़े गए प्रावधान की पहचान करता है, तो किसी के एआइ मॉडल को बेहतर कर रहा होता है. पर किसके? भारत अगर विदेशी एआइ की ही एक्सेस खरीदता रहेगा तो उसके यूजर अगले दस साल दूसरे देशों के ही सिस्टम को बेहतर बनाना सिखाएंगे, वह भी पैसे देकर.
भारत को दरअसल अपना एआइ स्टैक बनाना होगा क्योंकि एआइ अर्थव्यवस्था में उसकी जगह तीन ऐसी क्षमताओं पर निर्भर करेगी जिन्हें खरीदा नहीं जा सकता: बड़े पैमाने पर एआइ तैयार करना, इस्तेमाल से उसे बेहतर बनाना और उसे आगे बढ़ाने वाले लोग तैयार करना.
इस तरह की बुद्धिमत्ता रचने का मतलब है ऐसे मॉडल को ट्रेन, लागू और बेहतर बनाने की क्षमता जो उपयोगी काम कर सकें. इसके लिए कंप्यूटिंग ढांचा, डेटा, मॉडल और डेवलपर टूल चाहिए.
भारत को हर चीज खुद बनाने की जरूरत नहीं, लेकिन इन सभी स्तरों पर इतना हुनर और नियंत्रण जरूर होना चाहिए कि वह अपने तकनीकी फैसले खुद ले सके. वैश्विक साझेदारी और ओपन रिसर्च को इस क्षमता को मजबूत करना चाहिए, उसकी जगह नहीं लेनी चाहिए.
इसे अपनाना और इसमें सुधार करना इससे होने वाले आर्थिक लाभ से जुड़ा है. लोग जब अपने काम में एआइ का इस्तेमाल करते हैं तो उसमें उनकी ओर से किए जाने वाले सुधार, विशेषज्ञ के रूप में लिए गए फैसले और काम के नतीजे साफ बताते हैं कि मॉडल कहां कारगर रहा और कहां नाकाम. कह सकते हैं यह इस्तेमाल से मिलने वाला डेटा लाभ है. सहमति, कड़ी जांच और गोपनीय जानकारी की सुरक्षा के साथ यही अनुभव अगली पीढ़ी के मॉडल के लिए ट्रेनिंग डेटा और कसौटी बन जाता है.
लेकिन ये इंटरैक्शन जुटाते रहना ही काफी नहीं. भारत की संस्थाओं को ऐसे सिस्टम बनाने होंगे जो इस अनुभव को बेहतर मॉडल में बदलें और उनसे उपजी बौद्धिक संपदा पर उनका मालिकाना हक हो. वरना मांग और फीडबैक भारत देगा, जबकि उसकी वैल्यू कहीं और जमा हो रही होगी.
उसे दो बार कीमत चुकानी पड़ेगी—एक बार एआइ तक पहुंच के लिए और दूसरी बार अपना ज्ञान मुफ्त देकर. मॉडल आइपी यानी बौद्धिक संपदा पर मालिकाना हक भारतीय कंपनियों को प्रॉडक्ट बनाने, रिसर्च की प्राथमिकताएं तय करने और अपनी तैयार की गई क्षमताओं से कमाई करने का मौका देता है.
यही चक्र लोगों को भी तैयार करे. इसका रास्ता कुछ यूं हैः नॉन यूजर से यूजर बनना, यूजर से निर्माता और निर्माता से रिसर्चर. उपयोगी ऐप्लिकेशन लोगों को एआइ का पहला व्यावहारिक अनुभव देते हैं.
मॉडल, टूल और ट्रेनिंग तक पहुंच उन्हें उन समस्याओं के समाधान रचने का मौका देती है जिन्हें वे करीब से जानते हैं. मौजूदा सिस्टम की सीमाओं से टकराने वाले निर्माताओं के लिए रिसर्च तक पहुंचने का रास्ता होना चाहिए—कंप्यूटिंग सुविधा, मार्गदर्शन और ऐसे विश्वविद्यालय जो उनका स्वागत करें.

हर व्यक्ति यह पूरा सफर नहीं नापेगा—और न ही कोई इसे अपने आप तय करने निकल पड़ेगा. मकसद है इस तरक्की को बड़े पैमाने पर मुमकिन बनाना. कोई प्रोफेशनल समस्या पहचानता है, निर्माता समाधान लाता है और रिसर्चर उसे भरोसेमंद बनाने वाली क्षमता विकसित करता है. ये सारे पहलू जुड़कर भारत को ऐसा व्यापक आधार देते हैं जो बड़े पैमाने पर इस्तेमाल या मुट्ठी भर बड़ी प्रयोगशालाएं अपने बूते नहीं दे सकतीं.
फिर सुरक्षा का सवाल. रक्षा, अहम बुनियादी ढांचे और संवेदनशील सरकारी काम में इस्तेमाल मॉडल की स्वतंत्र तकनीकी जांच जरूरी है क्योंकि खतरे अब काल्पनिक नहीं रहे. 2025 में एंथ्रोपिक, यूके एआइ सिक्योरिटी इंस्टीट्यूट और एलन ट्यूरिंग इंस्टीट्यूट के रिसर्चरों ने दिखाया कि महज 250 ‘जहरीले’ डॉक्युमेंट भी अलग-अलग आकार के मॉडल में सेंध का रास्ता बना सकते हैं.
इससे पहले एक अध्ययन में पाया गया कि जानबूझकर ट्रेन किए गए छिपे व्यवहार सक्रिय होने तक निष्क्रिय रह सकते हैं और आम सुरक्षा ट्रेनिंग के बाद भी बने रह सकते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि हर इस्तेमाल हो रहे मॉडल में कोई छिपा जाल है. मतलब यह कि कोई भी देश यह मानकर नहीं चल सकता कि ऐसा जाल नहीं है.
भारत को मॉडल का व्यवहार समझने, ट्रेनिंग प्रक्रिया की जांच करने, निहित क्षमताओं का पता लगाने और कमजोरियां दूर करने वाला हुनर चाहिए. किसी मॉडल को भारत में रखना भर काफी नहीं और घरेलू मालिकाना हक भी अपने आप में किसी बात की गारंटी नहीं देता.
बड़े मॉडल को पूरी तरह समझना अब भी मुश्किल है, इसीलिए लगातार रिसर्च और जांच जरूरी है. अपनी एआइ क्षमता होने का मतलब है जोखिमों का स्वतंत्र आकलन करने और जरूरत पड़ने पर किसी सिस्टम को बदलने या उसकी जगह दूसरा सिस्टम लाने के लिए जरूरी पहुंच, लोग और बुनियादी ढांचा होना.
ये लक्ष्य एक-दूसरे को मजबूत करते हैं. कंप्यूटिंग क्षमता मॉडल तैयार करने और सुरक्षा जांच, दोनों में मदद देती है. इस्तेमाल से सबूत मिलते हैं, सबूत मॉडल की बौद्धिक संपदा मजबूत करते हैं और बेहतर मॉडल ज्यादा निर्माता तथा रिसर्चर तैयार करते हैं, जो आगे और बेहतर मॉडल बनाते हैं.
सरकारी निवेश को साझा बुनियादी ढांचे, रिसर्च फंडिंग और प्रतिस्पर्धी खरीद के जरिए इन कड़ियों को जोड़ना चाहिए. उसे एक नहीं कई सक्षम संगठनों को सहारा देना चाहिए और सबके लिए प्रदर्शन तथा सुरक्षा के साफ पैमाने तय करने चाहिए.
भारत को बेहतरीन विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करते रहना चाहिए. पर उसे अपनी तकनीक बनाने की क्षमता भी खड़ी करनी होगी—एआइ को सीखने में, सीखने को मॉडल की बौद्धिक संपदा में और इन दोनों को हुनरमंद लोगों की बढ़ती जमात में बदलना होगा. इसके लिए निरंतर निवेश और अनुशासित अमल चाहिए. दूसरा रास्ता हैः भारत दूसरे देशों की एआइ क्षमता का बाजार बनकर रह जाए.
लेखक सर्वम एआइ के सह-संस्थापक हैं

