
लगता है सबसे बुरा दौर अब सामने आ रहा है. पूरे भारत में अल नीनो (प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के असामान्य रूप से गर्म होने) के कारण मॉनसून की कम बारिश से 2026 के पहले नौ महीनों में देश का 51.2 फीसद हिस्सा सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है.
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) गांधीनगर स्थित वाटर ऐंड क्लाइमेट लैब की ओर से विकसित इंडिया ड्राउट मॉनिटर के मुताबिक, गोवा का 100 फीसद क्षेत्र, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का 95.7 फीसद, महाराष्ट्र का 84.1 फीसद, सिक्किम का 81.8 फीसद, पंजाब का 80 फीसद और हरियाणा तथा तेलंगाना का 76 फीसद हिस्सा सूखे जैसे हालात से गुजर रहा है.
सूखा प्रभावित क्षेत्र पिछले साल की तुलना में तीन गुना और 2024 की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है. सूखे का साल उसे माना जाता है, जिसमें कुल बारिश की कमी 10 फीसद से ज्यादा हो और 20 फीसद से अधिक इलाका सूखे की चपेट में हो. भारतीय मौसम विभाग ने मॉनसून के चार महीनों में कुल बारिश में 13 फीसद की कमी दर्ज की है, जो एक दशक से ज्यादा समय में सबसे बड़ी गिरावट है.
मुश्किल में राज्य
नतीजे पहले से ही दिख रहे हैं. केंद्र सरकार ने अब तक पांच राज्यों—कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों, तेलंगाना और राजस्थान—को सूखा प्रभावित घोषित किया है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के अनुसार, भारी बारिश और बाढ़ से 6,11,000 हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित हुई है.
कर्नाटक देश का पहला राज्य है जिसने 35 फीसद से भी ज्यादा बारिश की कमी के कारण 240 में से 177 तालुके सूखाग्रस्त घोषित किए हैं. 150 साल में पहली बार ऐसे बदतर हालात बने हैं. 22 सितंबर को डिप्टी सीएम जी. परमेश्वर ने विधानसभा में बताया कि 11 जिलों में बुआई 75 फीसद से कम हुई है और फसल का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया है.
राज्य सरकार ने कुल आर्थिक नुक्सान का अनुमान 40,000 करोड़ रुपए लगाया है, जिसमें से फसल को हुए नुक्सान का मूल्य 18,748.2 करोड़ रुपए है. यह प्रदेश के 101 तालुकों में 19.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर हुआ नुक्सान है, जो कुल फसल का 33 फीसद है.
महाराष्ट्र का हाल भी ऐसा ही है. दो महीने अच्छी बारिश के बाद राज्य के कुछ हिस्सों से मॉनसून लगभग गायब हो गया, जिससे फसलें सूखने लगीं और पानी के स्रोत भी सूख गए. 26 सितंबर को राज्य ने अपने 358 तालुकों में से 265 यानी 74 फीसद को सूखा पीड़ित घोषित कर दिया.
मराठवाड़ा और विदर्भ के लंबे समय से संकटग्रस्त कृषि क्षेत्रों के साथ सोलापुर समेत उत्तरी और पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में हालात बहुत खराब हैं. अधिकारी अभी भी फसल के नुक्सान का आकलन कर रहे हैं, लेकिन कई किसानों ने राज्य की मुख्य नकदी फसलों सोयाबीन, मक्का और कपास में भारी नुक्सान की बात कही है.
सोलापुर की कुछ तहसीलों में खरीफ (जून-सितंबर का मौसम) की फसल में 89-90 फीसद तक नुक्सान होने का अनुमान है जबकि बुल्ढाणा में सोयाबीन की पैदावार 70-75 फीसद तक गिर सकती है.
पुणे जिले के कुछ हिस्सों में उगाए जाने वाले मशहूर इंद्रायणी चावल की पैदावार पर भी मॉनसून की मार पड़ेगी. 29 सितंबर को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि सूखा प्रभावित तालुकों की पहली सूची में शामिल नहीं किए गए 93 तालुकों में सूखा राहत उपाय लागू किए जाएंगे.
तेलंगाना में कागजों पर तो बारिश की कमी थोड़ी दिखी, लेकिन जमीनी स्तर पर असमानता ज्यादा नजर आई. इस खरीफ सीजन में राज्य में बारिश में 17 फीसद की कमी दर्ज की गई जिसे वैज्ञानिक तौर पर ‘सामान्य मॉनसून’ माना जाता है. हालांकि, ‘रायतू स्वराज्य वेदिका’ जैसे किसान संगठनों का कहना है कि यह आंकड़ा स्थिति की गंभीरता को नहीं दर्शाता.
कई जिलों और मंडलों में बारिश की कमी बहुत ज्यादा रही जो 20 से 59 फीसद के बीच थी. इनमें दक्षिण तेलंगाना के महबूबनगर और नलगोंडा भी शामिल हैं, जिसके कारण कई इलाकों में फसलें मुरझा गईं या सूख गईं. प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके परिणामस्वरूप इस साल कुल फसल पैदावार में कमी आ सकती है.
पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में सितंबर के आखिरी सप्ताह में भारी बारिश हुई थी खासकर उत्तरी आंध्र के जिलों में, पर अब वहां कई मंडलों में सूखे जैसी स्थिति बन रही है. शुरुआती अनुमानों से पता चलता है कि 513 मंडलों पर ‘अल नीनो’ का असर पड़ा और इनमें से आधे से ज्यादा मंडलों में स्थिति गंभीर लग रही है.


माॅनसून का बदलता मिजाज
हालांकि बड़ा बदलाव वह घटना है जिसके तहत सूखा अब धीरे-धीरे देश भर में व्यापक आकार ले रहा है. आइआइटी गांधीनगर में प्रोफेसर और अनुसंधान एवं विकास (आरऐंडडी) के डीन विमल मिश्र की मानें तो असल समस्या यह है कि माॅनसूनी बारिश अब अतिवादी घटनाओं में बदल रही है.
एक सीजन में बारिश वाले दिनों की संख्या घट रही है और बहुत तेज बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ रही है. तेज बारिश से स्थानीय स्तर पर छोटे क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है लेकिन इसके बाद पड़ने वाला सूखा आमतौर पर बहुत बड़े क्षेत्र को प्रभावित करता है.
मिश्र कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन के कारण हम एक ही सीजन में बहुत अधिक बाढ़ और सूखा देख सकते हैं. जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, बारिश कम होने पर बहुत तेजी से सूखे जैसी स्थिति बन जाती है.”
बारिश वाले दिन कम होने के कारण दो बारिशों के बीच का अंतर भी बढ़ रहा है. मसलन, 1 जुलाई से 19 सितंबर के बीच राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब और हरियाणा में लगातार दो से तीन हफ्तों तक शुष्क दिन रहे. 25 किमी के दायरे में 2.5 मिमी से कम बारिश के दिन को शुष्क दिन माना जाता है.
आगे हालात और खराब हो सकते हैं. विश्व मौसम संगठन का अनुमान है कि इस साल के अंत तक अल नीनो बेहद ताकतवर हो सकता है, जिससे 2027 तक बाढ़, सूखे और भीषण गर्मी का खतरा बढ़ जाएगा.
इसका असर खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 28 सितंबर को न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के दौरान चेताया कि यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्धों के साथ सुपर अल नीनो के असर के कारण आने वाले महीनों में दुनिया को “बड़े खाद्य संकट” का सामना करना पड़ सकता है.
खेती पर असर
बारिश का इस तरह बदलता ढर्रा फसलों और पौधों के लिए कतई सही नहीं. आइआइटी बंबई के सेंटर फॉर क्लाइमेट स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर कार्तिकेयन लंका के मुताबिक, मिट्टी की पानी सोखने की एक क्षमता होती है; उससे ज्यादा पानी बह जाता है.
वे कहते हैं, “अत्यधिक बारिश के बाद लंबा सूखा पौधों के जीवित रहने के लिए सही स्थितियां नहीं बना पाता क्योंकि उन्हें एक बार में बहुत ज्यादा पानी मिल जाता है और बाकी दिन उन्हें प्यासे ही रहना पड़ना है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप अपने बगीचे के किसी पौधे पर एक साथ पूरी बाल्टी पानी नहीं डालते क्योंकि ऐसा करने पर वह मर जाएगा.”
वे यह भी कहते हैं कि जब पानी सही अंतराल पर मिलता है, तो पौधा उसका सही इस्तेमाल कर पाता है और उसका अच्छी तरह विकास होता है.
कम्युनिकेशंस अर्थ ऐंड एनवायरनमेंट जर्नल में प्रकाशित 2024 के एक अध्ययन में 1990 से 2017 तक भारत में धान की खेती और मौसम के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर पाया गया कि बारिश की कमी ने धान की पैदावार घटाई है. लेकिन इससे यह भी पता चला कि ज्यादा बारिश हमेशा अच्छी नहीं होती.
अत्यधिक बारिश से और भी ज्यादा नुक्सान हुआ; इससे धान की पैदावार 33.7 फीसद घट गई, जबकि बारिश की कमी से 19 फीसद ही नुक्सान हुआ. मौजूदा सीजन में खेती के लिए पानी की किल्लत के अलावा, सूखा अगले 2-3 कृषि चक्रों को भी प्रभावित कर सकता है.
विमल मिश्र कहते हैं कि यही बात इसे और खतरनाक बनाती है: इसका असर खेती, पानी की उपलब्धता, भूजल रिचार्ज, पनबिजली प्रभावित होने से बिजली की मांग और सिंचाई पर पड़ता है.
सूखे के लिए सिर्फ कम बारिश जिम्मेदार नहीं बल्कि इंसानी कारण भी इसका असर बढ़ा रहे हैं. अत्यधिक शहरीकरण और कंक्रीट के निर्माण ने भूजल रिसाव धीमा कर दिया है, जबकि बड़े पैमाने पर निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास से भूजल का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, जो दोबारा रीचार्ज नहीं हो पा रहा.
यही वजह है कि बेंगलूरू, मुंबई और चेन्नै जैसे प्रमुख शहरी केंद्र भी पर्याप्त बारिश के बावजूद जल संकट का सामना कर रहे हैं. विकास पर परामर्श देने वाली संस्था आइपीई ग्लोबल के क्लाइमेट चेंज ऐंड सस्टेनेबिलिटी के ग्लोबल हेड अविनाश मोहंती कहते हैं, “यह वही दोहरी मार या दोहरी उलझन है जिसकी हम बात करते रहे हैं.”

सक्रियता ज्यादा जरूरी
मौसम की अन्य चरम घटनाओं के विपरीत सूखा अचानक नहीं पड़ता बल्कि यह हफ्तों और महीनों में सामने आता है. इसके बावजूद, भारत की सूखा प्रबंधन नीति मुख्यत: प्रतिक्रियात्मक यानी घटना के बाद कदम उठाने वाली बनी हुई है, जिसमें सूखा घोषित होने के बाद ही किसानों को फसल के नुक्सान के लिए राहत दी जाती है.
हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक जी.वी. रामंजनेयुलु कहते हैं कि सूखा नियमावली अकाल के दृष्टिकोण से लिखी गई है. इसमें एक बार राज्य की तरफ से सूखा घोषित करने के बाद केंद्र जमीनी दौरे के माध्यम से नुक्सान की पुष्टि करता है और फिर मुआवजे की घोषणा करता है. वे कहते हैं, “यह प्रक्रिया पोस्टमाॅर्टम की तरह है क्योंकि किसान को राहत मिलने में एक-दो साल लग जाते हैं.”
चूंकि हर साल देश के किसी न किसी हिस्से में सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है, इसलिए स्थिति बिगड़ने के बाद कदम उठाने की रणनीति के बजाए पहले से तैयारी और अनुकूलन की दिशा में बढ़ने की जरूरत है. हाल ही, कृषि मंत्री चौहान ने राज्यों से कहा कि अपने क्षेत्र में उपलब्ध पानी और मिट्टी में नमी के आधार पर रबी फसल की बुवाई की योजना बनाएं.
रामंजनेयुलु भी बेहतर पूर्वानुमान की जरूरत पर जोर देते हैं ताकि किसानों को बीज खरीदने से पहले और सीजन के दौरान सही सलाह दी जा सके, जिससे वे बेहतर फसल चक्र, बेहतर उत्पादन तरीके और बेहतर बीमा तंत्र अपना सकें.
भारत में अभी डेटा प्रबंधन के लिए पहले से सक्रिय रहने वाले सिस्टम की कमी है. भले ही आइटी सिस्टम, ड्रोन और सैटेलाइट मैप की मदद से सूखे का अनुमान लगाना आसान हो गया हो लेकिन इस क्षमता को सरकारी तंत्र में शामिल नहीं किया गया है.
इसकी अग्रिम जानकारी मिलने से नीति-निर्माता और समुदाय जल संसाधनों की रक्षा कर सकते हैं, फसलों की योजना बना सकते हैं और छोटे किसानों की आजीविका को बचा सकते हैं. रामंजनेयुलु की राय में प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि इन पूर्वानुमानों को ऐसी व्यावहारिक जानकारी में बदला जा सके जो सरकारों और किसानों के काम आए.
—साथ में ब्यूरो रिपोर्ट

