scorecardresearch
डार्क मोड

सत्ताईस के लिए आई नई सेना

पश्चिमी यूपी से राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का शंखनाद, पूर्वांचल में विनोद तावड़े की सक्रियता और बूथ तक संगठन की नई टीम, भाजपा ने 2027 के लिए चुनावी मशीनरी में भरा नया जोश

 Uttar Pradesh
मेरठ के सम्मेलन में (बाएं से) मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी
अपडेटेड 6 अक्टूबर , 2026

पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लंबे समय से राज्य की सत्ता की दिशा तय करने वाला क्षेत्र माना जाता है. यहां से उठने वाले मुद्दे अक्सर लखनऊ की राजनीति तक पहुंचते हैं. इसीलिए भाजपा ने 2027 के विधानसभा चुनाव के अभियान की शुरुआत पश्चिमी यूपी से की है.

21 सितंबर को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन मेरठ पहुंचे तो उनके साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी मौजूद थे. सुभारती विश्वविद्यालय परिसर में करीब 2,000 छात्रों से युवा संवाद के बाद लगभग 4,800 शक्ति केंद्र संयोजकों और मंडल अध्यक्षों का सम्मेलन हुआ.

नवीन ने संगठन के विस्तार और जमीनी संपर्क पर जोर दिया. योगी ने हर बूथ की समीक्षा, परिवारों की मैपिंग और पन्ना प्रमुखों की जिम्मेदारी तय करने को कहा जबकि चौधरी ने शक्ति केंद्र संयोजकों को संगठन की अहम कड़ी बताते हुए सक्रियता बढ़ाने पर जोर दिया.

नवीन के दो दिवसीय दौरे का अगला पड़ाव सहारनपुर था, जहां उन्होंने पार्टी की बैठक में हिस्सा लिया और पूर्व पदाधिकारियों तथा वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की. बूथ की तैयारियों, जनसंपर्क, संगठन की मजबूती और 2027 की रणनीति पर चर्चा हुई.

राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पश्चिमी यूपी के उनके पहले दौरे को पार्टी के अभियान के औपचारिक रूप से जमीन पर उतरने और चुनावी मशीनरी को बूथ स्तर पर सक्रिय करने की शुरुआत माना जा रहा है.

राष्ट्रीय अध्यक्ष की पश्चिमी यूपी में मौजूदगी के समानांतर भाजपा ने पूर्वी यूपी में भी गतिविधियां तेज कर दी हैं. पहले भाजपा ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और महाराष्ट्र के नेता विनोद तावड़े को यूपी का प्रभारी बनाने के साथ गुजरात के जगदीश पटेल को सहप्रभारी बनाया था.

23 सितंबर को मेधा कुलकर्णी, डॉ. प्रदीप वर्मा और अनंत ओझा को भी बतौर सह प्रभारी यूपी की जिम्मेदारी सौंपी. जिम्मेदारी संभालने के बाद तावड़े ने प्रदेश संगठन और सरकार के शीर्ष नेताओं से संपर्क शुरू किया. सितंबर के पहले हफ्ते में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद वे 11 सितंबर की कोर कमेटी बैठक में भी शामिल हुए.

फिर उन्होंने पूर्वी यूपी का रुख किया. 18 सितंबर को गोरखपुर के रानीडीहा कार्यालय में उन्होंने पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के साथ अलग-अलग बैठकें कीं. रानीडीहा से सहजनवां तक इन बैठकों में जनता से सीधे संवाद की रूपरेखा पर चर्चा हुई.

तावड़े वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद राधामोहन दास अग्रवाल के घर गए और सहयोगी निषाद पार्टी के अध्यक्ष तथा योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद से भी मिले. दोनों नेता हाल में अलग-अलग मुद्दों पर नाराजगी जता चुके थे. लिहाजा, इन मुलाकातों को असरदार नेताओं से संवाद सुधारने की कोशिश माना गया.

चुनावी तैयारियों की एक और अहम कड़ी राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बी.एल. संतोष की सक्रियता है. 11 से 13 सितंबर के बीच उन्होंने प्रदेश संगठन और चुनावी तैयारियों का फीडबैक लिया. लखनऊ में मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेताओं के साथ कोर कमेटी की बैठक के बाद कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में सांसदों, विधायकों, जिलाध्यक्षों और संगठन पदाधिकारियों से जमीनी स्थिति जानी.

पूर्व प्रदेश अध्यक्षों से भी अलग-अलग क्षेत्रों की ताकत और चुनौतियों पर बातचीत हुई. बैठकों में विपक्ष के नैरेटिव, सामाजिक मुद्दों और संगठन की सक्रियता पर चर्चा हुई. इसके बाद 16 सितंबर से संघ और भाजपा की समन्वय बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ.

लखनऊ की पहली बैठक में संतोष, संघ के राष्ट्रीय सह सरकार्यवाह अरुण कुमार, तावड़े, चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह मौजूद थे. विपक्षी नैरेटिव, सहयोगी दलों के व्यवहार, जनकल्याण योजनाओं के असर तथा कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों की नाराजगी पर चर्चा हुई.

पार्टी सभी छह क्षेत्रों में ऐसी बैठकों के जरिए संगठन और बूथ स्तर के समीकरणों की समीक्षा करेगी. यानी अभियान बड़े नेताओं की सभाओं तक सीमित नहीं है. पार्टी बूथ, शक्ति केंद्र, मंडल, जिला, क्षेत्र और प्रदेश स्तर पर एक साथ काम करने वाली संरचना खड़ी कर रही है.

अभियान जमीन पर उतारने से पहले भाजपा ने राष्ट्रीय संगठन में भी उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी बढ़ाई. नितिन नवीन की नई टीम में प्रदेश से आठ नेताओं को जगह मिली है, जो पिछली टीम से एक अधिक है. पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी राष्ट्रीय महामंत्री, रेखा वर्मा और प्रो. तारिक मंसूर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा बुलंदशहर के सांसद भोला सिंह और राज्यसभा सदस्य संगीता यादव राष्ट्रीय सचिव बनाए गए.

अमरपाल मौर्य को ओबीसी मोर्चे और कुंवर बासित अली को अल्पसंख्यक मोर्चे की राष्ट्रीय जिम्मेदारी मिली. इन नियुक्तियों में पिछड़े, दलित, सवर्ण, महिला और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को साथ साधने की कोशिश दिखती है.

यह इसलिए भी अहम है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें 2019 की 62 से घटकर 33 रह गईं. समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं.

विपक्ष ने संविधान, आरक्षण और पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सवालों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाया. अब भाजपा के सामने 2022 की स्थिति बचाने की चुनौती है, जब उसने 255 विधानसभा सीटें जीती थीं और एनडीए 273 पर पहुंचा था.

राष्ट्रीय टीम से पहले प्रदेश संगठन में बदलाव शुरू हो चुका था. पंकज चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद करीब नौ महीने की कवायद में संगठन को नए सिरे से तैयार किया गया. नई प्रदेश कार्यकारिणी में 32 नए चेहरे शामिल हुए और बड़ी संख्या में पदाधिकारी 40 से 45 साल की उम्र के हैं.

सामाजिक प्रतिनिधित्व में ओबीसी को खास जगह मिली. प्रमुख पदाधिकारियों में करीब 30 ओबीसी नेताओं के साथ सामान्य वर्ग के 27, अनुसूचित जाति के छह और अनुसूचित जनजाति के एक नेता को जिम्मेदारी मिली. यादवों के मुकाबले गैर-यादव ओबीसी समुदायों का प्रतिनिधित्व अधिक है.

लोध, शाक्य, कुर्मी, सैनी, निषाद, मौर्य और कश्यप समुदायों के नेताओं को अहम पद मिले हैं. भाजपा के एक पूर्व महामंत्री कहते हैं, “पार्टी जानती है कि 2022 की जीत का सबसे बड़ा आधार गैर-यादव ओबीसी थे. यह सामाजिक गठबंधन कायम रहा तो विपक्ष के लिए भाजपा को चुनौती देना आसान नहीं होगा, इसीलिए नई कार्यकारिणी में यही वर्ग सबसे ज्यादा दिखाई देता है.”

प्रतिनिधित्व को एक जातीय समूह तक सीमित नहीं रखा गया. ब्राह्मण और क्षत्रिय नेतृत्व को कायम रखा गया है. ब्राह्मण समाज के करीब दर्जन भर चेहरों के अलावा पांच भूमिहार, दो वैश्य और एक कायस्थ को जगह मिली है.

नई प्रदेश कार्यकारिणी में पश्चिमी यूपी की हिस्सेदारी चर्चा में रही. प्रदेश महामंत्री जैसे अहम पद पर क्षेत्र के किसी नेता को जगह नहीं मिली. राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण मेरठ से भी किसी चेहरे का शामिल न होना स्थानीय चर्चा का विषय बना. पूर्वांचल और अवध को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व मिला. करीब 38 प्रमुख पदाधिकारी इन्हीं क्षेत्रों से आते हैं जबकि पश्चिम और ब्रज की मौजूदगी कम है.

इसी बीच 3 सितंबर को सभी छह क्षेत्रीय टीमों का ऐलान हुआ. पिछली टीमों के मुकाबले जिम्मेदारियों का दायरा बढ़ा है. कई क्षेत्रों में चार महामंत्री, दस उपाध्यक्ष और दस मंत्री बनाए गए हैं. इनके जरिए प्रदेश नेतृत्व और जिलों का संपर्क मजबूत करने, मंडल तथा बूथ तक पार्टी के कार्यक्रम और सरकारी योजनाएं पहुंचाने और सामाजिक समूहों के बीच पैठ बनाने की कोशिश है.

ओबीसी रणनीति क्षेत्रीय टीमों में भी दिखाई देती है. कानपुर में राजेश पटेल, काशी में कविता पटेल, ब्रज में राजेश्वर पटेल और अवध में अवधेश कटियार महामंत्री बनाए गए हैं. इसे कुर्मी समाज तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश माना जा रहा है. पश्चिमी यूपी में सैनी समाज को भी जगह मिली है.

रूपेंद्र सैनी को महामंत्री, प्रदीप सैनी को उपाध्यक्ष, कुमुदिनी सैनी को मंत्री और कृष्णचंद सैनी को सदस्य बनाया गया. क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर गुर्जर समाज से हैं. यहां का पेचीदा सामाजिक समीकरण में इन समूहों की मौजूदगी चुनावी तैयारी का अहम हिस्सा है.

पार्टी की कोशिश है कि संगठन में मिले सामाजिक प्रतिनिधित्व को केवल पदों की सूची तक सीमित न रखा जाए, बल्कि नए पदाधिकारी अपने समुदायों के बीच सरकार की योजनाओं और पार्टी का संदेश लगातार पहुंचाएं.

लखनऊ के बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, “अगर बड़ी संख्या में नए लोगों को शामिल करना था तो कार्यकारिणी का ऐलान काफी पहले होना चाहिए था ताकि संगठन जमीनी और चुनावी चुनौतियों को समझकर उनसे तालमेल बिठा सके.”

इस पूरी चुनावी संरचना में आरएसएस के साथ तालमेल भी अहम है. काशी, गोरखपुर, अवध, ब्रज, पश्चिम और कानपुर क्षेत्र में संघ-भाजपा समन्वय बैठकों की योजना है. मकसद बूथ स्तर तक संगठन की हालत, सामाजिक समीकरण और चुनावी चुनौतियों की समीक्षा है.

संतोष और तावड़े करीब एक महीने तक प्रशासनिक मंडलों और पार्टी के क्लस्टरों का जायजा लेंगे. बैठकों में बूथों पर पार्टी की स्थिति, असरदार जातियों के राजनैतिक रुझान और स्थानीय चुनौतियां परखी जाएंगी.

यही भाजपा की 2027 की ‘सेना’ का असली ढांचा है. सबसे ऊपर राष्ट्रीय अध्यक्ष नवीन हैं, जिनकी पहली बड़ी चुनावी दस्तक पश्चिमी यूपी से हुई. प्रदेश में तावड़े और जगदीश पटेल की जोड़ी है. संगठन की कमान धर्मपाल सिंह और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के पास है.

संतोष जमीनी संगठन की समीक्षा कर रहे हैं. छह क्षेत्रीय टीमें जिलों और मंडलों तक पहुंच रही हैं. शक्ति केंद्र संयोजक, मंडल अध्यक्ष और पन्ना प्रमुख बूथ तक चुनावी मशीनरी चलाने वाली कड़ियां हैं. इनके समानांतर संघ का समन्वय तंत्र काम कर रहा है. यह नई सेना कितनी कारगर होगी, इसका जवाब विधानसभा चुनाव के नतीजे देंगे.

ADVERTISEMENT
Advertisement