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आखिर क्यों उठ रहा मस्जिदों पर विवाद

सहारनपुर में मस्जिद ढहाने के बाद मुरादाबाद और संभल में धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई की प्रक्रिया ने पश्चिमी यूपी में 2027 के चुनाव से पहले कानून, आस्था और राजनीति की बहस तेज कर दी है

Uttar Pradesh
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद ढहाते बुलडोजर
अपडेटेड 29 सितंबर , 2026

‌पश्चिtमी उत्तर प्रदेश के जिले सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई सुबह बुलडोजर चलने के साथ शुरू नहीं हुई थी. इसकी शुरुआत कई घंटे पहले रात के अंधेरे में हो चुकी थी.

प्रशासन ने कलेक्ट्रेट के चारों प्रवेश द्वार बंद कर पूरे परिसर को सुरक्षा घेरे में ले लिया था. बाहर से परिसर में सामान्य आवाजाही बंद थी लेकिन भीतर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी कार्रवाई की तैयारियों में जुटे थे.

रात में ही बेदखली की कार्रवाई के बाद सीलिंग की प्रक्रिया पूरी कर ली गई. रात बढ़ने के साथ कलेक्ट्रेट की ओर आने वाले रास्तों पर पुलिस निगरानी बढ़ती गई और वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद रहे. सुबह करीब छह बजे बुलडोजर ने 315 वर्गमीटर जमीन पर बनी दो मंजिला मस्जिद को गिराना शुरू किया.

सात बुलडोजर, 12 डंपर और चार ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की मदद से मस्जिद का मलबा हटाया गया. कार्रवाई करीब 18 घंटे तक चली और 6 सितंबर की सुबह तक कलेक्ट्रेट परिसर की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी.

जहां दो मंजिला मस्जिद खड़ी थी, वहां सपाट सरकारी जमीन नजर आ रही थी. दोपहर करीब 12 बजे तक ढांचा जमींदोज हो चुका था और इसके बाद मलबा हटाकर डंपरों में भरने का काम तेजी से कराया गया. कुछ ही घंटों में कार्रवाई स्थल का बड़ा हिस्सा समतल कर दिया गया.

ढहने से पहले की स्थिति में मस्जिद

कलेक्ट्रेट परिसर में बनी इस मस्जिद को प्रशासन ने सरकारी जमीन पर बना अनधिकृत निर्माण माना था. कार्रवाई उत्तर प्रदेश पब्लिक प्रीमिसेज (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) ऐक्ट, 1972 के तहत हुई. लेकिन मस्जिद गिराए जाने के बाद विवाद खत्म होने के बजाए और गहरा गया.

मस्जिद प्रबंधन का आरोप है कि ध्वस्तीकरण में सही कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जबकि प्रशासन का कहना है कि जुलाई में जारी बेदखली आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी की अपील 2 सितंबर को जिला जज की अदालत ने खारिज कर दी थी और इसके बाद कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई.

सहारनपुर के सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह कहते हैं, “मस्जिद इसलिए गिराई गई क्योंकि जुलाई में दिए गए हटाने के आदेश के खिलाफ अपील ऊपरी अदालत में खारिज हो चुकी थी.”

सहारनपुर रेंज के डीआइजी अभिषेक सिंह ने भी कहा कि कार्रवाई के दौरान सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी एहतियाती कदम उठाए गए. उनके मुताबिक, सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने पाया था कि कलेक्ट्रेट में बनी मस्जिद सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बनाई गई थी और मस्जिद समिति की अपील भी खारिज हो चुकी थी.

मस्जिद के मुतवल्ली तनवीर अहमद का आरोप है कि कार्रवाई बिना किसी अलग विध्वंस आदेश के की गई. उनका कहना है “सिटी मजिस्ट्रेट ने जुलाई में बेदखली का आदेश जारी किया था, जिसमें 30 दिनों के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया था. मस्जिद कमेटी ने इस आदेश को जिला जज की अदालत में चुनौती दी और 2 सितंबर को उनकी याचिका खारिज हुई.”

तनवीर अहमद के मुताबिक, ध्वस्तीकरण का कोई अलग आदेश नहीं था. उनका तर्क है कि जिस दौरान मामला सिविल कोर्ट में लंबित रहा, उस अवधि को 30 दिन की बेदखली अवधि में शामिल नहीं किया जाना चाहिए. इसलिए उनके अनुसार, बेदखली की अवधि समाप्त नहीं हुई थी और इसके बावजूद 5 सितंबर को मस्जिद गिरा दी गई.

विवाद की शुरुआत मार्च 2025 में हुई थी. बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी की शिकायत के बाद राजस्व विभाग ने मामले की जांच शुरू की. पठानपुरा हल्के के लेखपाल नीरज कुमार ने 24 मार्च, 2025 को नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में वाद दाखिल किया.

इसमें बताया गया कि खसरा संख्या 539 का कुल रकबा 28.04 बीघा राजस्व अभिलेखों में कचहरी-कलेक्ट्रेट परिसर के रूप में दर्ज है. इसी परिसर में डाकघर था. डाकघर स्थानांतरित करने के बाद वहां पर वादकारियों की सुविधा के लिए विश्रामस्थल बनाया गया था.

राजस्व विभाग की जांच में कहा गया कि कुछ लोगों ने भूतल और ऊपरी मंजिल पर अनधिकृत रूप से कब्जा कर वहां नमाज पढ़ना और पढ़ाना शुरू कर दिया. डाकघर से किराया वसूले जाने का आरोप भी लगाया गया. प्रशासन ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड से जुड़े कूटरचित अभिलेख दर्शाने का भी उल्लेख किया.

16 अप्रैल, 2025 को मस्जिद पक्ष को नोटिस जारी किया गया. जवाब में मस्जिद प्रबंधन ने तर्क दिया कि भूमि खसरा संख्या 539 की जमींदारी अभी समाप्त नहीं हुई है और अभिलेख में इसके मालिकाना हक का उल्लेख है.

उनका कहना था कि सरकार ने उस भूमि को न तो खरीदा और न अधिग्रहीत किया. मस्जिद पक्ष ने यह भी दलील दी कि सरकारी इमारतें ब्रिटिश कॉलोनियों की निर्माण शैली के अनुसार करीब 20 फीट ऊंची हैं जबकि मस्जिद का निर्माण इस्लामिक निर्माण शैली के अनुसार हुआ है इसलिए इसका निर्माण सरकार ने नहीं कराया.

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाने का सवाल भी उठाया गया. साक्ष्य के तौर पर 1 जनवरी, 1911 को जारी बिजली कनेक्शन प्रमाणपत्र, नगर निगम में जमा टैक्स की रसीदें और वक्फ तथा पोस्ट ऑफिस के बीच 3 नवंबर, 1994 को हुए लीज एग्रीमेंट पेश किए गए. हालांकि नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने बिजली कनेक्शन और नगर निगम के वार्षिक कर निर्धारण को स्वामित्व के अधिकार के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं माना.

जांच और सुनवाई की प्रक्रिया में करीब 477 दिन लगे. 16 जुलाई, 2026 को नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने 37 पन्नों के फैसले में 315 वर्गमीटर जमीन पर बने ढांचे को सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जा मानते हुए मस्जिद पक्ष को बेदखल करने और जमीन को सरकारी संपत्ति घोषित करने का आदेश दिया.

यूपी पब्लिक प्रीमिसेज ऐक्ट के तहत 30 दिनों के भीतर परिसर खाली करने को कहा गया. साथ ही पांच प्रतिशत की ब्याज दर से सर्किल रेट और क्षेत्रफल के आधार पर 70 साल के कथित अवैध कब्जे की क्षतिपूर्ति के लिए 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 500 रुपए वसूलने का आदेश दिया गया. अदालत के मुताबिक, राजस्व रिकॉर्ड में नाॅन जेड ए खसरा संख्या 539 फसली वर्ष 1324 और 1359 में कलेक्ट्रेट-कचहरी के रूप में दर्ज था.

सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी ने जिला जज की अदालत में अपील की, लेकिन 2 सितंबर, 2026 को जिला जज ने अपील खारिज कर निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा. इसके तीन दिन बाद 5 सितंबर को ध्वस्तीकरण शुरू कर दिया गया.

इसी तेजी को लेकर मस्जिद प्रबंधन ने सवाल उठाए. उसका कहना था कि सिटी मजिस्ट्रेट का आदेश बेदखली का था, अलग से ध्वस्तीकरण आदेश नहीं था और कोर्ट में मामला लंबित रहने की अवधि को 30 दिन की समयसीमा में नहीं जोड़ा जाना चाहिए था. प्रशासन ने इसके विपरीत कहा कि अपील खारिज होने के बाद बेदखली आदेश प्रभावी हो गया था.

ध्वस्तीकरण के बाद मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट पहुंचा. हाइकोर्ट ने 11 सितंबर को सिटी मजिस्ट्रेट की तरफ से लगाए गए 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 500 रुपए के हर्जाने की वसूली पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी और राज्य सरकार से जवाब मांगा.

न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकलपीठ ने मोहम्मद तनवीर अहमद की याचिका पर यह आदेश दिया. हाइकोर्ट ने राज्य सरकार को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने तथा याचिकाकर्ता को उसके बाद एक सप्ताह में प्रत्युत्तर दाखिल करने का समय दिया. मामले की अगली सुनवाई 12 अक्तूबर को निर्धारित है. ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर विपक्ष ने योगी सरकार को घेरा.

सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इसे सहारनपुर के लोगों के लिए काला दिन बताया और कहा कि यह देश के संविधान पर हमला है. उन्होंने कहा कि लड़ाई को हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा.

सहारनपुर की कार्रवाई के कुछ ही दिनों बाद 9 सितंबर को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दो और मस्जिदें चर्चा में आ गईं. मुरादाबाद की करीब 40 साल पुरानी मुस्तफा मस्जिद को नोटिस दिया गया है जबकि संभल में बाबा बहाउद्दीन शाह मस्जिद की जांच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआइ कर रहा है. मस्जिदों से जुड़े इन मामलों ने ऐसे समय में राजनैतिक तापमान बढ़ाया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने बाकी हैं.

पश्चिमी यूपी की राजनीति में सहारनपुर हमेशा संवेदनशील और निर्णायक जिला माना जाता रहा है. वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिस तरह लगातार सहारनपुर पर फोकस कर रहे हैं, उसने साफ संकेत दे दिया है कि सत्तारूढ़ भाजपा जिले को वेस्ट यूपी की चुनावी रणनीति के केंद्र बिंदु के रूप में देख रही है.

सहारनपुर में सात विधानसभा सीटें हैं और जिला पश्चिमी यूपी के राजनैतिक मानस का प्रवेश द्वार माना जाता है. हरियाणा और उत्तराखंड से सटा यह इलाका सामाजिक समीकरणों की दृष्टि से बेहद जटिल है.

सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत और मेरठ की करीब 26 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है, दलित वोट बैंक भी बेहद प्रभावशाली है. सहारनपुर जिले में हिंदू और मुस्लिम आबादी का अंतर बहुत अधिक नहीं है. यही वजह है कि यहां की राजनैतिक हवा का असर पूरे वेस्ट यूपी पर पड़ता है.

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