
लगभग तीन दशक से टाटा ग्रुप की कुछ सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों के पास एक ऐसी कंपनी के शेयर हैं, जिसके शेयरों का बाजार में कारोबार नहीं किया सकता. अब यह स्थिति खत्म होने जा रही है.
16.2 लाख करोड़ रुपए के टाटा समूह की यह अनलिस्टेड होल्डिंग कंपनी-टाटा संस-17 सितंबर को अपने बोर्ड से प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने को तैयार है. बोर्ड ने यह कदम भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के उस फैसले के बाद उठाया जिसमें केंद्रीय बैंक ने 11 सितंबर को गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के रूप में दर्जा वापस लेने का टाटा संस की अर्जी खारिज कर दी.
लिस्टिंग तो तय है, मगर यह मसला नहीं सुलझ पाया है कि टाटा संस की कमान किसके हाथ में रहेगी. यह मसला इसलिए उठा है कि बोर्ड ने जब टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के विरोध के बावजूद चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के लिए पांच साल के तीसरे कार्यकाल की मंजूरी दी तो वहीं एक नाजुक मोड़ पर नेतृत्व को लेकर नई तकरार की जमीन भी तैयार हो गई.
बैठक के बाद टाटा संस ने मीडिया बयान में कहा, “बोर्ड के अनुरोध पर चंद्रशेखरन अपने फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए तैयार हो गए.” चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त को घोषणा की थी कि वे तीसरा कार्यकाल नहीं चाहेंगे और फरवरी 2027 में मौजूदा कार्यकाल खत्म होने पर पद छोड़ देंगे. उन्होंने यह भी कहा था कि टाटा संस के बोर्ड के एक सदस्य ने उनके बने रहने का विरोध किया था. माना जाता है कि वे नोएल थे.
अलबत्ता, टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के फैसले की वैधता पर सवाल उठाए हैं. एक बयान में उसने कहा कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को मंजूरी वाला प्रस्ताव “कानूनी रूप से अमान्य” था क्योंकि नोएल, और बोर्ड में ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टरों में से एक ने इसके खिलाफ वोट दिया था.
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि दोबारा नियुक्ति के लिए खुद को पेश न करने का चंद्रशेखरन का फैसला पहले ही स्वीकार कर लिया गया था और वह “अंतिम था”. एक अलग बयान में, नोएल ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को “किसी भी शेयरहोल्डर की ओर से गंभीर कानूनी चुनौती” की संभावना की ओर इशारा किया, जिससे भविष्य में संभावित कानूनी लड़ाई की आहट मिलती है.
बैठक में टाटा संस की लिस्टिंग को रोकने की नोएल की कोशिश को बहुमत से खारिज कर दिया गया. एक बयान में उन्होंने कहा कि बोर्ड को लिस्टिंग से बचने के लिए पुनर्गठन जैसे विकल्पों पर विचार करना चाहिए, कानूनी सलाह लेनी चाहिए और बात रखने के लिए आरबीआइ से मौका मांगना चाहिए.
बोर्ड में नोएल और चंद्रशेखरन के अलावा उद्योगपति वेणु श्रीनिवासन, हिंदुस्तान यूनिलीवर के पूर्व चेयरमैन हरीश मनवानी, इन्वेस्टमेंट प्रोफेशनल अनीता एम. जॉर्ज और टाटा समूह के मुख्य वित्तीय अधिकारी सौरभ अग्रवाल शामिल हैं.

सूचीबद्धता के लिए जोर
टाटा संस एक कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआइसी) के रूप में रिजर्व बैंक के एनबीएफसी ढांचे के दायरे में आती है, जो समूह के लिए प्रमुख होल्डिंग और निवेश कंपनी का काम करती है, पूंजी आवंटित करती है.
इसके पास टाटा की कंपनियों के शेयर हैं. इसका दर्जा उच्च स्तर की एनबीएफसी का है, जिसका सूचीबद्ध होना आवश्यक है. मानदंडों के तहत अपर लेयर में वे एनबीएफसी शामिल हैं जिनकी नवीनतम ऑडिटेड बैलेंस शीट में एक लाख करोड़ रुपए या उससे अधिक की संपत्तियां हैं. वित्त वर्ष 2026 में टाटा संस की अपनी एसेट्स 1.75 लाख करोड़ रुपए की थीं.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील एच.पी. रानीना का कहना है कि टाटा संस अपनी एसेट्स के आकार और सूचीबद्ध कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी, दोनों ही कारण से एनबीएफसी के वर्गीकरण में फिट है क्योंकि इन कंपनियों के जरिए उसे सार्वजनिक धन तक परोक्ष पहुंच मिलती है.
वे कहते हैं, “आरबीआइ के दिशानिर्देश सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू होते हैं.” रिजर्व बैंक की मौजूदा अपर लेयर लिस्ट में 17 एनबीएफसी हैं. प्राइवेट कंपनी बने रहने का अपना मामला मजबूत करने के लिए टाटा संस ने 20,300 करोड़ रुपए से अधिक का ऋण चुकाया और कर्जमुक्त हो गई लेकिन आरबीआइ ने सीआइसी पंजीकरण सरेंडर करने का उसका अनुरोध खारिज कर दिया.
टाटा समूह में 17 अनलिस्टेड कंपनियां हैं, जिनमें टाटा संस के अलावा एअर इंडिया, टाटा इंडस्ट्रीज, टाटा एआएए और टाटा प्रोजेक्ट्स प्रमुख हैं. 26 लिस्टेड कंपनियों में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा केमिकल्स और टाटा पावर शामिल हैं.
शेयर बाजार में लिस्टिंग नियमों के तहत टाटा संस को शुरू में अपनी 2.5 फीसद हिस्सेदारी जनता को बेचनी होगी, जिसे बढ़ाकर पांच साल में 15 फीसद और 10 साल के भीतर 25 फीसद करना होगा. टाटा ट्रस्ट्स के पास अभी टाटा संस की 66 फीसद हिस्सेदारी है और इसलिए ग्रुप की दूसरी कंपनियों और टाटा परिवार, इन सबकी मिलाकर 75 फीसद हिस्सेदारी रहेगी.
लेकिन शेयर बाजार में पहुंचने के बाद टाटा संस तिमाही आधार पर निवेशकों की नजर में रहेगी और अहम फैसलों के लिए उसे शेयरधारकों की मंजूरी लेनी होगी. इन फैसलों में बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति, हटाना और उनका वेतन, ऑडिटरों की नियुक्ति, विलय-अधिग्रहण और कंपनियां अलग करने जैसे कॉर्पोरेट पुनर्गठन शामिल हैं.
बताया जाता है कि चंद्रशेखरन कंपनी की सार्वजनिक सूचीबद्धता के हिमायती हैं, जबकि नोएल टाटा ग्रुप की एक सदी पुरानी परोपकारी विरासत बचाए रखने के लिए इस होल्डिंग कंपनी को अनलिस्टेड ही रखना चाहते हैं.
टाटा संस में ज्यादातर हिस्सेदारी टाटा ट्रस्टों की है, जिनका आर्थिक हितों पर नियंत्रण है और बोर्ड की नियुक्तियों और कुछ रणनीतिक मामलों में वीटो का अधिकार है. इनमें सबसे बड़े ट्रस्ट सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट हैं जिनकी हिस्सेदारी क्रमशः 27.98 फीसद और 23.56 फीसद है.
प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्म इनगवर्न के संस्थापक और प्रबंध निदेशक श्रीराम सुब्रह्मण्यन कहते हैं, ‘‘एक बार जब टाटा संस सूचीबद्ध हो जाए तो इन अधिकारों की समीक्षा अल्पमत शेयरधारकों की सुरक्षा, बोर्ड की स्वतंत्रता, संबंधित पक्षों से जुड़े सुरक्षा उपायों और लिस्टिंग नियमों के आधार पर की जानी चाहिए.”

वैल्यू पता चलेगी
एक और बड़ा शेयरहोल्डर शापूरजी पलोनजी (एसपी) समूह है, जिसके पास टाटा संस की 18.4 फीसद हिस्सेदारी है जबकि टाटा मोटर्स और टाटा स्टील समेत नौ टाटा कंपनियों के पास कुल मिलाकर 12.87 फीसद हिस्सेदारी है.
ये नौ कंपनियां अपने कारणों से लिस्टिंग का समर्थन करती हैं. टाटा संस में लगभग तीन दशक से उनका निवेश फंसा हुआ है जो कुछ विश्लेषकों की नजर में डेड कैपिटल यानी निष्क्रिय पूंजी है. टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा केमिकल्स, टाटा पावर, इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और टाटा इन्वेस्टमेंट उन कंपनियों में शामिल थीं जिन्होंने 1995-96 में राइट्स इश्यू के जरिए टाटा संस में हिस्सेदारी खरीदी थी.
उस समय सवाल उठे थे कि लिस्टेड कंपनियों को एक अनलिस्टेड, इलिक्विड पैरेंट कंपनी यानी जिसके शेयर आसानी से न बेचे जा सकें, उसमें क्यों पूंजी डालनी चाहिए. तब के चेयरमैन रतन टाटा ने तर्क दिया था कि जब टाटा संस पब्लिक कंपनी बन जाएगी तो इस निवेश का फायदा मिलेगा लेकिन जिस लिस्टिंग का वादा किया गया, वह तब से टलती आ रही है.
31 मार्च तक टाटा संस के पास 4,04,146 पेड-अप इक्विटी शेयर थे. इन नौ लिस्टेड कंपनियों के पास कुल मिलाकर 52,013 शेयर थे. बाजार पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि अगर टाटा संस की वैल्यूएशन 9 लाख करोड़ रुपए से 14 लाख करोड़ रुपए के बीच मानी जाए तो इन शेयरों की कीमत 1.2 लाख करोड़ रुपए से 1.8 लाख करोड़ रुपए के बीच होगी.
सुब्रह्मण्यन की नजर में एक और अहम फायदा पूंजी तक पहुंच का है. वे कहते हैं, “शेयर बाजार में आने से टाटा संस को जरूरत के अनुरूप पूंजी जुटाने में लचीलापन मिलेगा, जिससे वह अनलिस्टेड कारोबारों के लिए ऋण और इक्विटी जुटा सकेगा.इससे एसपी ग्रुप और टाटा संस में शेयर रखने वाली सात लिस्टेड कंपनियों के लिए भी धन की उपलब्धता बढ़ेगी.”
वे कहते हैं कि लिस्टिंग से टाटा संस में पारदर्शिता आने के साथ टाटा समूह की उन कंपनियों के 1.77 करोड़ शेयरधारकों को भी फायदा होगा जिन कंपनियों के पास टाटा संस के शेयर हैं.

प्रशासन की परीक्षा
सुब्रह्मण्यन का कहना है कि इस कदम से टाटा ट्रस्टों के विशेष अधिकारों की भी ज्यादा बारीकी से जांच हो सकेगी. इससे वे सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू होने वाले गवर्नेंस नियमों के दायरे में आ जाएंगे.
रानिना के मुताबिक, कंपनी को अपना बोर्ड मजबूत करना होगा और नए स्वतंत्र निदेशक नियुक्त करने होंगे ताकि ऑडिट कमेटी में दो-तिहाई सदस्य स्वतंत्र निदेशक हों. संबंधित पक्षों के बीच होने वाले लेन-देन भी गहन जांच के दायरे में आएंगे.
टाटा ग्रुप के मुख्यालय, बॉम्बे हाउस में हालात टकराव की ओर बढ़ रहे हैं. चंद्रशेखरन के चेयरमैन बने रहने पर राजी होने और टाटा संस बोर्ड के पब्लिक लिस्टिंग का समर्थन करने के बाद नोएल की अगुआई वाला टाटा ट्रस्ट्स कानूनी रास्ता अपना सकता है.
टकराव तल्ख हो सकता है और शायद 2016 में टाटा संस चेयरमैन पद से साइरस मिस्त्री को हटाने के बाद हुई कानूनी लड़ाई से भी ज्यादा कटु. ऐसी लड़ाई उस समूह की छवि पर बुरा असर डाल सकती है जो अच्छे प्रशासन और जवाबदेही पर गर्व करता है और यहां तक कि लंबे समय में निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है.

