
कल्पना कीजिए एक ऐसे युद्धक्षेत्र की जो सिर्फ कुछ वर्ग सेंटीमीटर का है लेकिन कागज के इस छोटे-से टुकड़े पर व्यवस्था कायम करना किसी देश को जीतने जितना अहम हो सकता है. बात पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर पोषण की जानकारी की है. ज्यादा चीनी या वसा की साफ चेतावनी करोड़ों भारतीयों के खानपान के फैसले बदल सकती है. मुद्दा मामूली नहीं है.
दुनिया में डायबिटीज, मोटापे और दिल की बीमारियों में भारतीय शीर्ष स्तर पर हैं. यह इस पर निर्भर है कि हम खाने के बारे में समझदारी से चुनाव कर पाते हैं या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने 10 सितंबर को इसे राष्ट्रीय हित' का मामला बताया.
इस अहम केस के एक छोर पर लोगों की सेहत और दूसरे पर 140 अरब डॉलर के पैकेटबंद खाद्य उद्योग की आर्थिक सेहत है. पूरी लड़ाई उस छोटी-सी जगह को लेकर है, जिसे एक अधिकारी ने ''पैकेट के ऊपर की रियल एस्टेट" कहा.
हम खाने से जुड़ी बारीकियों पर अक्सर खूब सोचते हैं—सेहतमंद नाश्ते के सीरियल, स्नैक्स में इस्तेमाल तेल, एनालॉग पनीर, ब्राउन ब्रेड कहीं धोखा तो नहीं और ऑर्गेनिक खाना सचमुच ऑर्गेनिक है या नहीं. ज्यादातर लोग पैकेटबंद खाद्य पदार्थों, दवा की बोतलों और हेल्थ ड्रिंक पर छोटे अक्षरों में लिखी सूचना पढ़कर सचाई समझने में सक्षम नहीं हैं.
खासकर जब सामने अनजाने तकनीकी शब्द हों. जानकारी की हमारी जबरदस्त भूख और नासमझी के बीच धोखे की बड़ी गुंजाइश है. खाद्य उद्योग इसका इस्तेमाल अपने हित में कर सकता है. फिलहाल पूरा ध्यान अदालत के सामने रखे एक प्रस्ताव पर है: खाद्य पैकेट के ऊपर सामने की ओर ‘लाल षट्कोण’ चेतावनी चिह्न.
इसकी कल्पना एक प्रमुख ग्राफिक बॉक्स के रूप में की गई है, जिस पर मोटे और साफ अक्षरों में ‘चीनी अधिक’, ‘नमक अधिक’, ‘वसा अधिक’ या ‘बहुत ज्यादा मीठा पेय’ जैसी चेतावनियां लिखी होंगी.
इस कवायद के केंद्र में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) है. खाद्य निर्माता भ्रामक दावों से लोगों की आंखों में धूल न झोंक सकें, यह उसका काम है. जन स्वास्थ्य संगठन और न्यायपालिका एफएसएसएआइ को मुस्तैद रखे हुए हैं.
हाल के महीनों में एफएसएसएआइ ने विज्ञापनों और लेबल पर झूठे दावों को लेकर कई खाद्य कंपनियों को 150 से ज्यादा नोटिस भेजकर हलचल मचा दी. इनमें नेस्ले, पेप्सिको, कोका-कोला, डाबर और रेड बुल जैसी बड़ी एफएमसीजी कंपनियां शामिल थीं.

अगस्त में बॉर्नविटा और कैडबरी बनाने वाली मॉन्डलीज को भी नोटिस मिला. मामलों की यह संख्या बताती है कि खाद्य लेबल पढ़ते समय शक करना क्यों जरूरी है.
भारत में पैकेट के ऊपर सामने की तरफ लेबल लगाने के नियम लंबे समय से अस्पष्ट रहे हैं. जनता की बढ़ती पड़ताल के बीच अब जाकर उन्हें स्पष्ट किया जा रहा है. गैर-लाभकारी संस्था 3एस ऐंड आवर हेल्थ सोसाइटी ने अपनी जनहित याचिका में भारत के चिंताजनक जन स्वास्थ्य आंकड़ों का हवाला देकर सभी नुक्सानदेह सामग्रियों की स्पष्ट लेबलिंग की मांग की.
अगस्त में अदालत के कड़े दबाव के बाद एफएसएसएआइ ने लाल षट्कोण वाले चेतावनी चिह्न का प्रस्ताव रखा, लेकिन उसे चरणों में और उद्योग के अनुकूल तरीके से लागू करने की बात कही.
अदालत की फटकार के बाद 10 सितंबर को एफएसएसएआइ झुका और ज्यादा सख्त समयसीमा पर मौखिक सहमति दी. एक बहस इस पर है कि चेतावनी के लिए ‘एक पोषक तत्व’ या ‘दो पोषक तत्व’ तय सीमा से ज्यादा होना चाहिए.
कार्यकर्ता दूसरे प्रस्ताव को खारिज करते हैं. उनका कहना है कि किसी उत्पाद में सिर्फ चीनी या नमक बेहद ज्यादा हो और बाकी सामग्री मानकों के भीतर हो तो वह चेतावनी से बच सकता है. खाद्य उद्योग पूरे ढांचे को ‘अवैज्ञानिक’ बता रहा है.
उसकी मांग है कि किसी उत्पाद को खतरनाक घोषित करने से पहले प्रयोगशाला जांच समेत उचित दिशानिर्देश बनाए जाएं. अदालत मजबूत नियामक निगरानी के पक्ष में है, लेकिन उसका जोर है कि इसका आधार डर नहीं, विज्ञान हो.
खाद्य लेबलिंग से जुड़ी एक और समस्या में विज्ञान ही उलझन पैदा करता है. ठीक-ठीक कहें तो पैकेट पर ‘सामग्री’ वाले खाने में दर्ज कठिन वैज्ञानिक शब्दावली उद्योग की कानूनी जिम्मेदारी पूरी करती है लेकिन सामग्री के खतरे छिपा देती है. उपभोक्ता को इससे कुछ समझ नहीं आता.
चीनी, मैदा और ट्रांस फैट के खतरे तो भारतीय समझने लगे होंगे लेकिन ‘हाइ-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप’, ‘माल्टोडेक्सट्रिन’ या ‘सुक्रालोज’ जैसे शब्द उन्हें शायद ही सचेत करें. ‘कार्बोक्सीमिथाइलसेल्युलोज’ और ‘पॉलीसॉर्बेट-80’ जैसे लंबे नामों की तो बात ही छोड़िए. ये सभी मेटाबोलिज्म को नुक्सान पहुंचा सकते हैं पर रासायनिक नाम खतरा छिपा देते हैं. डॉक्टर इसे ‘लेबल समझने की कमी’ कहते हैं. उपभोक्ता के रूप में हम इसे घटिया चाल कह सकते हैं.
मुंबई में खाने से जुड़ी एक अलग कहानी सामने आ रही है. एक आइएएस अधिकारी ने कड़क कोतवाल की भूमिका निभाकर ‘लोकप्रिय संस्कृति के नायक’ का दर्जा पा लिया है. तुकाराम मुंढे भारत में समय-समय पर उभरने वाले उस अफसर की मिसाल हैं जो अभियान चलाता है और किसी के आगे नहीं झुकता. वे बड़े नामों पर भी सख्ती से कार्रवाई कर रहे हैं.
डोमिनोज और पिज्जा हट के आउटलेट, ब्लिंकिट और रिलायंस रिटेल के गोदाम तथा इस्कॉन जुहू के भोजनालयों पर छापे पड़े और उन्हें बंद कराया गया. खाद्य क्षेत्र को निगरानी की जरूरत है पर यह तर्कसंगत, एक समान और सबूतों पर आधारित होनी चाहिए न कि मनमानी कार्रवाई में बदलनी चाहिए.
इस हफ्ते की हमारी कवर स्टोरी इन तीनों पहलुओं को एक साथ रखती हैः सुप्रीम कोर्ट में लेबलिंग की लड़ाई, सामग्री की सूची में खतरे छिपाने वाली शब्दावली और मुंबई में कार्रवाई की कहानी. जागरूक उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है. बीमारियों के बड़े खतरे वाले हमारे देश में यह जागरूकता जन स्वास्थ्य की जरूरी मांग है.

