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डार्क मोड

मातृत्व का पूरा बाजारी तामझाम

गर्भावस्था अब पहले से कहीं ज्यादा संस्थागत और निगरानी व्यवस्था में. गैरजरूरी ढंग से सीजेरियन की सलाह और मनमाने टेस्ट करवाए जा रहे. इसमें अस्पताल के संसाधन खप रहे. संपन्न और बेचैन-बेताब तबका लग्जरी मैटरनिटी सेवाओं पर खुलकर खर्च कर रहा

Health | childbirth
Health | childbirth
अपडेटेड 13 सितंबर , 2026

दिल्ली के एक निजी अस्पताल के ओपीडी में आठ महीने की गर्भवती एक युवा महिला (पहचान गोपनीय) रोते-रोते अपनी गायनेकोलॉजिस्ट से सीजेरियन सेक्शन (सी-सेक्शन या ऑपरेशन) करने की गुहार लगा रही है. वैसे कोई मेडिकल इमरजेंसी बिल्कुल नहीं, न ही बच्चा अभी जन्म के लिए तैयार है. पर वह बस चाहती है कि उसके बच्चे का जन्मदिन उसके दिवंगत पिता के जन्मदिन के साथ आए. विशेषज्ञ बताएंगे कि ऐसी मांगें अब असामान्य नहीं रहीं.

शहरों के कई दंपती अब पूरा एक बर्थ प्लान लेकर अपने डॉक्टर के पास आते हैं, सामान्य रिपोर्ट के बावजूद अतिरिक्त स्कैन कराने को कहते हैं, गैर-जरूरी जेनेटिक टेस्ट, मनचाहे समय पर प्रसव शुरू कराने और शुभ तारीखों, पारिवारिक आयोजनों या कामकाजी शेड्यूल के हिसाब से योजनाबद्ध सीजेरियन की मांग करते हैं.

चेन्नै के कावेरी अस्पताल में रिप्रोडक्टिव मेडिसिन के निदेशक डॉ. पी.एम. गोपीनाथ कहते हैं, “शहरी माता-पिता के पास इंस्टाग्राम, यूट्यूब, पैरेंटिंग ऐप्स और हर तरफ से उल्टी-सीधी सलाह मिलती रहती है. उनका दिमाग 24 घंटे इसी के जोखिम की थाह लेने में लगा रहता है.”

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-6) के 2023-24 में किए गए और मई 2026 में रिलीज छठे दौर के निष्कर्षों के मुताबिक, गर्भावस्था को पहले से कहीं ज्यादा गहराई से मैनेज किया जा रहा है. भारत में कुल जन्म लेने वालों में से 90.6 फीसद अब स्वास्थ्य संस्थानों में जन्मते हैं. यह अच्छी खबर है पर दूसरी बात उतनी उत्साहजनक नहीं कि अब 27.2 फीसद जन्म ऑपरेशन से होते हैं. शहरी भारत में यह आंकड़ा कहीं ज्यादा 40.5 फीसद है. और निजी अस्पतालों में तो यह 54.1 फीसद तक पहुंच जाता है.

यह विश्व स्वास्थ्य संगठन की उस अनुशंसित दर से खासी ऊपर है, जिसके मुताबिक किसी आबादी में 10-15 फीसद जन्म सी-सेक्शन से होने चाहिए; इस सीमा से ऊपर जच्चा या बच्चा के जीवित रहने की दर में सुधार साबित नहीं हुआ है. डब्लूएचओ अरसे से मानता रहा है कि इस सीमा से आगे की दरों को अनिवार्य मेडिकल जरूरत के रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता.

इस बढ़ते मेडिकलाइजेशन का एक संकेत देश में प्रीमियम मैटरनिटी केयर का उभार है, जिसने प्रसव को शहरी संपन्न परिवारों के लिए बेहद क्यूरेटेड अनुभव में बदल दिया है. अस्पताल अब ऐसे प्रेग्नेंसी पैकेज बेचते हैं, जो मेडिकल केयर के साथ होटल जैसी सुविधाएं मुहैया करते हैं.

दिल्ली के अपोलो क्रेडल रॉयाल में माताएं व्यक्तिगत पैकेज चुन सकती हैं, जिनमें लग्जरी लेबर-डिलिवरी-रिकवरी सुइट्स, मल्टी-क्यूजीन भोजन, एंटेनैटल क्लासेज और लैक्टेशन कंसल्टेशन शामिल हैं.

क्लाउडनाइन हॉस्पिटल्स समेत दूसरे प्रीमियम प्रोवाइडर अपार्टमेंट-स्टाइल सुइट्स, डायटिशियन, फिजियोथेरेपिस्ट और कंसीयर्ज-स्टाइल मैटरनिटी पैकेज देते हैं, जिनकी कीमत 1.5 लाख रुपए से लेकर पांच लाख रुपए से ज्यादा तक हो सकती है.

टेस्ट से ही हलकान

डॉक्टरों को मैटरनिटी केयर को ज्यादा आरामदेह बनाने में कोई हर्ज नहीं दिखता. बेहतर सुविधाएं प्रसव के अनुभव को बेहतर बना सकती हैं. चिंता शुरू होती है, जब यह शुद्ध रूप से मेडिकल जरूरत से तय होने वाले फैसलों को प्रभावित करने लगती है. मसलन, सी-सेक्शन मेडिकल जरूरत होने पर जीवन बचाने वाला ऑपरेशन है, लेकिन है तो यह अब भी पेट की बड़ी सर्जरी.

सामान्य प्रसव की तुलना में इसमें संक्रमण, खून की कमी, खून के थक्के, लंबी रिकवरी और भविष्य की प्रेग्नेंसी में जटिलताओं का जोखिम ज्यादा होता है. इनमें प्लेसेंटा एक्रीटा भी शामिल है, एक ऐसी स्थिति जिसमें प्लेसेंटा गर्भाशय की दीवार से चिपक जाता है और डिलिवरी के बाद अलग नहीं हो पाता. इससे जानलेवा रक्तस्राव का खतरा बढ़ जाता है. शोधकर्ता बच्चों पर इसके संभावित लंबे असर का भी अध्ययन कर रहे हैं.

जर्नल ऑफ द फॉर्मोसन मेडिकल एसोसिएशन में छपी 2024 की आबादी-आधारित कोहोर्ट स्टडी में पाया गया कि सी-सेक्शन से जन्मे बच्चों में सामान्य प्रसव से जन्मे बच्चों की तुलना में श्वसन तंत्र संक्रमण, अस्थमा, एलर्जिक राइनाइटिस, एटोपिक डर्मेटाइटिस और बचपन के मोटापे का जोखिम ज्यादा था, हालांकि लेखकों ने जोर दिया कि ये संबंध हैं, कारण और असर का प्रमाण नहीं.

डॉ. शर्मा कहती हैं, “हम ज्यादा उम्र में गर्भधारण, गर्भकालीन डायबिटीज और हाइ ब्लड प्रेशर की ज्यादा दर, और असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीकों से हुई गर्भावस्थाएं ज्यादा देख ‌रहे हैं. ऐसी स्थितियां अक्सर सीजेरियन डिलिवरी को ज्यादा सुरक्षित विकल्प बना देती हैं.” फिर भी वे आगाह करती हैं, “सीजेरियन फैसला हमेशा क्लिनिकल संकेतों और मरीज की जरूरतों से तय होना चाहिए, केवल सुविधा या पसंद से नहीं.”

कैसे दूर हो ‌चिंता?

बदकिस्मती से फैसले अक्सर सुविधा के आधार पर ही किए जाते हैं. दिल्ली की 34 वर्षीया पेशेवर समीरा बत्रा ने पहले बच्चे के लिए पहले से तय सीजेरियन डिलिवरी कराई. उन्होंने लेबर के बारे में कभी सोचा ही नहीं क्योंकि उन्हें दर्द से बहुत डर लगता था.

प्रसव का डर दुनिया भर में महिलाओं की ओर से वैकल्पिक सीजेरियन मांगने की एक अहम वजह के रूप में पाया जा रहा है. 2021 में बीएमसी प्रेग्नेंसी ऐंड चाइल्डबर्थ में छपे एक सिस्टमैटिक रिव्यू ने भी इसकी पुष्टि की. 2022 में जर्नल ऑफ अफेक्टिव डिसऑर्डर्स में छपे एक और रिव्यू में गर्भावस्था से जुड़ी चिंता और प्रसव के दौरान मेडिकल दखल की ऊंची दरों के बीच संबंध पाया गया. इस दखल में ऑपरेटिव डिलिवरी भी शामिल है.

भरोसा पाने की यही चाह गर्भावस्था की निगरानी के तरीके को भी बदल रही है. प्रसूति विशेषज्ञ कहते हैं कि अब कई कम जोखिम वाली महिलाएं सामान्य गर्भावस्था के बावजूद बार-बार ग्रोथ स्कैन, कई डॉप्लर अल्ट्रासाउंड और बिना जरूरत वाले टेस्ट चाहती हैं. अल्ट्रासाउंड मेडिकल जरूरत होने पर सुरक्षित है लेकिन विशेषज्ञ सावधान करते हैं कि गैर-जरूरी स्कैनिंग चिंता घटाने के बजाए बढ़ा सकती है.

 

गोपीनाथ कहते हैं, “बात सिर्फ यह नहीं कि माता-पिता ज्यादा सोच रहे हैं, वे जानकारी के बोझ से जूझ रहे हैं. आज शहरी पालन-पोषण में नींद, दूध पिलाने और विकास के पड़ावों को लगातार मॉनिटर करने का दबाव है, जबकि पैरेंटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया परिवारों को विरोधाभासी सलाह से लाद देते हैं.”

डॉक्टरों का कहना है कि हर अतिरिक्त स्कैन बॉर्डरलाइन वाले ऐसे निष्कर्ष सामने ला सकता है, जो बिना नतीजे बेहतर किए और टेस्ट, परामर्श तथा गैर-जरूरी तनाव को जन्म देते हैं. “अगर आप किसी शहर में परिवार के सहारे के बिना बच्चा पाल रहे हैं, तो आप रात तीन बजे रोते बच्चे और गूगल, दोनों से एक साथ जूझ रहे होते हैं. आपको यह बताने वाला कोई नहीं होता कि क्या सामान्य है. हर बार दूध उगलना और हर 15 से 45 मिनट की झपकी ऐसी चीज लगने लगते हैं, जिस पर रिसर्च करनी चाहिए. जानकारी का बोझ माता-पिता के साथ यही करता है.”

अब प्रोफेशनल मेडिकल देखभाल शायद आधुनिक मातृत्व की सबसे बड़ी खामी नहीं रही. लेकिन माता-पिता को सही शिक्षा देने, मेडिकल सलाह पर भरोसा कायम करने और ऐसा इकोसिस्टम तैयार करने के मामले में अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, जो फिक्र बढ़ाए बिना गर्भावस्था में मदद का हाथ बढ़ाए. डॉक्टरों का मानना है कि माता-पिता के पास पर्याप्त जानकारी होना अच्छी बात है. दिक्कत होती है जब सुविधाओं के लिए डॉक्टरी जरूरतों से समझौता होता है.

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