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डार्क मोड

त्योहार में चीनी कड़वी

त्योहारों के चलते चीनी की चढ़ती कीमतों को देखते हुए भारत सरकार एक दशक में पहली बार चीनी आयात कर रही. इस बीच बफर स्टॉक, एथेनॉल के वास्ते इस्तेमाल और संभावित जमाखोरी पर उठने लगे सवाल

special Report sugar prices

अगस्त के दूसरे हफ्ते में केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रल्हाद जोशी ने खाद्य विभाग के अधिकारियों के साथ भारत के चीनी भंडार की समीक्षा की. खबर अच्छी नहीं थी. वर्ष 2025-26 के चीनी सीजन (अक्तूबर-सितंबर) में उत्पादन 306 लाख टन रहने का अनुमान था, जो सरकार के 343 लाख टन के अनुमान से 11 फीसद कम था. वहीं, खुदरा कीमतें 50 रु. प्रति किलो तक पहुंच गई थीं.

1 अगस्त से लागू सीमा के तहत डीलर सिर्फ 400 टन चीनी रख सकते थे. मंत्रालय ने 19 अगस्त को थोक उपभोक्ताओं के लिए नई सीमा तय की, जो 1 सितंबर से लागू हुई.  इसके तहत कन्फेक्शनरी, शीतल पेय और खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियां तथा मिठाई विक्रेता सिर्फ 15 दिन की खपत के बराबर चीनी रख सकते थे.

केंद्र ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की मंजूरी दी. करीब एक दशक में यह पहली आयात रियायत थी तब तक चीनी की कीमतों में दो महीने से भारी उठा-पटक चल रही थी.

मुंबई में खुदरा भाव 21 जुलाई के 50 रु. प्रति किलो से बढ़कर 22 अगस्त को 68 रु. के शिखर पर पहुंच गया. फिर 1 सितंबर को घटकर 61 रु. रह गया. भारत के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में गणेश चतुर्थी से दो हफ्ते पहले ही थोक भाव बढ़ रहे थे. 1 सितंबर को कानपुर की मंडियों में चीनी का भाव 5,850 रु. प्रति क्विंटल था, जो तीन महीने पहले से करीब 35 फीसद ज्यादा था.

भारत एक सीजन से भी कम समय में चीनी निर्यात की योजना बनाने से आयात की तैयारी तक पहुंच गया. ऐसा कैसे हुआ? जवाब चीनी की ऐसी अर्थव्यवस्था में छिपा है, जहां हर कीमत और मात्रा पर सरकार का असर है, लेकिन पूरी व्यवस्था पर किसी एक संस्था का नियंत्रण नहीं है.

महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की देश के गन्ना उत्पादन में अस्सी फीसद से ज्यादा हिस्सेदारी है. यह उद्योग कुछ क्षेत्रीय समूहों में केंद्रित है—पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तराई, पश्चिमी और दक्षिणी महाराष्ट्र तथा उत्तरी कर्नाटक. इसकी वजह फसल की प्रकृति है.

कटाई के बाद गन्ने में सुक्रोज घटने लगता है, इसलिए वह दूर के खरीदार का इंतजार नहीं कर सकता. मिल का किसानों के पास होना जरूरी है. किसान आम तौर पर आरक्षित या तय आपूर्ति क्षेत्र, गन्ना समिति या आपूर्ति कैलेंडर के जरिए किसी मिल से जुड़े होते हैं.

भारत में 530 चीनी मिलें चल रही हैं, जिनमें निजी और सहकारी क्षेत्र की मिलें शामिल हैं. उत्तर प्रदेश में निजी मिलों का दबदबा है. महाराष्ट्र की सहकारी मिलें लंबे समय से राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राजनीति के केंद्र में रही हैं.

केंद्र उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) तय करता है, जो मिलों को किसानों को देना होता है. वर्ष 2025-26 के सीजन में 10.25 फीसद की मूल रिकवरी दर पर यह 355 रु. प्रति क्विंटल था. रिकवरी दर बताती है कि गन्ने से कितनी चीनी निकलती है. उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्य इससे अधिक स्टेट एडवाइज्ड प्राइस (एसएपी) तय करते हैं. इसके बाद केंद्र चीनी का न्यूनतम मिल बिक्री मूल्य तय करता है, जो फिलहाल 31 रु. प्रति किलो है.

वैसे, इससे ऊपर थोक और खुदरा मूल्य बाजार तय करता है. केंद्र यह भी नियंत्रित करता है कि मिलें हर महीने घरेलू बाजार में कितनी चीनी बेच सकती हैं और देश चीनी का निर्यात कर सकता है या नहीं और कितना.

मूल खींचतान

नई चीनी मिल एथेनॉल, शीरा, खोई से बनी बिजली और बचे हुए प्रेसमड से भी कमाई करती है. एथेनॉल अहम हो गया है क्योंकि सरकारी तेल कंपनियां कच्चे माल से जुड़ी कीमतों पर बड़ा और अपेक्षाकृत तय बाजार देती हैं. मिलें अधिकतम दानेदार चीनी निकालकर बचने वाले सी-हेवी शीरे से एथेनॉल बना सकती हैं.

सी-हेवी शीरा चीनी निकालने के तीसरे चरण के बाद बचा अंतिम उत्पाद है. वे चीनी बनने की प्रक्रिया पहले रोककर दूसरे चरण में मिलने वाले बी-हेवी शीरे का इस्तेमाल कर सकती हैं या सीधे गन्ने के रस अथवा सिरप से एथेनॉल बना सकती हैं. चीनी की अनुमानित उपलब्धता के आधार पर केंद्र इस इस्तेमाल को नियंत्रित कर सकता है.

यही उद्योग की मूल खींचतान है. गन्ने की कीमत राजनैतिक आधार पर तय होती है और समय-समय पर बढ़ती है, जबकि मिल का मुख्य उत्पाद आंशिक रूप से नियंत्रित बाजार में बिकता है. चीनी के भाव गिरें तो मिलों को किसानों का भुगतान करने में मुश्किल होती है और बकाया बढ़ता है.

भाव तेजी से बढ़ें तो उपभोक्ताओं पर खाद्य महंगाई का बोझ पड़ता है. एथेनॉल और निर्यात का इस्तेमाल अतिरिक्त चीनी खपाने के लिए होता है, जबकि कमी पूरी करने के लिए आयात और घरेलू बाजार में ज्यादा चीनी जारी की जाती है. यह व्यवस्था तभी काम करती है जब उत्पादन और स्टॉक का सही अनुमान लगे और समय पर नीति बदले.

नवंबर 2025 में समस्या अधिक उत्पादन की लग रही थी. भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा उत्पादक संघ (इस्मा) ने एथेनॉल के लिए 34 लाख टन चीनी के बराबर इस्तेमाल को घटाने के बाद शुद्ध उत्पादन का शुरुआती अनुमान 309 लाख टन लगाया था.

इस हिसाब में निर्यात और सीजन के अंत में पर्याप्त स्टॉक की गुंजाइश दिख रही थी. इसी आकलन पर केंद्र ने 2025-26 में 15 लाख टन निर्यात की मंजूरी दी और बाद में 5 लाख टन अतिरिक्त निर्यात की इच्छा जताई. लेकिन फसल की स्थिति बदल गई. 2025 के आखिर में महाराष्ट्र और कर्नाटक में भारी बारिश से खेतों में पानी भर गया, कटाई में देरी हुई और पेड़ी गन्ने को नुक्सान पहुंचा. पेड़ी कटाई के बाद बचे ठूंठ से निकलने वाली नई फसल है.

उत्तर प्रदेश में लाल सड़न रोग ने फसल को नुक्सान पहुंचाया. अगस्त तक सरकार ने उत्पादन अनुमान 343 लाख टन से घटाकर 306 लाख टन कर दिया था.

फैसलों में देरी

इसके बावजूद नीति चरणों में बदली. निर्यात मई में जाकर रोका गया. तब तक छह लाख टन चीनी भारतीय बंदरगाहों से बाहर जा चुकी थी. निर्यात कोटा ऐसे हिसाब के आधार पर दिया गया था, जो अब सही नहीं रह गया था. बदलते आंकड़ों के बीच एथेनॉल विवाद का नया मुद्दा बन गया.

विपक्ष कीमत बढ़ने के लिए एथेनॉल में गन्ने के इस्तेमाल को जिम्मेदार ठहराता है. उत्तर प्रदेश के कुछ व्यापारियों का दावा है कि इतनी मात्रा में गन्ना एथेनॉल बनाने में लगा, जिससे 2०-30 लाख टन चीनी बन सकती थी. कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी भी कीमत वृद्धि की वजहों में एथेनॉल को ज्यादा अहम मानते हैं, हालांकि वे कम उत्पादन और घटते स्टॉक की ओर भी इशारा करते हैं.

नीति आयोग के पूर्व सदस्य और आइसीआरआइईआर के प्रोफेसर रमेश चंद कहते हैं कि एथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाले गन्ने की हिस्सेदारी असल में 2022-23 के 11.5 फीसद और 2024-25 के 11 फीसद से घटकर 2025-26 में 9 फीसद रह गई.

एक अहम बदलाव पर उसके अनुपात में ध्यान नहीं गया है—भारत का तीन-चौथाई एथेनॉल अब अनाज, खासकर मक्के से बनता है. इस तरह एथेनॉल ने बिना ज्यादा बाधा पैदा किए चीनी अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बना ली थी. असली समस्या ऐसी तेज और सक्षम व्यवस्था का अभाव था, जो निर्यात, एथेनॉल में इस्तेमाल, घरेलू बाजार में बिक्री और आयात की जरूरी मात्रा का वास्तविक समय में हिसाब लगा सके.

नियमित संशोधन जरूरी

इस तरह चीनी की कीमतों में उछाल की वजह पूरी तरह शुरुआती अनुमान पर भरोसा करना था. हिसाब बिगड़ते ही सट्टेबाजी के लिए स्टॉक जमा करने का मौका बन गया. केंद्र के आपात कदमों से आखिरकार जमा स्टॉक बाजार में आया और कीमतें घटने लगीं. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि 1० लाख टन शुल्क-मुक्त आयात का फैसला पहले लिया जा सकता था. इसमें बाद की समझ नहीं, दूरदर्शिता की जरूरत थी.

स्टॉक की सही जानकारी न होने से स्थिति और बिगड़ी. मिलें स्टॉक की जानकारी देती हैं और केंद्र हर महीने बाजार में जारी होने वाली मात्रा नियंत्रित करता है. लेकिन देर से या गलत जानकारी मिलने पर दोनों काम प्रभावित होते हैं. समय भी अहम था.

निर्यात की अनुमति तब दी गई जब भंडार पर्याप्त दिख रहा था और काफी चीनी बाहर जाने के बाद ही निर्यात रोका गया. आयात की मंजूरी घरेलू कीमतें चढ़ने के बाद दी गई जबकि कच्ची चीनी को विदेश से लाने और रिफाइन करने में समय लगता है.

दूसरी बड़ी समस्या लंबे समय से चला आ रहा कीमतों का अंतर है. गन्ने का एफआरपी और राज्यों के तय भाव बढ़ते रहे, लेकिन चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य फरवरी 2019 से 31 रु. प्रति किलो पर अटका है.

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अपनी गलतियों से सीखना चाहिए. सीजन के शुरू में उत्पादन का अनुमान लगाया जाए और फिर तय तारीखों पर इसमें संशोधन हो, जैसे-जैसे खेती का रकबा, मौसम, बीमारी, पेराई और रिकवरी के आंकड़े स्पष्ट हों.

हर संशोधन में स्टॉक, अनुमानित उत्पादन, खपत, एथेनॉल के लिए इस्तेमाल, देश में बिक्री, निर्यात या आयात और अंतिम बफर स्टॉक का दोबारा हिसाब लगाया जाना चाहिए. कुछ विशेषज्ञ स्टॉक की जानकारी को पारदर्शी और नियमों के तहत लागू करने योग्य बनाने पर जोर देते हैं. मिलों, बड़े डीलरों और संस्थागत उपभोक्ताओं को एक साझा प्रणाली में वास्तविक स्टॉक घोषित करना चाहिए.

जोखिम के आधार पर जांच हो और गलत जानकारी पर उचित जुर्माना लगे. इसका मकसद लगातार छापे या डर पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसा भरोसेमंद बाजार बनाना है, जिसमें स्टॉक छिपाने से किसी को फायदा न हो. इसके बाद एथेनॉल के लिए इस्तेमाल का फैसला भी इसी हिसाब के आधार पर होना चाहिए.

खाद्य और पेट्रोलियम मंत्रालयों, तेल विपणन कंपनियों, मिलों, सहकारी प्रतिनिधियों और किसान संगठनों को सीजन की शुरुआत में गन्ने और उसके बराबर चीनी के संभावित बंटवारे पर सहमत होना चाहिए. हर तय समीक्षा में इसे फिर देखा जाना चाहिए. सबसे अहम है कि खुदरा कीमतों से घबराहट का संकेत मिलने से काफी पहले कार्रवाई हो.

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