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प्रधानमंत्री मोदी की रेटिंग में गिरावट से भी कांग्रेस और विपक्ष को कोई फायदा नहीं हुआ. सिंहासन का सत्ता विरोधी स्थान अब और भी ज्यादा खुला नजर आ रहा

नीट पेपर लीक मुद्दे पर 23 जुलाई को संसद भवन में प्रदर्शन करते विपक्षी नेता
अपडेटेड 8 सितंबर , 2026

भारत में विपक्ष के लिए आज उससे कहीं ज्यादा राजनैतिक गुंजाइश है जितनी छह महीने पहले थी. यह बात अलबत्ता साफ नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रेटिंग में गिरावट का फायदा किसे मिलेगा. इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे के अगस्त 2026 के संस्करण में पसंदीदा प्रधानमंत्री के सवाल पर मोदी के आंकड़ों ने करीब छह अंकों का गोता लगाया है.

जनवरी के 54.7 फीसद से घटकर वे 48.7 फीसद पर आ गए हैं. मगर विपक्ष के नेता राहुल गांधी 26.6 फीसद से 27.1 फीसद पर आकर बमुश्किल ही आगे बढ़े हैं. दोनों के बीच फासला जरूर कम हुआ है, लेकिन मोटे तौर पर मोदी के समर्थन गंवाने की वजह से ऐसा हुआ है. कांग्रेस के लिए देश का मिजाज सर्वे का यह निष्कर्ष बेचैनी का सबब है.

फिर भी राहुल विपक्ष के सबसे ज्यादा स्वीकार्य राष्ट्रीय चेहरा बने हुए हैं. यह पूछे जाने पर कि विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व किसको करना चाहिए, 29 फीसद ने उन्हें चुना. जनवरी (28.6 फीसद) में भी आंकड़ा इसी के आसपास था.

मगर देखिए, दूसरे नंबर पर कौन आया? कॉलीवुड के सुपरस्टार और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय, जिन्होंने पिछला कोई ट्रैक रिकॉर्ड न होने के बावजूद 12.2 फीसद से शुरुआत की है, और तृणमूल की ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल (आम आदमी पार्टी) और अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी) सरीखे दिग्गजों से काफी आगे हैं. प्रधानमंत्री के सवाल पर भी विजय को 9.2 फीसद मत मिले, जो विपक्ष के नेताओं में राहुल के बाद दूसरे हैं.

यह विजय के राजनीति में आने पर उत्सुकता भर नहीं. नया चेहरा उन नेताओं के मुकाबले ज्यादा स्वीकृति बटोर रहा है जिन्होंने पार्टियां, सरकारें और राष्ट्रीय पहचान बनाने में बरसों लगा दिए. इसे चुनावी ताकत में बदला जा सकने वाला आकर्षण मान लेना जल्दबाजी होगी, पर यह विपक्ष के नए चेहरे की चाहत की तरफ जरूर इशारा करता है.

ममता और केजरीवाल के साथ इसका फर्क चौंकाने वाला है, खासकर इसलिए कि राजनीतिक और चुनावी झटकों से उनकी राष्ट्रीय अहमियत में खासी कमी आई है. फरवरी 2024 में ममता को विपक्षी गठबंधन के सर्वश्रेष्ठ चेहरे के तौर पर 16.5 फीसद का समर्थन मिला था, जबकि 17.4 फीसद केजरीवाल के पक्ष में थे.

वे अब घटकर क्रमशः 8.5 फीसद और 7.5 फीसद पर आ गए हैं. फिर भी उनके पतन से राहुल के समर्थन में इसके अनुरूप उछाल नहीं आया. विपक्ष की जगह अभी भी बंटी हुई है, जहां किसी एक का दबदबा नहीं.

राहुल के निजी कामकाज और प्रदर्शन के बारे में आंकड़े उनके नेतृत्व को पसंद करने के आंकड़ों से बेहतर हैं. लोकसभा में नेता विपक्ष के तौर पर अब 48.2 फीसद उन्हें असाधारण या अच्छा आंकते हैं, जो जनवरी के 44 फीसद से ज्यादा है, जबकि खराब/बहुत खराब की कुल रेटिंग 30.6 फीसद से घटकर 27 फीसद पर आ गई है. मतदाता कोशिशों पर ध्यान दे रहे हैं.

बात बस इतनी है कि वे बड़ी तादाद में ‘राहुल अच्छा काम कर रहे हैं’ से ‘राहुल को प्रधानमंत्री होना चाहिए’ की तरफ अगली बड़ी छलांग नहीं लगा रहे. अलबत्ता कांग्रेस के भीतर ज्यादा स्पष्टता है. राहुल की स्थिति मजबूत हुई है क्योंकि जनवरी के 35.6 से ज्यादा 40.5 फीसद का कहना है कि पार्टी की अगुआई के लिए वही सबसे उपयुक्त हैं. प्रियंका गांधी 7.3, सचिन पायलट सात, शशि थरूर 3.2, और मल्लिकार्जुन खड़गे 1.9 फीसद पर हैं.

मिलाजुला रिपोर्ट कार्ड
पार्टी का रिपोर्ट कार्ड ज्यादा मिलाजुला है. विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस के कामकाज को 40.6 फीसद असाधारण या अच्छा आंकते हैं, जिसमें जनवरी के 41 फीसद से कोई खास बदलाव नहीं है.

पार्टी के कामकाज को खराब/बहुत खराब आंकने वाले 33.1 से घटकर 31.6 फीसद पर आ गए हैं. बहुमत 56.6 फीसद का कहना है कि कांग्रेस ही ‘असल विपक्षी दल’ है, जो जनवरी के 55.2 फीसद से कुछ ही ज्यादा है पर अगस्त 2025 के 66.4 फीसद से काफी कम.

इंडिया गठबंधन के सवाल पर यह विसंगति और बढ़ जाती है. कुल 58 फीसद अब भी कांग्रेस को साफ तौर पर या कुछ हद तक गठबंधन की कमजोर कड़ी मानते हैं.

लेकिन ये जनवरी के 62.3 फीसद से बेहतर हैं, जबकि इस बात को खारिज कर देने वाले 29.3 से बढ़कर 32.9 फीसद हो गए हैं. कांग्रेस खोई जमीन हासिल कर रही है पर बहुत-से मतदाता दोहरी राय में फंसे लगते हैं—सच्ची राष्ट्रीय मौजूदगी रखने वाली यह अकेली पार्टी, फिर भी गठबंधन को आगे ले जाने के लिहाज से यह अब भी शायद कमजोर है.

फिर जेन ज़ी है. यह वह मतदाता वर्ग है, जिसका राहुल छात्रों की गूंज, ‘मुझसे कुछ भी पूछो’ सत्रों और सीधी पहुंच के दूसरे कार्यक्रमों के जरिए पीछा कर रहे हैं. सर्वे के नतीजों से पता चलता है कि युवा मतदाता उन्हें दूसरे नेताओं के मुकाबले बहुत अलग ढंग से नहीं देखते.

जेन ज़ी के बीच 49.7 फीसद लोकसभा में उनके कामकाज को असाधारण या अच्छा आंकते हैं, जबकि सभी उत्तरदाताओं के 48.2 फीसद ऐसा आंकते हैं. कांग्रेस के कामकाज पर सकारात्मक रेटिंग 42.3 फीसद है, तो कुल उत्तरदाताओं में यह आंकड़ा 40.6 फीसद. ये काम की बातें हैं लेकिन राहुल के पक्ष में युवा लहर का प्रमाण कतई नहीं.

प्रधानमंत्री पद के लिए पसंद के सवाल पर भी यही कहानी सामने आती है. राहुल 27.4 फीसद पर हैं, जो कुल उत्तरदाताओं में उन्हें मिले 27.1 फीसद के वस्तुतः बराबर हैं. विपक्ष का नेतृत्व करने के मामले में भी यही बारीकी दिखाई देती है.

जेन ज़ी के बीच राहुल को 27 फीसद मत मिले, जबकि कुल उत्तरदाताओं के 29 फीसद ने उन्हें चुना. विजय 12.2 से बढ़कर 12.7 पर पहुंच गए, जबकि अखिलेश 7.4 से घटकर 6.9 फीसद पर आ गए. जब सवाल सिमटकर इस बात पर आ जाता है कि कांग्रेस की अगुआई किसे करनी चाहिए, तो जेन ज़ी के बीच 43.8 फीसद के साथ राहुल कुल 40.5 फीसद के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हैं.

जेन ज़ी कांग्रेस के प्रति कुछ कम कठोर भी है. कुल 58 फीसद के मुकाबले जेन ज़ी के 54.7 फीसद उसे इंडिया गठबंधन की कमजोर कड़ी कहते हैं पर फिर मात्र 53.7 फीसद का ही कहना है कि कांग्रेस असल विपक्षी पार्टी है, जो कुल 56.6 फीसद से कम है, जबकि ज्यादा युवा उत्तरदाताओं ने अभी अपना मन नहीं बनाया है.

बड़ी कहानी यह है: सत्ता विरोधी जगह का खुलना अपने आप विपक्ष के समर्थन में नहीं बदलता. राहुल कामकाज और प्रदर्शन की रेटिंग में सुधार लाए हैं लेकिन मोदी की लोकप्रियता में आई गिरावट से पैदा जगह पर अब भी कब्जा नहीं कर पाए हैं. स्थापित विपक्षी नेता धूल-धूसरित हुए हैं. विपक्ष की जगह पर दबदबा कायम करके कब्जा कर लेने का मौका अभी भी खुला है.
 

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