
भारत दशकों तक दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक होने के लिए जाना जाता रहा. अब यह दृश्य बदलने लगा है. केंद्रीय बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए बढ़ा आवंटन, साथ ही प्रतिरक्षा के लिए पूंजीगत खर्च में वृद्धि और रक्षा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने से पिछले 10 साल में स्वदेशी रक्षा निर्माण में जबरदस्त उछाल आया है.
सरकार मेक इन इंडिया पर जोर देते हुए रक्षा उपकरणों को ‘स्वदेशी सूची’ में डाल रही है और उन्हें विकसित करने के लिए सरकारी और निजी कंपनियों को वित्तीय सहायता दे रही है इस कामयाबी का अप्रत्याशित फायदा यह हुआ कि रक्षा निर्यात में भारी उछाल आया है.
आंकड़े साफ तौर पर यह कहानी बयान करते हैं. रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2013-14 में 46,429 करोड़ रुपए से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, रक्षा निर्यात एक साल पहले 23,622 करोड़ रुपए से 62.66 फीसद बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपए पर पहुंच गया, जो वित्त वर्ष 2013-14 में 686 करोड़ रुपए था.
भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से ज्यादा देशों को निर्यात किए जा रहे हैं जबकि पंजीकृत रक्षा निर्यातकों की संख्या बढ़कर 145 हो गई है. निजी क्षेत्र की भूमिका शानदार रही है, वित्त वर्ष 2025-26 में कुल रक्षा उत्पादन में उसने करीब 24 फीसद का योगदान दिया तो रक्षा निर्यात में उसकी हिस्सेदारी 45.16 फीसद रही.
यह सब खासा असरदार है लेकिन दुनिया के सबसे अव्वल हथियार निर्यातकों में भारत का अब भी कहीं अता-पता नहीं. उसके ताजातरीन आंकड़े सातवें पायदान के इज्राएल (19.2 अरब डॉलर या 1.8 लाख करोड़ रुपए) और नौवें पायदान के दक्षिण कोरिया (15.4 अरब डॉलर या 1.5 लाख करोड़ रुपए) के निर्यात के आंकड़ों से बहुत कम हैं.
पांचवें पायदान पर चीन के आंकड़े तो और भी ज्यादा हैं, हालांकि वह सालाना आंकड़े प्रकाशित नहीं करता. अलबत्ता अब सरकार ने 2029-30 तक सालाना रक्षा निर्यात के लिए 50,000 करोड़ रुपए का लक्ष्य तय किया है.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस लक्ष्य पर काम करना भी शुरू कर दिया है. जुलाई में जब वे जकार्ता की यात्रा पर गए थे, तभी भारत और इंडोनेशिया ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र बियॉन्ड-विजुअल-रेंज (बीवीआर) एअर-टु-एअर मिसाइल की आपूर्ति के समझौतों का ऐलान किया.
ब्रह्मोस और अस्त्र भारत के दो प्रमुख स्वदेशी उत्पाद हैं. फिलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया ब्रह्मोस का तीसरा विदेशी खरीदार बन गया है. अस्त्र की प्रतिष्ठा और ख्याति भी फैल रही है, जिसमें कम से कम चार अन्य देशों—आर्मेनिया, सऊदी अरब, वियतनाम और मलेशिया—ने दिलचस्पी दिखाई है.
पिनाक मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, डॉर्नियर 228 विमान (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमि. में निर्मित), तटीय निगरानी प्रणालियां, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वार सिस्टम भारत की निर्यात बास्केट के अहम हिस्सों के तौर पर उभर रहे हैं.
साफ है कि भारत का रक्षा उद्योग उपकरणों के अलग-अलग पुर्जे और गोला-बारूद बेचने से आगे बढ़कर पूरी हथियार प्रणालियां—मिसाइलें, तोपें, वायु रक्षा उपकरण, नौसैन्य प्लेटफॉर्म, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (ईडब्ल्यू) प्रणालियां, विमान और अत्याधुनिक ड्रोन-रोधी टेक्नोलॉजी—बेचने की काबिलियत हासिल कर रहा है.


तेजी से बढ़ते रक्षा निर्यात का श्रेय स्वदेशी शोध और अनुसंधान, प्रतिस्पर्धी कीमतों, सरकार-समर्थित रक्षा कूटनीति और भारतीय प्रणालियों के प्रदर्शन के निरंतर बेहतर होते रिकॉर्ड को दिया जा सकता है.
मई 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस, आकाश, पिनाक, ड्रोन-रोधी टेक्नोलॉजी, ईडब्ल्यू और रडार प्रणालियों के शानदार प्रदर्शन ने संभावित खरीदारों के बीच इनकी साख में जबरदस्त इजाफा किया.
विस्फोटक और गोला-बारूद बनाने वाली नागपुर की सोलर इंडस्ट्रीज अब निर्यात होने वाले कई रक्षा उत्पाद बना रही है, जिनमें लॉइटरिंग म्यूनिशन, ड्रोन-रोधी प्रणालियां और पिनाक प्रणाली के लिए रॉकेट शामिल हैं. कंपनी का अगला कदम वैिश्वक स्तर पर बनी दिलचस्पी को टिकाऊ रिश्तों में बदलना होगा.
सोलर इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर डॉ. मनजीत सिंह कहते हैं, “रक्षा निर्यात में जबरदस्त बढ़ोतरी बताती है कि भारतीय उत्पादों में विश्वास बढ़ा है. अगला कदम लगातार बड़े पैमाने पर अच्छा प्रदर्शन करना, गुणवत्ता देना और भारत को लंबे वक्त के भरोसेमंद रक्षा भागीदार के तौर पर स्थापित करना है.”
उद्योग के अंदरूनी लोग लक्ष्य हासिल करने की भारत की क्षमता में भरोसा जताते हैं लेकिन उनका कहना है कि मौजूदा आंकड़ों पर कुछेक बड़े अनुबंधों का असर है. चुनौती यह है कि इन कामयाबियों को बार-बार मिलने वाले ऑर्डर और लंबे वक्त के कार्यक्रमों की अनवरत धारा में बदला जाए. ऐसा तभी हो सकता है जब प्रमाणन और गुणवत्ता की प्रक्रियाओं में और तेजी लाई जाए और निजी फर्म बड़े पैमाने पर निर्माण की क्षमता विकसित करें.
निजी क्षेत्र की भूमिका
भारत के रक्षा निर्यात की कहानी में सबसे बड़े कायापलट में से एक निजी उद्योग की बढ़ती भूमिका रही है. मानवरहित हवाई वाहन (यूएवी) या ड्रोन का निर्माण और निर्यात करने वाली नवी मुंबई की आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी के सीईओ अंकित मेहता कहते हैं, “भारत के रक्षा निर्यातों की अगुआई अब सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम नहीं कर रहे. भारत के रक्षा निर्यातों में करीब आधा योगदान निजी कंपनियों और खासकर ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और ईडब्ल्यू प्रणालियों सरीखे आला टेक्नोलॉजी वाले हिस्सों का है.”
भारत की रक्षा टेक्नोलॉजी में बढ़ते भरोसे से मेहता की उम्मीदें भी कुलांचे भर रही हैं. वे कहते हैं, “भारत की प्रतिस्पर्धी बढ़त कम कीमत के साजोसामान बनाने के बजाए मिशन के लिए तैयार प्रणालियों देने से आएगी. निर्यात की मात्रा मांग से कम और प्रक्रिया से ज्यादा तय होगी, जैसे प्रमाणन में कितना वक्त लगता है, घरेलू आपूर्ति शृंखलाएं परीक्षण में खरी उतरती हैं या नहीं, और कंपनियां आरऐंडडी में पैसा लगाती रहती हैं या नहीं. पहला निर्यात ऑर्डर हासिल करना मुश्किल नहीं लेकिन दूसरा ऑर्डर हासिल करना मुश्किल होता है.”
हैदराबाद की रक्षा फर्म जेन टेक्नोलॉजीज के चेयरमैन और एमडी अशोक अटलुरी कहते हैं, “दुनिया भारत को महज रक्षा आपूर्तिकर्ता के तौर पर नहीं बल्कि रक्षा टेक्नोलॉजी भागीदार के तौर पर देखने लगी है. यह भारत के रक्षा निर्यात के लिए आंकड़ों से कहीं ज्यादा अहम हो सकता है.” कंपनी अपनी ड्रोन-रोधी प्रणालियों में गहरी दिलचस्पी देख रही है, खासकर जब सेनाएं युद्ध में यूएवी के बढ़ते इस्तेमाल से जूझ रही हैं.
जेन अपने लाइव, वर्चुअल, कंस्ट्रक्टिव (एलवीसी) और मिक्स्ड रियलिटी कॉम्बैट ट्रेनिंग ईकोसिस्टम के अलावा एआइ-समर्थ वारगेमिंग समाधानों की अंतरराष्ट्रीय मांग में बढ़ोतरी होते देख रही है.
एलवीसी और एआइ-समर्थ सिम्युलेशन लड़ाई की स्थितियां रचकर वास्तविक युद्ध का अनुभव देता है और सेनाओं के लिए युद्ध प्रशिक्षण को और सघन बना देता है. भारत के रक्षा निर्यातों में मशीनी रक्षा उपकरणों के अलावा ऐसे सॉफ्टवेयर, सिम्युलेशन, टैक्टिकल ट्रेनिंग और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की हिस्सेदारी भी बढ़ रही है.
युद्ध के बदलते रूप ने सेनाओं को वायु रक्षा प्लेटफॉर्म और ड्रोन-रोधी प्रणालियों के जरिए ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और प्रीसिजन स्ट्राइक सरीखे ऑटोनाॅमस खतरों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने और साथ ही लंबी दूरी के हमलावर प्लेटफॉर्म खोजने के लिए मजबूर कर दिया है. ये सब भारतीय फर्मों के लिए बाजार का निर्माण करते हैं.
मसलन नोएडा की कंपनी आइजी डिफेंस वन-वे अटैक ड्रोन केएएल या काल का विकास कर रही है, जो 1,000 किमी की दूरी तक मार कर सकता है और 50 किलो पेलोड के साथ 7-8 घंटे लगातार उड़ान भर सकता है.
यह काल को शाहेद क्लास के ड्रोन के सस्ते विकल्प की तरह सामने रख रही है. आइजी डिफेंस के सीईओ बोधिसत्त्व संघप्रिय का कहना है कि भारत सस्ते और मिशन के लिए तैयार मानवरहित प्लेटफॉर्म के लिए भरोसेमंद साझेदार के तौर पर उभरने की अनूठी और अच्छी स्थिति में है.

ग्राहक आधार का विस्तार
भारत के ग्राहक आधार में भी विविधता आ रही है. म्यांमार, फिलीपींस, आर्मेनिया, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मिस्र और दूसरे अफ्रीकी देशों को किए जा रहे रक्षा निर्यातों में अब ज्यादा से ज्यादा महंगे प्लेटफॉर्म भी शामिल हैं.
अमेरिका, जर्मनी और बेल्जियम को सैन्य कलपुर्जों और उपप्रणालियों का निर्यात भी किया जा रहा है. भौगोलिक फैलाव से एक ही क्षेत्र पर निर्भरता कम होती है और फर्म अलग-अलग किस्म की खरीद प्रणालियों को समझ पाती हैं.
कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलों, छोटे हथियारों और राइफलों, गोला-बारूद और ड्रोन-रोधी प्रणालियों पर ध्यान दे रही बेंगलूरू की कंपनी एसएसएस डिफेंस के विवेक कृष्णन बताते हैं कि उनकी कंपनी 2022 से आर्मेनिया, नेपाल और श्रीलंका समेत विभिन्न देशों का निर्यात कर रही है. वह दक्षिणपूर्व एशिया, यूरोप और अफ्रीका में भी मौके तलाश कर रही है.
कुछ निर्माताओं के लिए सप्लाइ चेन अड़चन है. समुद्रपार से आने वाले कलपुर्जे, भूराजनैतिक उथलपुथल और लॉजिस्टिक्स की परेशानियों से काम पर असर पड़ सकता है. कृष्णन कहते हैं, “हमारे मामले में खासकर हथियारों के साथ, हमने डिजाइन पर नियंत्रण बनाए रखा है, खुद अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं विकसित की हैं और मददगार सप्लायर ईकोसिस्टम बनाया है.”
उनका यह भी मानना है कि भारत सबसे सस्ता सप्लायर बनकर जमे-जमाए अमेरिकी, यूरोपीय और इज्राएली मैन्युफैक्चररों—और साथ ही चीनी और तुर्की फर्मों—से भी प्रतिस्पर्धा में नहीं जीत सकता. वे कहते हैं, “प्रतिस्पर्धा की क्षमता का निर्माण केवल कीमत के आधार पर नहीं किया जा सकता. हमारा लक्ष्य अपने को ऐसे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के निर्माता के तौर पर स्थापित करना है जो अमेरिकी, रूसी और यूरोपीय ब्रांड से मुकाबला कर सके, और उसके उत्पाद चीनी और तुर्की ब्रांड के मुकाबले सस्ते भी हों.”
सरकार की कूटनीतिक कोशिशों की बदौलत एसएसएस डिफेंस सरीखी निजी कंपनियां ऐसी जगहों तक पहुंच पा रही हैं जहां इसके बिना उनके लिए दाखिल हो पाना मुश्किल होता. कृष्णन कहते हैं, “रक्षा निर्यात के लिए सरकार की कोशिशों ने अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के बीच भरोसे का निर्माण करने में मदद की है. इसके बिना फैसले लेने वाले सबसे ऊंचे स्तरों पर भरोसा कायम करना ज्यादा मुश्किल होता.”
हालांकि भारत का रक्षा निर्यात आज कहीं ज्यादा बड़े घरेलू मैन्युफैक्चरिंग आधार पर टिका है लेकिन उसे ऐसी और ज्यादा कंपनियों की जरूरत है जो समूची प्रणालियों के डिजाइन और निर्माण में सक्षम हों और फिर उन्हें दशकों तक डिलिवर कर पाएं और सेवाएं दे पाएं.
इसलिए भारत के रक्षा निर्यात के सफर का अगला चरण यह होगा कि क्षमता को और मजबूत और गहरा करें. ब्रह्मोस की सफलता, स्वदेशी ड्रोन, ड्रोन-रोधी प्रणालियों और लॉइटरिंग हथियारों का उभार, और उन्नत टेक्नोलॉजी वाले क्षेत्रों में निजी कंपनियों का उदय, सभी इसी दिशा की तरफ इशारा करते हैं.
भारत के लिए असल चुनौती यह है कि वह पहले-पहल खरीदारों को बार-बार खरीदने वाले ग्राहकों में, अनुबंधों को लंबे वक्त के कार्यक्रमों में और उत्पादों को भरोसेमंद वैश्विक ब्रांड में बदले.

