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अंडा खाने वाले हर बच्चे की थाली में अंडा होना चाहिए, विज्ञान यही कहता है

इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन अंक, 19 अगस्त 2026
अपडेटेड 17 अगस्त , 2026

इसकी शुरुआत विज्ञान से करते हैं क्योंकि विज्ञान पर कोई विवाद नहीं. अंडा प्रोटीन का सबसे संपूर्ण, सबसे साफ, सबसे भरोसेमंद, सबसे ज्यादा बायो-अवेलेबल रूप है, और बढ़ते बच्चे तक पहुंचाने के लिहाज से सबसे आसान और सबसे किफायती भी.

लंबे समय से साबित यह तथ्य तो फिर बार-बार बहस में क्यों आ जाता है? क्योंकि भारत में संस्कृति और राजनीति हर किसी के लिए उपलब्ध भोजन विकल्पों में दखल देती है. और स्कूल के बच्चे की लंच प्लेट पर रखा अंडा जितनी साफ-स्पष्ट दरारें दिखाता है, वैसा कम ही खाद्य पदार्थ करते हैं.

यह मुद्दा हाल ही सबसे अप्रत्याशित जगह उठा: पश्चिम बंगाल में. वहां नौ मई को भाजपा सरकार बनने के तुरंत बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता के करीब 1,800 स्कूलों में पका हुआ भोजन पहुंचाने का ठेका धार्मिक संगठन इस्कॉन को सौंप दिया, जिसके सख्त शाकाहारी नियम-आचार हैं.

इसका मतलब था कि अंडे थाली से गायब हो जाते. इसके बाद हुए विरोध ने सरकार को फैसला पलटने पर मजबूर कर दिया. 29 जुलाई को अधिकारी ने आदेश दिया कि स्वयं सहायता समूह अलग से अंडे सप्लाइ करेंगे. लेकिन मुख्यतः मांसाहारी बंगाल में इस पर बहस से कई सवाल पैदा होते हैं.

किसी पंथ का खानपान का नियम यह क्यों तय करे कि स्कूली बच्चे क्या खाएंगे? भारत की सेहत और पोषण को अक्सर दूसरे विचारों के नीचे क्यों रख दिया जाता है? क्या नीति के जरिए शाकाहार को चुपचाप डिफॉल्ट सार्वजनिक संस्कृति बनाया जा रहा है?

यह विकृत स्थिति है. ऐसे सवाल उस देश में उठने चाहिए, जहां स्टंटिंग (कुपोषण से बौनापन) और वेस्टिंग (कुपोषण से दुर्बलता) से पीड़ित बच्चों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है? देश में ऐसे बच्चों का प्रतिशत अफ्रीका के सबसे गरीब देशों के बराबर है.

नीतिगत समाधान बिल्कुल साफ है: सभी बच्चों को स्कूल में लाइए, जो अंडा खाना चाहते हैं, उन्हें अंडा दीजिए. लेकिन ठीक यहीं राज्यों के बीच तीखी सीमा खिंची दिखती है.

पीएम पोषण अपनी तरह का दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम है, जिसके तहत करीब 10 लाख स्कूलों में 11.2 करोड़ से ज्यादा बच्चों को गरम, पका हुआ भोजन दिया जाता है. लेकिन इसका मेन्यू राज्य तय करते हैं. और फिलहाल बंगाल समेत 20 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अंडे परोसते हैं.

बाकी 16 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश भोजन में अंडा नहीं परोसते. मिड-डे मील की अवधारणा शुरू करने वाला तमिलनाडु 1989 में मेन्यू में अंडे जोड़ने वाला पहला राज्य था.

इसके बाद दक्षिण के दूसरे राज्यों ने भी यह रास्ता अपनाया: आंध्र प्रदेश अब हफ्ते में पांच दिन अंडे देता है, तेलंगाना तीन बार; कई राज्य दो बार देते हैं. ‘नो एग’ राज्यों को स्टंटिंग और वेस्टिंग के आंकड़ों से मिलाइए, तो उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में दुखद मेल दिखता है. महाराष्ट्र ने 2023 में थोड़े समय तक परोसने के बाद विवादास्पद रूप से कदम वापस खींच लिए थे.

बौनेपन और कुपोषण का संबंध मां की खराब सेहत से है. लेकिन इसे अलग समस्या मानना गलत है. स्कूल में अंडे खाने वाली लड़कियों के बढ़ती उम्र में कमजोर होने का जोखिम कहीं कम होगा. यह संयोग नहीं कि तमिलनाडु और केरल में भारत के सबसे अच्छे मातृ स्वास्थ्य सूचकांक भी हैं. झारखंड में भाजपा की एक पिछली सरकार ने भविष्य की गरीबी पर पहले वार के रूप में अंडे शुरू किए थे.

इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन के 22 नवंबर, 2017 का आवरण

रांची की 13 वर्षीया पायल कुमारी सोमवार और शुक्रवार का इंतजार करती है, क्योंकि उन दिनों अंडे मिलते हैं. वह कहती है, “इनका स्वाद सचमुच अच्छा होता है. घर पर हमें सिर्फ रविवार को एग करी मिलती हैं.” हर जगह शिक्षक मानते हैं कि अंडे स्कूल में हाजिरी बढ़ाते हैं.

अब बचती है संस्कृति. भारत को ‘शाकाहारी देश’ मानने वाली रूढ़ छवि हकीकत के सामने फीकी पड़ जाती है. भारत काफी हद तक मांसाहारी है—आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक करीब 80 फीसद. कम से कम 14 राज्यों में ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मण भी इसमें शामिल रहे हैं. शाकाहार मुख्य रूप से गुजरात से पंजाब तक फैले पश्चिमोत्तर इलाके में केंद्रित है.

यह परिदृश्य एक सामाजिक समझौते से बंधा हैः दोनों संस्कृतियां साथ रहती हैं. कोई शाकाहारियों पर मांसाहार नहीं थोपता. उलटा भी सच होना चाहिए: शाकाहार किसी के लिए भी पसंदीदा सांस्कृतिक या नैतिक विकल्प हो सकता है. लेकिन वह सार्वजनिक नीति नहीं हो सकता. राज्य को खानपान के मामले में तटस्थ रहना होगा.

इस हफ्ते हमारी आवरण कथा सेहत से लेकर संस्कृति और नीति के विकास तक पूरा दायरा समेटती है. इसे सीनियर एडिटर सोनाली आचार्जी ने राज्यों से मिले इनपुट के साथ लिखा है. मिड-डे मील में अंडे को कई मानकों पर हराना मुश्किल है. हर अंडा उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का पूरा पैकेट है, जिसमें सभी नौ जरूरी अमीनो एसिड और अन्य अहम पोषक तत्व मौजूद होते हैं, ऐसे रूप में जिसे बच्चे का शरीर लगभग पूरी तरह सोख लेता है—मांस, मछली और सोया से बेहतर, और दाल तो बहुत पीछे रह जाती है.

सिर्फ दूध इसकी बराबरी करता है, इसलिए पंजाब और हरियाणा जैसे डेयरी-प्रधान ‘शाकाहारी’ राज्य मोटे तौर पर बौनेपर और कुपोषण के अभिशाप से बच जाते हैं. लेकिन अंडे के उलट दूध के लिए विशाल कोल्ड चेन बैकअप चाहिए. 7-8 रुपए का अंडा समान मात्रा के प्रोटीन के लिए पनीर की तुलना में आधी कीमत पर आता है. मिलावट का अंदेशा भी लगभग शून्य.

बौनेपन का जोखिम करीब आधा घटाने और मानसिक विकास को बढ़ावा देने का यह सरल उपाय है. ऐसी असाधारण गुणवत्ता से उन सांस्कृतिक आधारों पर मुंह मोड़ना, जिन्हें सब साझा नहीं करते, मूर्खता है. भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को भविष्य के लिए स्वस्थ, मानसिक रूप से तेज कार्यबल में बदलना साझा जरूरत है. नीति के लिए समझदार, नैतिक और व्यावहारिक रास्ता विकल्प को सक्षम बनाना है, रोकना नहीं.

जो बच्चे अंडे नहीं खाते, उन्हें सबसे अच्छा शाकाहारी विकल्प दीजिए. लेकिन किसी एक समुदाय की वर्जना को सब पर लागू मत कीजिए. ऐसी सार्वजनिक नीति लाखों बच्चों को उस पोषण से वंचित करती है, जिसकी उन्हें स्पष्ट सोच, ठीक से बढ़ने और भारत के भविष्य में योगदान देने के लिए जरूरत है.

अंडा खाने वाले हर बच्चे की थाली में अंडा होना चाहिए. विज्ञान यही कहता है. इसे रोकने वाली एकमात्र चीज राजनैतिक विकल्प है, जो सांस्कृतिक विकल्प का चोला ओढ़े हुए है.

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