
वाराणसी के दक्षिणी छोर पर स्थित सीर गोवर्धनपुर में 29 जुलाई की गुरु पूर्णिमा की शाम सामान्य धार्मिक आयोजन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी. काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के सीर गेट के सामने स्थित संत रविदास की जन्मस्थली केसरिया रंगों से सजी हुई थी. परिसर में सुनहरे कलशों की लंबी कतार थी और मंच पर देशभर से आए संत-महंत तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता मौजूद थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक-एक कर 131 कलशों का पूजन कर रहे थे.
इन कलशों में संत रविदास मंदिर की मिट्टी नहीं, भाजपा की अगले सात महीनों तक चलने वाली सामाजिक और राजनैतिक रणनीति का संदेश भी समाहित था.
पूजा के बाद मुख्यमंत्री ने जब इन कलशों को अलग-अलग राज्यों से आए प्रतिनिधियों को सौंपा तो स्पष्ट हो गया कि यह कार्यक्रम केवल संत रविदास के 650वें जयंती वर्ष का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर तैयार एक व्यापक सामाजिक और उससे ज्यादा राजनैतिक अभियान है.
इसी मंच से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक अहम सियासी ऐलान किया. यही कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने संत रविदास के नाम से बने जिले का नाम बदलकर भदोही कर बड़ा पाप किया था और उनकी सरकार फिर इस जिले को संत रविदास नगर के नाम से पहचान दिलाएगी.
योगी ने प्रदेश के हर जिले में एक मुख्यमंत्री कंपोजिट विद्यालय को आवासीय विद्यालय बनाने और उसका नाम संत रविदास के नाम पर रखे जाने की भी घोषणा की. कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने डेरा सचखंड बल्लां, जालंधर और रविदास मंदिर के प्रमुख संत निरंजन दास के साथ गुरु रविदास मंदिर में दर्शन-पूजन किया तथा रविदास पार्क स्थित संत रविदास की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की.
संत रविदास लंबे समय से दलित समाज, विशेषकर जाटव और रविदासिया समुदाय के सबसे बड़े आध्यात्मिक प्रतीकों में से रहे हैं. उनके जयंती वर्ष के अवसर पर सीर गोवर्धनपुर से भाजपा ने केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत नहीं की, बल्कि ओबीसी और दलित राजनीति के केंद्र में अपनी नई चुनावी रणनीति का भी संकेत दे दिया.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल तथा केंद्रीय राज्यमंत्री पंकज चौधरी की उपस्थिति में शुरू हुआ श्री गुरु रविदास महाराज समरसता संकल्प अभियान आने वाले महीनों में भाजपा के सबसे बड़े सामाजिक संपर्क अभियानों में शामिल होने जा रहा है.
मंच पर दो प्रमुख संतों के अलावा 15 बड़े नेता मौजूद थे, इनमें से 11 ओबीसी और दलित समुदाय से आने वाले थे. सीधे रविदास समाज से जुड़े लगभग 100 संत भी मौके पर मौजूद थे. यह सामाजिक प्रतिनिधित्व स्वयं इस अभियान की सियासी दिशा स्पष्ट कर रहा था.
केंद्रीय मंत्री मेघवाल ने संत रविदास का प्रसिद्ध भजन प्रभुजी तुम चंदन हम पानी गाकर पूरे वातावरण को भावनात्मक बना दिया. दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने अपने संबोधनों में लगातार ‘बेगमपुरा’, सामाजिक समरसता और जातिविहीन समाज की अवधारणा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं और भाजपा सरकार की नीतियों से जोड़ने का प्रयास किया.
संदेश स्पष्ट था कि संत रविदास की शिक्षाओं को भाजपा अपने सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनाकर दलित समाज के बीच नई स्वीकार्यता हासिल करना चाहती है.
भाजपा ने इस संकल्प अभियान की अवधि भी सामान्य राजनैतिक अभियानों की तरह कुछ दिनों की नहीं, बल्कि पूरे सात महीने की रखी है. भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष अशोक रावत बताते हैं “यह अभियान पांच चरणों में होगा.
पहले दिन, गुरु पूर्णिमा पर प्रदेश के हर मंडल में कम से कम पांच रविदास मंदिरों पर दीप जलाया गया. जिन स्थानों पर रविदास मंदिर न थे, वहां अन्य मंदिरों में दीपदान कार्यक्रम किए गए.” इसके माध्यम से पार्टी ने अभियान की शुरुआत धार्मिक आस्था और सामाजिक भागीदारी के मिश्रण के साथ की.
भाजपा की रणनीति का अहम पक्ष उत्तर प्रदेश और पंजाब को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ना है. कलश वंदन कार्यक्रम के अंतर्गत उत्तर प्रदेश की 98 संगठनात्मक जिला इकाइयों और छह क्षेत्रीय इकाइयों के साथ-साथ देश के 27 अन्य राज्यों के पार्टी प्रतिनिधियों को भी कलश सौंपे गए.
इन प्रतिनिधियों को ये कलश 10 सितंबर तक विभिन्न मंदिरों और संत सम्मेलनों तक लेकर जाना है. पार्टी 29 जुलाई से 31 अगस्त तक संतों, महात्माओं, गुरुओं और महंतों से व्यापक संपर्क अभियान भी चलाएगी. आशीर्वाद लेने के अलावा उनसे रविदास जयंती वर्ष के कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी का आग्रह किया जाएगा.

पूरे अभियान का खास आकर्षण होगी श्री गुरु रविदास महाराज समरसता यात्रा. 5 अक्तूबर को जालंधर (पंजाब) से शुरू होकर 5 नवंबर को यह वाराणसी में समाप्त होगी. मार्ग में पड़ने वाले गांवों, कस्बों और विशेष रूप से दलित बहुल क्षेत्रों में यह रुकेगी. यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और राजनैतिक संपर्क का व्यापक अभियान होगी. भाजपा पहली बार संत रविदास के अनुयायियों तक इतनी संगठित योजना के साथ पहुंचने का प्रयास कर रही है.
राजनैतिक जानकारों के मुताबिक, यह पहली बार है जब संत रविदास को मानने वाले दलित समुदाय तक पहुंचने के लिए भाजपा ने सात महीने लंबा अभियान तैयार किया है. इसके पीछे उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों राज्यों की चुनावी और सामाजिक परिस्थितियां महत्वपूर्ण हैं.
उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 फीसद है और विधानसभा की 403 में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने मिलकर अनुसूचित जाति की 63 सीटें जीती थीं, जबकि समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 20 सीटें मिली थीं. अब गुरु पूर्णिमा से शुरू होकर यह अभियान 20 फरवरी, 2027 को संत रविदास जयंती तक चलेगा.
अगले वर्ष फरवरी-मार्च में उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, इसलिए पार्टी ने अपने अभियान का सबसे बड़ा फोकस इन्हीं दो राज्यों पर रखा है.
पंजाब में भी करीब 32 फीसद आबादी दलित है और 117 सदस्यीय विधानसभा में 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा इनमें से एक भी सीट नहीं जीत सकी थी.
संत रविदास के अनुयायी रविदासिया समुदाय की करीब 12 लाख की आबादी पंजाब के दोआबा क्षेत्र के कपूरथला, होशियारपुर, नवांशहर और जालंधर जिलों में रहती है. 2022 में मतदान तिथि 14 से बढ़ाकर 20 फरवरी करनी पड़ी थी क्योंकि राजनैतिक दलों ने चुनाव आयोग से आग्रह किया था कि मतदान गुरु रविदास जयंती से न टकराए.
उस समय बड़ी संख्या में रविदासिया श्रद्धालु वाराणसी की यात्रा पर रहते हैं. इसी पृष्ठभूमि को देखते हुए भाजपा ने इस बार संत रविदास जयंती वर्ष को दोनों राज्यों में बड़े सामाजिक अभियान का आधार बनाया है.


हालांकि राजनैतिक विश्लेषक इस पूरे अभियान को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखते. काशी हिंदू विवि में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर राहुल राज कहते हैं, “भाजपा ने पिछले एक दशक में डॉ. भीमराव आंबेडकर, महर्षि वाल्मीकि, निषादराज, भगवान बिरसा मुंडा और अब संत रविदास जैसे प्रतीकों को अपने राजनैतिक विमर्श का अहम हिस्सा बनाया है. यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के भीतर सामाजिक विस्तार की रणनीति है.”
उनके अनुसार, भाजपा उन सामाजिक प्रतीकों को सियासी विमर्श में शामिल कर रही है जिनकी दलित, पिछड़े और वंचित समुदायों में व्यापक स्वीकार्यता है. इससे पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़कर नए वर्गों के बीच स्थायी राजनैतिक आधार बनाना चाहती है.
दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों ने भाजपा को संकेत दिया कि उत्तर प्रदेश में गैर-जाटव दलितों का एक हिस्सा सपा और कांग्रेस गठबंधन की ओर आकर्षित हुआ. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें 62 से घटकर 33 पर पहुंचने में वह असर साफ दिखा. आंतरिक आकलन में वाल्मीकि, पासी, सोनकर और अन्य अनुसूचित जातियों के बीच समर्थन में आई कमी को अहम कारणों में शामिल किया गया. इसी के बाद भाजपा ने दलित समाज से सामाजिक संवाद दोबारा मजबूत करने की रणनीति पर काम शुरू किया. मौजूदा अभियान उसी का हिस्सा है.
दूसरी ओर विपक्ष इस पूरे अभियान को अलग नजरिए से देखता है. सपा नेताओं का कहना है कि भाजपा दलित महापुरुषों और सामाजिक प्रतीकों का राजनैतिक उपयोग कर रही है, जबकि सामाजिक न्याय से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर उसकी नीतियां सवालों के घेरे में हैं.
समाजवादी बाबासाहेब आंबेडकर वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मिठाई लाल भारती कहते हैं, “अयोध्या में चंदा चोरी और युवाओं में बढ़ते आक्रोश से ध्यान बटाने को भाजपा ने यह अभियान शुरू किया है. बात तो समरसता की जगह समानता, दलित अधिकारों की करनी चाहिए.”
सपा भी 2027 को ध्यान में रखते हुए सामान्य सीटों पर ज्यादा संख्या में दलित प्रत्याशी उतारने की रणनीति पर विचार कर रही है. कांग्रेस भी दलित नेतृत्व और सामाजिक न्याय के मुद्दों को नए सिरे से सामने लाने की कोशिश में है. ऐसे में दलित वोट पहले से कहीं ज्यादा बहुकोणीय मुकाबले का केंद्र बनता दिख रहा है.
संत रविदास की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं, रविदास जाति मत पूछइ, का जात का पात. ब्राह्मन खत्री बैस सूद, सभन की इक जात. उनका यह संदेश सामाजिक समानता और जाति-विहीन समाज की परिकल्पना पेश करता है. पर विडंबना है कि जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, जाति एक बार फिर सियासी दलों की सबसे निर्णायक चुनावी रणनीति बनती दिखती है.
इन घोषणाओं और प्रतीकात्मक आयोजनों ने संकेत दिया कि भाजपा संत रविदास की विरासत को सांस्कृतिक सम्मान तक सीमित नहीं रखना चाहती, उसे अपनी सामाजिक पहुंच के विस्तार का अहम आधार भी बना रही है.
भाजपा संत रविदास की सामाजिक स्वीकार्यता को राजनीतिक संवाद में बदलकर यूपी और पंजाब के विधानसभा चुनाव से पहले दलितों के बीच पैठ बनाना चाहती है.

