scorecardresearch
डार्क मोड

भविष्य को मिलता आकार

समय के हिसाब से शिक्षा पद्धति अपनाकर अपने छात्रों के वास्ते भारत को एक बड़ी छलांग लगानी है

 lead essay
दिल्ली यूनिवर्सिटी के नार्थ कैंपस में स्टूडेंस
अपडेटेड 11 अगस्त , 2026

इस महीने जंतर-मंतर पर और दिल्ली से लेकर देश भर के कई शहरों में हुए धरना-प्रदर्शनों में छात्रों ने उस शिक्षा व्यवस्था का विरोध किया, जिसके बारे में उनका कहना है कि वह उनके किसी काम की नहीं.

उनकी शिकायतें राज्यों और संस्थानों के हिसाब से अलग-अलग हैं—जैसे बढ़ती फीस, शिक्षकों के खाली पद, परीक्षाओं में गड़बड़ी, आगे खिसकता शैक्षिक सत्र और प्लेसमेंट के वादे जो ग्रेजुएट होते-होते हवा में उड़ जाते हैं.

इन सबमें एक ही चिंता गहरे तक पैठी हुई है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद मिलने वाली डिग्री अब उन मौकों, गतिशीलता या सुरक्षा की गारंटी नहीं देती, जिनका सपना उसने कभी दिखाया था.

इन विरोध-प्रदर्शनों को खारिज नहीं किया जा सकता. ये उस पीढ़ी की चेतावनी हैं जिसने शिक्षा में अच्छा-खासा निवेश किया है, लेकिन अब उसके प्रतिफल को लेकर असमंजस में है. फिर भी, भारतीय उच्च शिक्षा को देखने का एकमात्र नजरिया इन्हें ही नहीं बनाना चाहिए.

नाकामियों के अलावा ऐसे संस्थान भी हैं जो शिक्षा तक पहुंच बढ़ा रहे हैं, पाठ‍्यक्रमों को नए सिरे से तैयार कर रहे हैं, अच्छी क्वालिटी का शोध कर रहे हैं, क्लिनिकल और प्रोफेशनल ट्रेनिंग को बेहतर बना रहे हैं, नए उद्यमों को बढ़ावा दे रहे हैं और ज्यादा समावेशी कैंपस बना रहे हैं. चुनौती दोनों तरह के संस्थानों के बीच फर्क करने की है, एक वे जो बदलती दुनिया के हिसाब से काम कर रहे हैं, और दूसरे जो महज कोर्स, इमारतें और डिग्रियां जोड़ते जा रहे हैं.

ऐसे ही मुश्किल माहौल में इंडिया टुडे ग्रुप अपने सालाना बेस्ट यूनिवर्सिटीज सर्वे के 2026 के संस्करण को प्रकाशित कर रहा है. इसका मकसद सिर्फ उन संस्थानों की तारीफ करना नहीं है जिनकी पहले से ही अच्छी साख है, और न ही यूनिवर्सिटी सिस्टम की विशाल और विविध व्यवस्था को महज एक रैंकिंग टेबल तक सीमित करना है. असल में यह हायर एजुकेशन की स्थिति की सचाई से अवगत कराने का दूसरा तरीका है—बेहतरीन संस्थानों की प्रशंसा करते हुए यह देखना कि वे अलग क्या कर रहे हैं.

जिस वर्ष में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन चल रहे हैं, उसमें प्रकाशित होने वाली रैंकिंग में महज यह नहीं देखा जाना चाहिए कि कौन-सी यूनिवर्सिटी शिखर पर है. इसमें यह भी देखना चाहिए कि एकेडमिक नेतृत्व यानी शिक्षकगण कैसे हैं, क्या संस्थान आर्थिक और तकनीकी बदलावों से तालमेल बिठा रहे हैं.

वे छात्रों की कितनी अच्छी तरह मदद करते हैं, और क्या उनकी दी शिक्षा से बौद्धिक विकास, प्रोफेशनल क्षमता और सार्थक अवसर मिलते हैं? छात्रों और माता-पिता के लिए इसकी अहमियत इसलिए है कि इससे उन्हें अपनी जिंदगी के सबसे अहम और महंगे फैसलों में से एक को लेने से पहले बेहतर सवाल पूछने में मदद मिलती है.

भारतीय हायर एजुकेशन का जबरदस्त विस्तार हुआ है. ऐसे में इस तरह की जांच-परख जरूरी हो गई है. देश में अब 1,293 विश्वविद्यालय हैं, जो 2014-15 के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा हैं. यह महत्त्वाकांक्षाओं के आमजन तक पहुंचने की उल्लेखनीय मिसाल है.

यूनिवर्सिटी की डिग्री अब शहरों के कुछ चुनिंदा संपन्न लोगों तक सीमित नहीं रही. हर तरह के तबकों, इलाकों और सामाजिक समूहों के परिवार अब हायर एजुकेशन को रोजगार, तरक्की और सम्मान पाने का सबसे विश्वसनीय तरीका मानते हैं.

प्राइवेट विश्वविद्यालयों की बढ़ती तादाद ने विकल्प बढ़ा दिए हैं और उन्होंने नए प्रोग्राम, सुविधाएं और इंस्टीट्यूशनल मैनेजमेंट के नए मॉडल शुरू किए हैं. इससे स्वतंत्र आकलन की जरूरत भी बढ़ गई है. 'प्राइवेट' ठप्पे का मतलब अपने आप में न तो बहुत उत्कृष्ट होना है और न ही किसी तरह की कमी.

ठीक वैसे ही जैसे 'पब्लिक' के ठप्पे का मतलब क्वालिटी की गारंटी नहीं है. दोनों ही श्रेणियों के संस्थानों के बीच फैकल्टी की संख्या, रिसर्च की कल्चर, बुनियादी सुविधाएं, फीस, संचालन और ग्रेजुएट होने के बाद के नतीजों में बहुत ज्यादा अंतर है.

सैकड़ों संस्थानों और हजारों कोर्स के बीच सही विकल्प तलाशने वाले परिवारों के लिए अब मूल मसला सिर्फ मान्यता प्राप्त डिग्री का ही नहीं, बल्कि उसकी एजुकेशनल वैल्यू का भी है. इंडिया टुडे बेस्ट यूनिवर्सिटी सर्वे इस आकलन को आसान बनाता है. 

विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ने के साथ लोगों की भागीदारी में भी खासी बढ़ोतरी हुई है. 18-23 साल की उम्र के लोगों के लिए ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (जीईआर) 2014-15 में 23.7 फीसदी था जो 2023-24 में बढ़कर 30 फीसदी हो गया.

नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 का लक्ष्य इसे बढ़ाकर 2035 तक 50 फीसदी तक ले जाना है. महिलाओं का जीईआर 31.2 फीसदी है, जो लगातार सात साल से पुरुषों के जीईआर से ज्यादा है. यह इस बात का संकेत है कि शिक्षा तक महिलाओं की पहुंच में सुधार हुआ है.

लेकिन एनरोलमेंट (दाखिला) कहानी का एक हिस्सा भर है. इससे यह तो पता चलता है कि शिक्षा में कौन आ रहा है, लेकिन यह नहीं कि क्या छात्रों को योग्य शिक्षक मिलते हैं, क्या कक्षाएं और परीक्षाएं समय पर होती हैं, क्या वे वह स्किल सीख पाते हैं जिनका उनके कोर्स में वादा किया जाता है, या क्या आर्थिक, एकेडमिक और सामाजिक दबाव उन्हें डिग्री पूरी किए बिना ही बीच में पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर करते हैं.

इनमें से कुछ चिंताएं विरोध-प्रदर्शनों में दिखते गुस्से में झलकती हैं. ये बताती हैं कि क्यों किसी सर्वे में सिर्फ प्रतिष्ठा से इतर भी चीजों का मूल्यांकन होना जरूरी है. हो सकता है कि कोई मशहूर हस्ती संस्थान खोल दे.

लेकिन वह नाम के बल पर कमजोर पढ़ाई, छात्रों को कमतर मदद, पुराने पाठ्यक्रमों या बिना भरोसे वाली परीक्षाओं से हमेशा के लिए नहीं चल सकता. इसके उलट, हो सकता है कि कोई अल्पज्ञात यूनिवर्सिटी तेजी से सुधार कर ले, मजबूत विभाग बना दे या किसी विषय में अच्छे नतीजे दे दे.

'इंडिया टुडे' सर्वे में इन अंतरों को समझने की कोशिश की गई है. इसके लिए 120 से ज्यादा विशेषताओं के आधार पर संस्थानों का मूल्यांकन पांच पैमानों के तहत किया गया है. ये पैमाने हैं: प्रतिष्ठा और प्रशासन; एकेडमिक और रिसर्च एक्सीलेंस; बुनियादी सुविधाएं और जीवंत अनुभव; व्यक्तित्व और लीडरशिप विकास; और करिअर में प्रगति और प्लेसमेंट. अर्थपूर्ण ढंग से तुलना करने के लिए हर पैमाने का वेटेज पिछले सालों जितना ही रखा गया है.

सब मिलाकर, ये उपाय किसी प्लेसमेंट के आंकड़े या अलग से नजर आते प्रचार दावों से कहीं ज्यादा उपयोगी हैं. एक यूनिवर्सिटी  सबसे ज्यादा वेतन पैकेज का विज्ञापन कर सकती है, बिना यह बताए कि कितने छात्रों को नौकरी मिली, वे किस प्रोग्राम के थे या औसत वेतन क्या रहा.

वह नए लैब का प्रदर्शन कर सकती है और यह नहीं भी बता सकती कि छात्र नियमित रूप से इसका उपयोग करते हैं या नहीं. वह ऐसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की घोषणा कर सकती है जिसमें बहुत कम शिक्षकों या छात्रों का आना-जाना होता हो.

किसी रैंकिंग को ऐसे किसी खाने में बंद होने से बचना चाहिए जिसमें स्थापित संस्थान अपनी जमी-जमाई साख की बार-बार पुष्टि करते हैं. इसीलिए सबसे ज्यादा सुधार वाले विश्वविद्यालय श्रेणी की शुरुआत महत्त्वपूर्ण कदम है. 2022 और 2026 रैंकिंग के बीच किसी संस्थान की सापेक्ष स्थिति में कितने प्रतिशत बदलाव आया है, इस पैमाने से उसकी प्रगति का पता चलता है न कि पुरानी साख का.

छात्रों के लिए यह लगभग उतना ही महत्त्वपूर्ण हो सकता है जितना यह जानना कि कौन-सा संस्थान अव्वल है. यूनिवर्सिटी लीडर्स की श्रेणी में सुधार साफ झलकता है और जाहिर होता कि पहले से ही शीर्ष पर मौजूद संस्थानों को रैकिंग के जरिए पुरस्कृत करने की जरूरत नहीं, बल्कि तालिका में नीचे के संस्थानों को इंसेंटिव की जरूरत है.

इस वर्ष के सर्वेक्षण से जो सबसे गहरी बात सामने आती है, वह अपनी श्रेणी के अकेले दिग्गज नामों से नहीं बल्कि उन विकल्पों से निकलती है जिसे ये संस्थान मुहैया कराते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय की वैश्विक रैंकिंग में जो उछाल आया है, उसकी वजह एकेडमिक उपलब्धि की व्यापक परिभाषा भी है. डॉक्टरेट रिसर्च का अब केवल थीसिस या जर्नल के लेख में ही नहीं बल्कि पेटेंट, प्रोटोटाइप या स्टार्टअप से भी मिल सकता है.

सिम्बायोसिस इंटरनेशनल दूसरी तरह का मॉडल पेश करता है. इंटरनेशनल स्टूडेंट्स की मदद के लिए पुणे में स्थापित इस संस्थान के अब 45 इंस्टीट्यूट और 105 प्रोग्राम हैं, जिनमें 85 से ज्यादा देशों के लगभग 70,000 छात्र पढ़ते हैं.

उसका इनोवेशन और आंत्रेप्रेन्योरशिप में एमबीए प्रोग्राम है जिसमें कोई पारंपरिक प्लेसमेंट नहीं होता. लेकिन उसकी 60 सीटों के लिए 12,000 एप्लीकेशन आती हैं. इस मांग से जाहिर होता है कि कई छात्र नौकरी की गारंटी के बजाय अपने बिजनेस खड़ा करने का विकल्प चुनने को इच्छुक होते हैं.

एम्स दिल्ली में पढ़ने का फायदा यह है कि मेडिकल रैंकिंग में उसका न केवल लंबे समय से दबदबा है, बल्कि उसके क्लिनिकल कार्य व्यापक और जटिल हैं. रेजिडेंट डॉक्टर दुर्लभ और मुश्किल बीमारियों का इलाज एक सुपर स्पेशलिस्ट देखभाल के माहौल में करते हैं, जिससे क्लिनिकल अनुभव उनकी पढ़ाई का अहम हिस्सा बन जाता है.

आइआइटी दिल्ली में एकेडमिक एक्सीलेंस को फ्लेक्सिबिलिटी, अलग-अलग विषयों की मिली-जुली पढ़ाई और प्रैक्टिकल प्रॉब्लम-सॉल्विंग के आधार पर नए सिरे से तैयार किया जा रहा है. इसके नए डिजाइन किए गए प्रोग्राम छात्रों को अलग-अलग विभागों के कोर्सों को एक साथ पढ़ने की सुविधा देते हैं, साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सस्टेनेबिलिटी को भी सभी विषयों में शामिल किया जा रहा है.

नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी में विस्तार पर जितना खर्च किया जा रहा है, उतना ही निवेश एकेडमिक क्षमता, आवासीय सुविधाओं और समावेशिता पर भी किया जा रहा है. उसके पास जून 2026 तक 118 फैकल्टी सदस्य और 1,631 छात्र थे, अब वह दो एकेडमिक ब्लॉक पूरे कर रहा है और 2028 तक लगभग 3,000 छात्रों के लिए हॉस्टल बना रहा है.

वह एआइ की मदद से शिक्षण के लिए पायलट प्रोजेक्ट भी चला रहा है और विमेंस इनक्लूजन ऐंड लीडरशिप इन लॉ' पहल शुरू कर रहा है. इस पहल से बड़े असंतुलन की समस्या दूर हो सकती है: लॉ ग्रेजुएट्स में महिलाओं की हिस्सेदारी 32 फीसदी है, लेकिन प्रैक्टिस करने वाले 18 लाख वकीलों में उनकी भागीदारी सिर्फ 15 फीसदी है.

जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों से स्पष्ट हुआ है कि बिना विश्वसनीयता के विस्तार करने से भारत के युवा संतुष्ट नहीं होंगे. बेस्ट यूनिवर्सिटीज सर्वे में पहचानी गई संस्थाएं दिखाती हैं कि गिरावट हमेशा नहीं रहती और देश में उत्कृष्टता हासिल करने के रास्ते पहले से ही मौजूद हैं.

इस सर्वे का मकसद उन तरीकों को सबके सामने लाना, छात्रों और अभिभावकों को बेहतर जानकारी देना, अच्छे प्रदर्शन वाली संस्थाओं को सम्मानित करना और दूसरी संस्थाओं को अपने स्टैंडर्ड बेहतर करने के लिए प्रेरित करना है.n

जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों से स्पष्ट है कि बिना विश्वसनीयता के विस्तार करने से भारत के युवा संतुष्ट न होंगे.

सर्वेक्षण का तरीका: इस तरह की गई विश्वविद्यालयों की रैं‌किंग

डिया टुडे ग्रुप की सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सालाना रैंकिंग 765 सामान्य, 98 मेडिकल, 172 तकनीकी और 30 लॉ यूनिवर्सिटीज की हिस्सेदारी के साथ भारत के एकेडमिक कैलेंडर में विशेष स्थान रखती है.

यह उम्दा पढ़ाने के ठिकाने तलाशते छात्रों के लिए करिअर के अहम फैसले आसान बना देती है. दूसरी ओर नियोक्ताओं, माता-पिता, पूर्व छात्रों, नीति निर्माताओं, विश्वविद्यालयों और आम लोगों के लिए विश्वविद्यालयीन शिक्षा की दशा-दिशा की व्यापक तस्वीर पेश करती है.

इंडिया टुडे के नॉलेज पार्टनर मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स (एमडीआरए) ने मार्च से जुलाई 2026 के बीच यह सर्वेक्षण करते हुए कठोर पद्धति का अनुसरण किया. वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष रैंकिंग के लिए एमडीआरए ने 120 से ज्यादा विशेषताओं को जांचा-परखा.

इन्हें पांच व्यापक मानदंडों—प्रतिष्ठा और शासन प्रणाली, एकेडिमक और अनुसंधान उत्कृष्टता, बुनियादी ढांचा और रहन-सहन का अनुभव, व्यक्तित्व और नेतृत्व का विकास, और करिअर की प्रगति तथा प्लेसमेंट—के तहत शामिल किया गया. रैंकिंग के लिए किसी यूनिवर्सिटी  की तरफ से दिए गए मौजूदा साल के डेटा का इस्तेमाल किया गया और पैरामीटर पर अंक दिए गए.

राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों समेत 800 से ज्यादा क्वालीफाइंग यूनिवर्सिटी  की सूची तैयार की गई. चार स्ट्रीम—सामान्य, मेडिकल, तकनीकी और विधि—के पोस्टग्रेजुएट प्रोग्राम का मूल्यांकन किया गया. केवल वही विश्वविद्यालय योग्य माने गए जिन्होंने पूर्णकालिक और कक्षाओं में पढ़ाए जाने वाले कोर्स की पेशकश की और 2025 के अंत तक ग्रेजुएशन करने वाले कम से कम तीन बैच निकाल चुके थे.

हर श्रेणी के मानदंड निर्धारित करने के लिए अनुभवी विशेषज्ञों की सलाह ली गई. संकेतक और उनके सापेक्ष भारांश (वेटेज) ध्यानपूर्वक तय किए गए. भारांश बीते सालों के समान अपरिवर्तित रहे, ताकि निरंतरता बनी रहे और तुलना की जा सके.

हर श्रेणी के लिए विस्तृत वस्तुनिष्ठ प्रश्नावली योग्य विश्वविद्यालयों को भेजी गई और एमडीआरए की वेबसाइट पर अपलोड की गई. भागीदारी और स्पष्टीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए औपचारिक निमंत्रण, ईमेल, फोन कॉल और फॉलोअप का प्रयोग किया गया.

लगभग 192 विश्वविद्यालयों ने डेटा और उसके समर्थन में दस्तावेज समय पर पेश किए; 190 को रैंक दी गई.

प्रस्तुत डेटा और सहायक दस्तावेजों की फिर छानबीन की गई. पिछले रिकॉर्ड, अनिवार्य खुलासों, फोन से जांच, ईमेल से तस्दीक और यूनिवर्सिटी  वेबसाइट से डेटा का सत्यापन किया गया. संस्थानों से अपर्याप्त या अशुद्ध जानकारी को पूरा या शुद्ध करने को कहा गया. हरेक मानदंड के तहत वस्तुनिष्ठ अंक दिए.

उत्तरदाताओं ने अपने अनुभव से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय रैंकिंग दीं, और उन्हें क्रमशः 75 फीसद और 25 फीसद भारांश दिए. उन्होंने पांच मानदंडों से जुड़े 10 अंकों के पैमाने पर भी विश्वविद्यालयों का आकलन किया. वस्तुनिष्ठ और सतत अंकों को 50:50 के अनुपात में जोड़ अंतिम अंक निकाले गए.

सर्वाधिक सुधार वाले विश्वविद्यालय
इस साल से एक नई श्रेणी ‘सर्वाधिक सुधार वाले विश्वविद्यालय’ शुरू की गई है, ताकि उन यूनिवर्सिटी  को सामने लाया जा सके जिन्होंने पांच वर्षों के दौरान सबसे ज्यादा प्रगति की है. रैंकिंग 2022 और 2026 के बीच विश्वविद्यालय की सापेक्ष स्थिति में आए प्रतिशत सुधार की थाह लेती है.

एमडीआरए की मूल टीम की अगुआई सीईओ अभिषेक अग्रवाल ने की और इसमें सीनियर प्रोजेक्ट डायरेक्टर अबिनाश झा, रिसर्च मैनेजर वैभव गुप्ता, रिसर्च एक्जीक्यूटिव रोबिन सिंह और असिस्टेंट मैनेजर, ईडीपी, मानवीर सिंह और महेश जोशी शामिल थे.

ADVERTISEMENT
Advertisement