
नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (बेंगलूरू) काफी समय से कानूनी शिक्षा की रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर कायम है. वाइस चांसलर प्रो. डॉ. सुधीर कृष्णस्वामी के अनुसार ऐसा “अचानक नहीं हुआ बल्कि यह सुनियोजित योजना के जरिए” संभव हुआ है.
शिक्षकों और छात्रों के बारे में वे कहते हैं, “जब आप प्रतिभाशाली लोगों के इतने विविध समूह को एक साथ जोड़ते हैं, तो उससे बनने वाले शैक्षिक माहौल का बहुत अच्छा असर होता है.”
संस्थान को और ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए एजेंडे में दो अहम चीजें शामिल हैं: बुनियादी ढांचे की कमियों को दुरुस्त करना और ऐसी पहल करना जिसका बदलते कानूनी पेशे से तालमेल हो.
कृष्णस्वामी के अनुसार इस वर्ष के आखिर तक दो नए एकेडमिक ब्लॉक बनकर तैयार हो जाएंगे. ये ब्लॉक उस बड़े बदलाव का हिस्सा हैं जिसे 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.
इन विस्तारित बुनियादी सुविधाओं में नए हॉस्टलों की बिल्डिंग भी शामिल हैं जिनसे लगभग 3,000 छात्रों को सुविधा मिलेगी जबकि जुलाई 2026 तक कैंपस में छात्रों की संख्या 1,934 है. अभी इन छात्रों के लिए 118 फैकल्टी सदस्य हैं.


कृष्णस्वामी कहते हैं, “हम नए बेंचमार्क बनाने के लिए उत्साहित हैं जो न सिर्फ कानून की शिक्षा के लिए होगा बल्कि इस बारे में भी होगा कि यूनिवर्सिटी की शिक्षा सबके लिए सुलभ और समावेशी कैसे बनाई जाए.”
एकेडमिक मोर्चे की बात करें तो एनएलएसआइयू एआइ ट्यूटरिंग मॉडल के इस्तेमाल से बड़े पैमाने पर पायलट प्रोग्राम शुरू करने की योजना बना रहा है. कृष्णस्वामी कहते हैं, “इस फील्ड में दुनिया भर में बहुत सारे प्रयोग हो रहे हैं. मुझे खुशी है कि इस मामले में हम—एनएलएसआइयू—काफी अग्रणी हैं.
हमने एआइ प्लेटफॉर्मों को उतने ही असरदार तरीके से अपनाया और लागू किया है जितना और किसी ने. इस साल हम यूनिवर्सिटी के पढ़ाने और सीखने के तरीकों में तकनीक को और शामिल करने जा रहे हैं. कैलेंडर वर्ष के खत्म होने पर उम्मीद है कि हम बड़े इनिशिएटिव शुरू करने के लिए काफी अच्छी स्थिति में होंगे.”



एनएलएसआइयू इस सत्र में नया रिसर्च सेंटर शुरू करेगा जो भारत के कानूनी पेशे में समानता, सबको जोड़ने और न्याय को बढ़ावा देने का काम करेगा. इसका पहला प्रोजेक्ट विमेंस इनक्लूजन ऐंड लीडरशिप इन लॉ (विल) इनिशिएटिव है, जो तथ्य आधारित रिसर्च के जरिए इस प्रोफेशन में महिलाओं की भागीदारी में बुनियादी बाधाओं को सामने लाएगा.


देश में पंजीकृत 18 लाख वकीलों में से महज 15 फीसदी महिलाएं हैं, हालांकि वे हर साल भारत में निकलने वाले सभी लॉ ग्रेजुएट छात्रों का करीब 32 फीसदी होती हैं. कृष्णस्वामी कहते हैं, “हम इस काम में पूरी ताकत लगाना चाहते हैं और इस स्थिति को यथासंभव बदलने की कोशिश करना चाहते हैं. हम इन प्रयासों को लेकर बहुत उत्साहित हैं.”
वे मानते हैं कि नेशनल रैंकिंग में एनएलएसआइयू की प्रतिष्ठा विशिष्ट मौका भी है तो जिम्मेदारी भी. कृष्णस्वामी के अनुसार हमारा मिशन है, स्टैंडर्ड बनाए रखना, नए स्टैंडर्ड बनाना और हर कदम पर आगे बढ़ना.

