
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने अपने लिए एक बड़ा लक्ष्य तय किया है और वह है: अगले पांच वर्षों में दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों की गिनती में शामिल होना. उसका यह भरोसा उसकी हाल की प्रगति से पैदा हुआ है. पिछले चार साल में डीयू के नाम से मशहूर इस विश्वविद्यालय ने
क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में करीब 200 सीढ़ियों की छलांग लगाई है और यह 521वें स्थान से चढ़ते हुए 322वें स्थान पर पहुंच गया है.
विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर प्रोफेसर योगेश सिंह की नजर में रैंकिंग सफलता का महज एक पैमाना है और उनका फोकस सिर्फ आंकड़ों के पीछे भागने पर नहीं है. वे कहते हैं, “बड़ा मकसद एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाना है जहां रिसर्चर, इनोवेटर, आंत्रप्रेन्योर और सामाजिक रूप से जागरूक ग्रेजुएट तैयार हों.”


राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत यूनिवर्सिटी अपने पाठ्यक्रम को नए सिरे से तैयार कर रही है, अलग-अलग विषयों की साथ-साथ पढ़ाई को बढ़ावा दे रही है और रिसर्च, इनोवेशन और आंत्रप्रेन्योरशिप में निवेश कर रही है.
डीयू डॉक्टरेट करने वाले छात्रों का अब महज एकेडमिक पब्लिकेशन के आधार पर आकलन नहीं करेगा, बल्कि वह रिसर्च में एक्सीलेंस की परिभाषा का दायरा बढ़ा रहा है. जो छात्र पेटेंट कराएंगे, प्रोटोटाइप बनाएंगे, समाज पर इंपैक्ट डालने वाली टेक्नोलॉजी विकसित करेंगे या सफल स्टार्टअप खड़े करेंगे, उन्हें भी उतना ही एकेडमिक सम्मान मिलेगा.


विश्वविद्यालय की योजना होनहार छात्रों के उद्यमों को इनक्यूबेशन सुविधा, शुरुआती फंडिंग, कानूनी और अकाउंटिंग सपोर्ट तथा मेंटरिंग के जरिए मदद करने की है. प्रो. सिंह कहते हैं, “नौकरी तलाशने का नजरिया बदलना होगा और इसे रोजगार पैदा करने की तरफ ले जाना होगा.”
एनईपी लागू होने से सीखने के तरीकों में भी लचीलापन आया है. डीयू की मेजर-माइनर एकेडमिक व्यवस्था के तहत छात्रों को अब सिर्फ एक ही विषय तक सीमित रहने की जरूरत नहीं. जिस छात्र का मुख्य विषय अंग्रेजी है, वह चाहे तो सहायक विषय में जर्नलिज्म भी कर सकता है, और हिंदू स्टडीज पढ़ने वाला छात्र साथ में मैनेजमेंट या कंप्यूटर साइंस की भी पढ़ाई कर सकता है.


प्रो. सिंह कहते हैं, “हम शिक्षा को ज्यादा सहज और विकल्प वाली बना रहे हैं. छात्रों को एक ही एकेडमिक दायरे में बंधे रहने के बजाए अपनी पसंद के विषयों को जानने-समझने की आजादी होनी चाहिए.” नए वैल्यू-एडेड कोर्सों में भी शिक्षा की यह व्यापक परिभाषा नजर आती है.
फाइनेंशियल लिटरेसी सबसे लोकप्रिय कोर्स में से एक बनकर उभरा है, जिसे लगभग 30,000 छात्रों ने लिया है. पढ़ाने के तरीके भी बदल रहे हैं. फैकल्टी सदस्यों को लेक्चर वाले क्लासरूम से हटकर ज्यादा इंटरैक्टिव तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

उनसे कहा जा रहा है कि वे सिर्फ ब्लैकबोर्ड से पढ़ाई कराने के बजाए वीडियो, ग्राफिक्स और चर्चाओं को भी शामिल करें. प्रो. सिंह कहते भी हैं, हर लेक्चर ऐसा होना चाहिए जैसे “किसी वेब सीरीज का एपिसोड” हो, जिससे छात्र और ज्यादा जानने के लिए उत्सुक हों.
ऐसा ही एक और क्षेत्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का है जिसे विश्वविद्यालय बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं कर रहा. प्रो. सिंह एआइ को किसी खतरे के बजाए एक ऐसे तरीके के तौर पर देखते हैं जिसके साथ छात्रों को काम करना सीखना होगा.
डीयू अपने छात्रों को उन नौकरियों के लिए तैयार करना चाहता है जो अभी भले ही बिल्कुल न हों. इसके लिए वह आंत्रप्रेन्योरशिप, एआइ साक्षरता, क्रिटिकल थिंकिंग, फाइनेंशियल लिटरेसी, इनोवेशन, प्रॉब्लम-सॉल्विंग और अडैप्टेबिलिटी पर ध्यान दे रहा है.
आगे की सोचते हुए डीयू अपना भौतिक विस्तार भी कर रहा है. वह अगले एकेडमिक सेशन से नया कॉलेज शुरू करने की तैयारी में जुटा है, जिसमें कंप्यूटर साइंस, एआइ, डेटा साइंस और आंत्रप्रेन्योरशिप में भविष्य के हिसाब से प्रोग्राम पेश किए जाएंगे.
विश्वविद्यालय की एक और बड़ी ताकत उसका शानदार एलुमनाइ नेटवर्क है, जो राजनीति, बिजनेस, शिक्षा जगत, कला, मीडिया और सिविल सर्विस जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है. यह नेटवर्क डीयू के छात्रों को अलग-अलग क्षेत्रों के कामयाब प्रोफेशनल्स से जोड़ता है और कैंपस से भी आगे विश्वविद्यालय के दबदबा को बढ़ाता है.

