
पनडुब्बियों को पूरब की ओर भेजकर पाकिस्तान भारत को अपने दोनों मोर्चों की एक साथ रक्षा करने को मजबूर करेगा. बंगाल की खाड़ी में चीन-पाकिस्तान की समुद्री मौजूदगी भारत के लिए खतरा है.
भारत का पूर्वी किनारा हाल के वर्षों में भू-रणनीति की ज्वलंत जमीन बनकर उभरा है. लड़ाकू विमान और ड्रोन के लिए चीन के साथ बांग्लादेश के रक्षा सौदे और बंदरगाहों तथा हवाई क्षेत्रों को उन्नत बनाने के समझौते, साथ ही बांग्लादेश में पाकिस्तानी रक्षा और खुफिया मौजूदगी, सब इसी तरफ इशारा कर रहे हैं. दरअसल, संघर्ष के परिदृश्य पर बात करते हुए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अगस्त 2025 में कहा था, “हम पूरब से शुरू करेंगे...” पाकिस्तान भारत के अभी तक सुरक्षित पूर्वी तटों पर ठोस समुद्री उकसावों का संकेत दे रहा है.
पाकिस्तान के लिए चीन में बनाई जा रही हैंगोर श्रेणी की आठ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में से पहली अप्रैल में पाकिस्तानी नौसेना में कमिशन की गई. पिछले महीने यह चीन से कोलंबो होते हुए कराची पहुंची. कोलंबो में एक नौसैनिक कार्यक्रम में पीएनएस हैंगोर के मिशन एस्कोर्ट कमांडर कमोडोर उमर फारूक ने कहा कि नई पनडुब्बी से पाकिस्तान “बंगाल की खाड़ी में मौजूदगी बनाए रख सकेगा.”
भारत ने इसे गौर से सुना क्योंकि अगर यह सच है तो 1971 की जंग में अपने हाथ से पूर्वी समुद्री नियंत्रण खोने के बाद उस इलाके में यह पाकिस्तान की पहली नौसैनिक मौजूदगी होगी.
तकरीबन 26 लाख वर्ग किमी में फैला बंगाल की खाड़ी का इलाका भारत की समुद्री सुरक्षा के लिहाज से केंद्रीय अहमियत रखता है. विशाखापत्तनम में भारत की पूर्वी नौसैन्य कमान और भारत का बेहद गोपनीय एटमी पनडुब्बी अड्डा आइएनएस वर्षा इसी इलाके में है.
पाकिस्तानी पनडुब्बी की मौजूदगी से इन प्रतिष्ठानों की निगरानी से जुड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाली संचार की प्रमुख समुद्री लाइने यहीं से होकर गुजरती हैं. ऐसे में यहां पाकिस्तान की कोई भी नौसैन्य मौजूदगी निश्चित तौर पर खतरा है.
नौसेना के पर्यवेक्षकों का कहना है कि हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियों—चीन की युआन श्रेणी की पनडुब्बियों का निर्यात संस्करण—की बदौलत पाकिस्तान उत्तरी हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में गोपनीय अभियानों को अंजाम दे पाएगा. अहम बात यह कि ये पनडुब्बियां एअर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआइपी) प्रणाली से लैस हैं, जिसकी बदौलत गैर-एटमी पनडुब्बियां लगातार तीन हफ्तों तक पानी में डूबी रह सकती हैं.
विशेषज्ञ जोर देकर कहते हैं कि पाकिस्तान इन पनडुब्बियों का मुंह पूरब की तरफ रखकर भारत को पश्चिमी और पूर्वी दोनों समुद्रतटों की रक्षा एक साथ करने के लिए मजबूर कर देगा.
हिंद महासागर में लगातार आक्रामक होती जाती चीन की गश्त के बीच पाकिस्तान का चीनी मूल की पनडुब्बियों का बेड़ा पीपल्स लिबरेशन आर्मी नैवी (पीएलएएन) के साथ मिलकर काम करने की उसकी क्षमता में खासा इजाफा ला सकता है. इस तरह बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तान-चीन की लगातार समुद्री मौजूदगी का उभार भारत के लिए ज्यादा चिंता की बात है. संघर्ष की स्थिति में खाड़ी में मौजूद ये पनडुब्बियां व्यापारिक जहाजों और नौसैन्य अभियानों के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं, जिनमें अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की तरफ जाने वाले रास्ते भी शामिल हैं.
नौसैन्य विशेषज्ञ बताते हैं कि पाकिस्तानी पनडुब्बियां 1971 से उत्तरी अरब सागर तक सिमटी रहीं. उस वक्त पीएनएस गाजी को कराची से बंगाल की खाड़ी में तैनात गया था, जहां वह डूबने से पहले कई दिनों तक विशाखापत्तनम के पास गश्त करती रही थी.
पाकिस्तान की ताकत
भारत के समुद्री वर्चस्व का मुकाबला करने और अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए पाकिस्तान अपनी नौसेना को आधुनिक बनाने के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम पर आगे बढ़ रहा है. इसमें नए फ्रिगेट, कॉर्वेट, लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान और साइबर तथा अंतरिक्ष को जोड़ना शामिल है. चीन-निर्मित हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां इनमें सबसे प्रमुख हैं. पाकिस्तान ने पहली पनडुब्बी पीएनएस हैंगोर नौसेना में शामिल कर ली है, जबकि पीएनएस/एम शुशुक, पीएनएस/एम मैंग्रो और पीएनएस/एम गाजी जल्द शामिल की जाएंगी.
इन पनडुब्बियों में एआइपी के साथ उन्नत सेंसर, भारी टॉरपीडो और ऐंटी-शिप मिसाइलें, और एटमी क्षमता से लैस बाबर-3 क्रूज मिसाइलें लगी हैं. लंबे वक्त तक समुद्र में टिके रहने की क्षमता में यह उछाल पाकिस्तान को अपने देश से दूर कार्रवाई करने और सेकंड-स्ट्राइक या जवाबी हमला करने का विकल्प देता है.
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा का मानना है कि हैंगोर पनडुब्बियां अगर दोबारा ईंधन लिए बिना जरूरी दूरी तक जा सकती हैं, तो उन्हें खाड़ी या पूर्वी हिंद महासागर में तैनात किया जा सकता है. हालांकि इसका असर तब तक सीमित ही रहेगा जब तक यह संचालन के दौरान किसी बंदरगाह पर जरूरी रखरखाव और तैयारी नहीं कर पाती. वे कहते हैं, “हमें इसका आकलन करना होगा कि इनमें से कितनी पनडुब्बियां संचालन के लिए तैयार और उपलब्ध हैं और उनकी तैनाती के सबसे संभावित क्षेत्र कौन-से हैं.
अगर हैंगोर को पूर्वी तट पर किसी बंदरगाह के नजदीक तैनात किए जाने की संभावना पर बात हो रही है तो उस इलाके में पनडुब्बी-विरोधी अभियानों को तेज करने की जरूरत होगी.”
लांबा की बात से पूर्व पनडुब्बी नाविक वाइस एडमिरल ए.के. सिंह इत्तेफाक रखते हैं. उनका कहना है कि ऐसी तैनातियां तभी संभव हैं जब पाकिस्तान बांग्लादेश में ईंधन भरने की व्यवस्था हासिल कर पाए. हालांकि वे यह जरूर मानते हैं कि लंबी दूरी की तैनातियों के लिए हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियों का भरोसेमंद ढंग से संचालन करने की महारत हासिल करने में पाकिस्तान नौसेना को सालों लगेंगे.
भारतीय सैन्य विशेषज्ञों को लगता है कि हैंगोर को जिस बंदरगाह से मदद मिलने की सबसे ज्यादा संभावना है, वह कॉक्स बाजार के नजदीक बांग्लादेश का धुर पूर्वी नौसैन्य अड्डा बीएनएस पेकुआ है. अगर पाकिस्तान को टर्नअराउंड यानी रखरखाव और तैयारी के लिए इस अड्डे तक पहुंच मिल जाती है, तो हैंगोर का गश्ती समय काफी बढ़ जाएगा.
अलबत्ता ऐसे बंदरगाह पर आने से भारत के लिए पनडुब्बी की आवाजाही पर नजर रखना आसान हो जाएगा. वह अपनी चौंकाऊ और स्टेल्थ क्षमता गंवा बैठेगी, जिसको किसी पनडुब्बी की सबसे बड़ी ताकत कहा जा सकता है.
पाकिस्तान को पेकुआ नौसैन्य अड्डे तक पहुंच मिलने की संभावना दूर की कौड़ी नहीं. खासकर 2024 में शेख हसीना की हुकूमत के पतन के बाद ढाका-इस्लामाबाद के रिश्तों में आए उल्लेखनीय सुधार के बाद तो यह और भी संभव है. कूटनीतिक और सैन्य आदान-प्रदान बढ़ा है और साथ ही रक्षा सहयोग ज्यादा व्यापक हुआ है.
नवंबर 2025 में पाकिस्तान नौसेना के फ्रिगेट पीएनएस सैफ ने चटगांव में पड़ाव डाला. यह 1971 के बाद किसी भी पाकिस्तानी युद्धपोत की पहली बांग्लादेश यात्रा थी. फरवरी 2025 में बांग्लादेश और पाकिस्तान ने उत्तरी अरब सागर में हुए संयुक्त युद्धाभ्यास अमन में भी हिस्सा लिया.
ऐसे आदान-प्रदान से पता चलता है कि बगैर किसी विधिवत गठजोड़ के भी रक्षा संबंध धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं. यह रणनीति भारत के चारों तरफ प्रभाव बढ़ाने की चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति से मेल खाती है.
दमदार दखलअंदाज
सेना को आधुनिक बनाने में बांग्लादेश का अव्वल साझेदार चीन है. फोर्सेज गोल 2030 पहल के तहत बीजिंग ने उसे मिंग श्रेणी की दो टाइप 035जी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां दीं और बीएनएस पेकुआ पनडुब्बी ठिकाने का निर्माण किया, जिसका उद्घाटन 2023 में हुआ. पूरे रखरखाव और मरम्मत की क्षमताओं के साथ यहां छह पनडुब्बियां और आठ युद्धपोत रखने की जगह है. चीनियों के हाथों उन्नत बनाए गए बांग्लादेश के चटगांव और मोंगला बंदरगाहों के साथ पेकुआ बीजिंग की व्यापक हिंद महासागरीय रणनीति का हिस्सा है.
पाकिस्तान की ज्यादातर नौसैन्य परिसंपत्तियां चीनी मूल की हैं और ऐसे में चीन-पािकस्तान रिश्तों को साथ रखकर देखें तो यह उभरती नौसैन्य धुरी क्षेत्रीय समुद्री माहौल में पेचीदगी के नए पहलू जोड़ती है.
इसके अलावा चीनी निवेश की बदौलत बांग्लादेश, बताते हैं कि नई दिल्ली के सरोकारों की परवाह किए बिना लालमोनीरहाट में एक एअरबेस और नजदीक ही उत्तर बांग्लादेश में सामरिक तौर पर संवेदनशील सिलिगुड़ी गलियारे से महज 16 किमी दूर एक हैंगर विकसित कर रहा है. सिलिगुड़ी गलियारा भारत का 22 किमी चौड़ा जमीनी रास्ता है जो महादेश को उसके आठ उत्तरपूर्वी राज्यों से जोड़ता है.
दक्षिणी नौसैन्य कमान के पूर्व प्रमुख रियर एडमिरल अनिल चावला ऐसी शांतिकालीन गतिविधियों और युद्धकालीन गतिविधियों के बीच फर्क करते हैं, जब ढाका को युद्ध में घसीटा जा सकता है—हालांकि ऐसा होने की संभावना कम ही है. इसीलिए बांग्लादेश के साथ मजबूत रिश्ते बनाना भारत के लिए जरूरी है. वे कहते हैं, “हमें दोनों तटों पर बराबर ध्यान देना होगा, जिसका मतलब है ज्यादा संसाधन.
एआइपी से लैस पनडुब्बियों की टिकाऊ क्षमता सीमित होती है, और बंगाल की खाड़ी पाकिस्तान से काफी दूर है. युद्ध के समय उन्हें सपोर्ट सुविधाएं मिलने की संभावना नहीं है. हमें इसे ही रोकना होगा.”
क्षमताएं भारत की
समुद्र पर प्रतिरोधक शक्ति का पूरा जो आर्किटेक्चर है उसमें पानी के भीतर युद्ध की भारत की क्षमता उसके सबसे मजबूत स्तंभों में से एक है. नौसेना पारंपरिक और एटमीशक्ति से संचालित पनडुब्बियों के बढ़ते बेड़े का संचालन करती है. निगरानी के उन्नत नेटवर्क, समुद्री गश्ती विमान और रणनीतिक जगहों पर स्थित सैन्य अड्डे उसे सहारा देते हैं.
विशाखापत्तनम की पूर्वी नौसैन्य कमान की बदौलत भारत बेहद अहम समुद्री रास्तों की निगरानी करता है, सामरिक प्रतिष्ठानों की हिफाजत करता है और बंगाल की खाड़ी में पानी के नीचे विश्वसनीय मौजूदगी कायम रखता है.
अंडमान और निकोबार कमान भारतीय सुरक्षा को और मजबूती प्रदान करती है. यह देश में तीनों सेनाओं की एकमात्र एकीकृत कमान है. मलक्का जलडमरूमध्य के संकरे समुद्री रास्ते के पास यह पूर्वी हिंद महासागर में नौसैन्य आवाजाही पर नजर रखती है. इसके अलावा उपग्रहों से जासूसी, लंबी दूरी के गश्ती विमान, समुद्री सतह पर लड़ने वाले युद्धपोत और पनडुब्बी विरोधी युद्धक क्षमताओं के साथ भारत पानी के नीचे परतदार सुरक्षा नेटवर्क बनाए रखता है.
पानी के नीचे भारत की प्रतिरोधक क्षमताओं के केंद्र में अरिहंत श्रेणी की दो एटमी शक्ति से संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (एसएसबीएन) हैं जो देश की एटमी त्रिकोण का हिस्सा हैं. भारत ने फ्रांसीसी मूल की कलवारी श्रेणी की पनडुब्बियों समेत अपनी पारंपरिक पनडुब्बियों के बेड़े के विस्तार की योजना बनाई है. साथ ही जर्मन जहाज निर्माता थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) के साथ मिलकर एआइपी टेक्नोलॉजी से युक्त छह डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के निर्माण की योजना भी आगे बढ़ रही है.
पूरब में पाकिस्तान का बढ़ना फिलहाल उसके इरादे का संकेत भर है. फिर भी नई पनडुब्बियों, बांग्लादेश के साथ रिश्तों में सुधार और चीनी हितों के साथ तालमेल से समुद्री सुरक्षा को लेकर इस्लामाबाद के इरादे की झलक मिलती है. भारत इसका जवाब कैसे देता है, कूटनीति के जरिए, निगरानी और जासूसी बढ़ाकर और अपनी नौसेना को ज्यादा मजबूत बनाकर, इसी से पूर्वी हिंद महासागर का सुरक्षा माहौल तय होगा.
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा (रिटायर्ड) मानते हैं कि अगर ऐसा लगता है कि पूर्वी तट पर बंदरगाह के पास हैंगोर की तैनाती का अंदेशा है तो उस इलाके में ऐंटी-सबमरीन अभियानों को तेज करने की जरूरत होगी.

समुद्र में दुश्मन का दांव
भारत, चीन और पाकिस्तान की पनडुब्बी क्षमताओं की तुलना
भारत
> एटमीशक्ति से संचालित बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (एसएसबीएन)
संख्या: 2 (आइएनएस अरिहंत, आइएनएस अरिघात और साथ में निर्माणाधीन आइएनएस अरिदमन).

पहली बार 2016 में शामिल ये पनडुब्बियां अंतरमहाद्वीपीय एटमी बैलिस्टिक मिसाइलें दाग सकती हैं.
लीज पर लिया आइएनएस चक्र रूस को लौटाने के बाद भारत के पास कंवेंशनल ऑपरेशन के लिए कोई न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बी (एसएसएन) नहीं है. लीज पर दूसरी एसएसएन आइएनएस चक्र की डिलिवरी में देरी हो रही. प्रोजेक्ट 77 के तहत दो एसएसएन बनाने की योजना.
> डीजल इलेक्ट्रिक सबमरीन (एसएसके)
संख्या: 6
कलवारी श्रेणी (स्कोरपीन क्लास) फ्रांस के साथ निर्मित और 2017 में नौसेना में शामिल. एअर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआइपी) टेक्नोलॉजी से युक्त तीन और पनडुब्बियां बनाने की योजना. पुरानी पनडुब्बियों में एआइपी रेट्रोफिट किया जाएगा. एक्सोसेट एंटी-शिप मिसाइल और एमआइसीए ऐंटी-एअर मिसाइलों से लैस
विशेष: प्रोजेक्ट 75(I) के तहत उन्नत एआइपी के साथ तीन एसएसके भारत में ही बनाने के लिए जर्मन फर्म टीकेएमएस संग बातचीत अगले चरण में.

> शिशुमार श्रेणी
संख्या: 4
जर्मन मूल की ये पनडुब्बियां ऐंटी-सरफेस, ऐंटी-सबमरीन युद्ध के लिए आदर्श हैं. टिकाऊ क्षमता अच्छी. हारपून ऐंटी-शिप क्रूज मिसाइलों से लैस.
सिंधुघोष श्रेणी (किलो क्लास)
संख्या: 7
रूसी मूल की आक्रामक पनडुब्बियां 1986 में नौसेना में शामिल की गईं. ऐंटी-शिप क्रूज मिसाइलें दाग सकने में सक्षम.
चीन
> जिन श्रेणी (एसएसबीएन)
संख्या: 6
2007 में कमिशन. चीन की एटमी प्रतिरोधक क्षमता का अहम हिस्सा. 7,000 किमी दूरी की 12 जेएल-2 आइसीबीएम ले जाने में सक्षम.
अगली पीढ़ी की टैंग श्रेणी की एसएसबीएन में बेहतर स्टेल्थ क्षमता और ज्यादा लंबी दूरी की आइसीबीएम होंगी.

> शांग श्रेणी (एसएसएन)
संख्या: 9
2006 में कमिशन, एटमी शक्ति से संचालित इन अटैक सबमरीन में उन्नत सेंसर लगे हैं, वाइजे-18 और वाइजे-82 क्रूज मिसाइलें ले जाने में सक्षम. निर्माणाधीन ‘सुई’ श्रेणी की एसएसएन में नवीनतम टेक्नोलॉजी होगी.
> सोंग श्रेणी (एसएसके)
संख्या: 13
ये डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बियां 1999 और 2006 के बीच नौसेना में शामिल की गईं. टॉरपीडो और ऐंटी-शिप मिसाइलें ढोने में सक्षम.
> युआन श्रेणी (एसएसके)
संख्या: 20
एआइपी प्रणालीयुक्त ये पनडुब्बियां चीन के पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े की रीढ़. बेहतर स्टेल्थ क्षमताओं से युक्त नई किस्में लाई जा रहीं. चीन के पास मिंग क्लास चार पुरानी एसएसके भी.
पाकिस्तान
> हैंगोर श्रेणी (एसएसके)
संख्या: 1
यह चीन की युआन श्रेणी की एसएसके की निर्यात संस्करण हैं. डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां एआइपी से लैस हैं और ये पानी के नीचे पाकिस्तान की पहुंच में इजाफा करती हैं. आठ का ऑर्डर दिया गया है, जिनमें से पीएनएस हैंगोर शामिल कर ली गई है. तीन और आने वाली हैं.

>खालिद श्रेणी (एसएसके)
संख्या: 3
फ्रांसीसी अगोस्ता 90बी डीजल अटैक पनडुब्बियां 1999 और 2006 के बीच शामिल की गईं. एआइपी प्रणालियों और एक्जोसेट मिसाइलों से लैस. पाकिस्तान हशमत श्रेणी (अगोस्ता 70) की दो पुरानी एसएसके भी संचालित करता है.

