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हुनर का भारी मुगालता

हुनर के मामले में चौड़ी खाई पाटने के मकसद से शुरू होने के दशक भर बाद प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर कैग ने अब सवाल उठाए हैं.

THE BIG STORY PMKVY
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 3 अगस्त , 2026

इस साल जून के शुरू में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के.सी. वेणुगोपाल की अध्यक्षता वाली संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने नरेंद्र मोदी सरकार के प्रमुख स्किलिंग कार्यक्रम प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाइ) पर ध्यान केंद्रित किया.

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की सख्त परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर समिति ने योजना के अमल में गंभीर कमियां गिनाते हुए कहा कि यह अपने घोषित उद्देश्यों से काफी पीछे रह गई है.

पंद्रह जुलाई, 2015 को शुरू पीएमकेवीवाइ का उद्देश्य लाखों भारतीय युवाओं को उद्योगों से जुड़े हुनर की ट्रेनिंग और औपचारिक प्रमाणपत्र देना था, ताकि तालीम और रोजगार की काबिलियत के बीच की दूरी कम हो सके. लेकिन दिसंबर 2025 में संसद में पेश कैग ऑडिट रिपोर्ट ने योजना के पहले तीन चरणों (2015 से 2022) तक के कामकाज पर गहरे सवाल उठा‌ दिए. इसमें ऐसे ट्रेनिंग सेंटर सामने आए जो मौजूद ही नहीं थे.

अनुपस्थित उम्मीदवार, लाभार्थियों की उल्टी-सीधी प्रोफाइल, फर्जी बैंक खाते, ट्रेनिंग की असमान गुणवत्ता और थर्ड-पार्टी मूल्यांकन की कमजोर व्यवस्था मिली. आठ राज्यों में ट्रेनिंग के बाद होने वाले आकलन में साढ़े तीन साल तक की देरी हुई.

बिहार, ओडिशा और राजस्थान में उम्मीदवारों का आकलन कर लिया गया, जबकि वे अनिवार्य 70 फीसद उपस्थिति की शर्त पूरी ही नहीं करते थे. केरल में दो ट्रेनिंग प्रोवाइडर्स ने सरकारी प्रोत्साहन पाने के लिए प्लेसमेंट रिकॉर्ड में फर्जीवाड़ा किया.

योजना का चौथा चरण, पीएमकेवीवाइ 4.0, अप्रैल 2022 से लागू है. फिर भी जिसे हुनर के मामले में बदलाव लाने वाली एक व्यापक पहल के रूप में सोचा गया था, वह लचर क्रियान्वयन और आधे-अधूरे नतीजों के वही चिर-परिचित चक्र में फंसती दिखती है. ऐसे में बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार के काबिल बना पाने की इसकी क्षमता पर सवाल उठते हैं.

इधर पीएसी ने जवाबदेही तय किए जाने का मसला उठाया है, उधर इसे लागू करने वाली एजेंसी नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएसडीसी) ने कार्रवाई तेज कर दी है—खेला करने वाले ट्रेनिंग पार्टनरों को उसने ब्लैकलिस्ट किया है, कुछ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है, मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों को नोटिस जारी किए हैं.

ऊंची दुकान, फीके पकवान
राष्ट्रीय कौशल मिशन की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता. भारत के कार्यबल—करीब 56.5 करोड़—में मुख्य रूप से युवा हैं, और आबादी का करीब 65 फीसद हिस्सा 35 साल से कम उम्र का है. कागज पर यह जनसांख्यिकीय तस्वीर एक पीढ़ी में एक बार मिलने वाला मौका देती है.

सच यह है कि कामगारों के एक बड़े हिस्से के पास आधुनिक अर्थव्यवस्था की मांग के मुताबिक हुनर नहीं है. जून 2025 में इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटीटिवनेस की ओर से जारी रिपोर्ट ‘स्किल्स फॉर द फ्यूचर: ट्रांसफॉर्मिंग इंडियाज वर्कफोर्स लैंडस्केप’ के मुताबिक, आज भारत के कार्यबल (15 से 59 वर्ष आयु वर्ग) में से सिर्फ चार फीसद औपचारिक व्यावसायिक ट्रेनिंग प्राप्त हैं, जबकि करीब 88 फीसद अब भी कम दक्षता वाली नौकरियों में लगे हैं.

इसी खाई को पाटने के लिए सरकार ने 2015 में स्किल इंडिया मिशन शुरू किया था, जिसमें पीएमकेवीवाइ इसका प्रमुख कार्यक्रम था. यह योजना काफी हद तक पैनल में शामिल केंद्रों पर चलने वाले शॉर्ट-टर्म ट्रेनिंग (एसटीटी) कोर्सों पर निर्भर है—200 से 600 घंटे के और अमूमन छह महीने तक चलने वाले.

इसमें स्कूल और कॉलेज छोड़ चुके युवाओं तथा बेरोजगारों को लक्ष्य बनाया जाता है. फिर रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग (आरपीएल) है, जो ऑनलाइन/ऑफलाइन कैंपों, नियोक्ताओं के परिसरों आदि में ब्रिज कोर्सों के जरिए श्रमिकों का कौशल बढ़ाता है. तीसरे हैं स्पेशल प्रोजेक्ट्स (एसपी), जो कमजोर समूहों या खास उद्योगों को लक्ष्य बनाते हैं.

पहले तीन चरणों में कुल आवंटन 14,449 करोड़ रु. हुआ. इसमें से 10,194 करोड़ रु. जारी हुए और 9,261 करोड़ रु. खर्च किए गए. ट्रेनिंग के बाद थर्ड-पार्टी आकलन पास करने पर 1.32 करोड़ उम्मीदवारों के लक्ष्य में से 1.1 करोड़ को प्रमाणित किया गया. यानी कागज पर 83 फीसद उपलब्धि दर.

फिर भी इस योजना का सबसे अहम नतीजा यानी प्लेसमेंट इसकी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बना हुआ है. कैग के मुताबिक, पीएमकेवीवाइ 1.0 के दौरान प्रमाणित 13.3 लाख नए उम्मीदवारों में से केवल 2.23 लाख (16.7 फीसद) को नौकरी मिली. पीएमकेवीवाइ 2.0 में प्लेसमेंट दर सुधरकर 51.1 फीसद हुई.पर पीएमकेवीवाइ 3.0 में गिरकर फिर 13.5 फीसद पर आ पहुंची.
 
योजना में लोग कम, काम ज्यादा
एमएसडीई यानी कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय नवंबर 2014 में बना था. अगले साल जब इसकी प्रमुख योजना पीएमकेवीवाइ शुरू की गई, उस वक्त मंत्रालय के पास सीमित मानव संसाधन था.

योजना को शुरू से अंत तक लागू करने के लिए जिम्मेदार केंद्रीय एजेंसी एनएसडीसी को भी पीएमकेवीवाइ जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की निगरानी के लिए राज्यों में तेजी से अपनी क्षमता खड़ी करनी पड़ी. नतीजाः शुरुआती वर्षों में राज्यों के साथ तालमेल और बड़े पैमाने पर योजना लागू करने की क्षमता उतनी नहीं बन पाई. मंत्रालय की निगरानी भी सीमित रही.

एमएसडीई के एक पूर्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर इंडिया टुडे से बातचीत में शुरुआती कई कमियों की वजह एनएसडीसी के राज्य-स्तरीय कार्यालयों की कमी को बताया. वे कहते हैं, “सभी राज्यों में ग्राउंड लेवल पर काम करने वाले उनके पास 40-45 कर्मचारी ही थे, जिससे निगरानी बेहद मुश्किल हो गई.”

उस समय तकनीक-आधारित निगरानी व्यवस्था शुरू नहीं हुई थी, सो प्रशिक्षण केंद्रों का भौतिक सत्यापन ही निगरानी का एकमात्र तरीका था. उत्तर प्रदेश और बिहार सरीखे बड़े राज्यों में एनएसडीसी के पास दर्जनों जिलों की निगरानी के लिए सिर्फ दो-तीन कर्मचारी थे. उक्त अधिकारी पूछते हैं, “एक आदमी 15-20 जिलों को ठीक से कैसे कवर कर सकता है?”

नियामकीय ढांचा भी देर से आया. कैग रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्षेत्र का नियामक नेशनल काउंसिल फॉर वोकेशनल एजुकेशन ऐंड ट्रेनिंग (एनसीवीईटी) 2018 में ही स्थापित हुआ, और इसके सदस्यों ने अप्रैल 2021 में पूर्णकालिक जिम्मेदारी संभाली. तब तक पीएमकेवीवाइ कई साल चल चुकी थी.

योजना खुद चरणों में आगे बढ़ी. पीएमकेवीवाइ 1.0 को 2015-16 में साल भर के लिए शुरू किया गया था. पीएमकेवीवाइ 2.0 के तहत कार्यक्रम का पैमाना बढ़ाया गया, जो 2016 से 2020 तक चला और बाद में जनवरी 2021 तक बढ़ाया गया. इसके बाद पीएमकेवीवाइ 3.0 आया, जिसने 2021-22 की अवधि को कवर किया.

हर चरण में डिजाइन से जुड़े बदलाव किए गए, कई बार उस वक्त जब ट्रेनिंग चल रही थी. बीच रास्ते में टेक्नोलॉजी के नए पहलू जोड़े गए, जिससे अमल और जटिल हो गया. नाम न छापने की शर्त पर एनएसडीसी की एक पूर्व कर्मचारी बताती हैं, उस समय इंडिया स्टैक—आधार से लेकर यूपीआइ और डिजिलॉकर तक एकीकृत डिजिटल सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर—तैयार ही हो रहा था.

“सिस्टम शुरुआती अवस्था में थे और हमें पक्का करना था कि निगरानी, ट्रेनिंग प्रोवाइडर्स, प्रशिक्षुओं के डेटा, आधार और बैंक खातों से जुड़े बैकएंड पोर्टल राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ें.”

ये चुनौतियां भुगतान व्यवस्था में भी सामने आईं. कैग रिपोर्ट के मुताबिक, अक्तूबर 2024 तक पीएमकेवीवाइ 2.0 और 3.0 के तहत प्रमाणित उम्मीदवारों में से केवल 63.75 फीसद—96 लाख में से 61 लाख—को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए उनका भुगतान मिला था. बाकी प्रमाणित उम्मीदवारों को भुगतान अधूरी या गायब जानकारी के कारण लंबित था.

यह स्थिति तब थी, जब स्किल इंडिया पोर्टल पर पीएमकेवीवाइ के लिए नामांकन के समय उम्मीदवार का विवरण भरना अनिवार्य था, जिसमें मोबाइल नंबर, बैंक खाता नंबर और ईमेल शामिल थे, ताकि प्रमाणन के बाद 500 रुपए का प्रोत्साहन डीबीटी के जरिए दिया जा सके.

पीएमकेवीवाइ 2.0 और 3.0 के डेटा के विश्लेषण से पता चला कि 94.5 फीसद मामलों में बैंक खाते वाला फील्ड शून्य, ‘रद्द’, ‘उपलब्ध नहीं’ से भरा था या खाली छोड़ा गया था. मंत्रालय ने कैग को बताया कि बैंक खाते की जानकारी शुरू में अनिवार्य थी, लेकिन अमल की चुनौतियों के कारण इस शर्त में ढील देनी पड़ी.

योजना की कमी
इस योजना की डिजाइन संबंधी बुनियादी कमजोरियों में से एक थी उसकी छोटी योजना अवधि. ट्रेनिंग के लक्ष्य साल-दर-साल तय किए गए. हालांकि योजना को लगातार चलाने का इरादा था लेकिन कैग रिपोर्ट कहती है कि मंत्रालय ने “कोई लंबी अवधि की रणनीति या परिप्रेक्ष्य योजना तैयार नहीं की”.

पीएमकेवीवाइ 2.0 और 3.0 के तहत लक्ष्य रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) के जरिए आवंटित किए गए, जिसमें ट्रेनिंग प्रोवाइडर्स (टीपी) को अपनी योजनाएं बताने को कहा गया, जिन्हें बाद में मंत्रालय की संचालन समिति ने मंजूरी दी. सिद्धांत रूप में इससे निगरानी पुख्ता होती थी; व्यवहार में इसने समयसीमा को तंग बना दिया और अनिश्चित भी.

टीपी के लिए यह स्थिति कैसे बनी, दिल्ली की इंडियाविजन रियल्टी ऐंड इन्फ्रास्ट्रक्चर के निदेशक विवेक सिंह इसका खुलासा करते हैं. उनकी कंपनी निर्माण क्षेत्र में टीपी है. बजट में फंड आवंटन की घोषणा हो जाती थी पर लक्ष्य और पैसा अक्सर अगस्त तक आता था. कभी-कभी तो नवंबर तक. इससे टीपी के पास प्रशिक्षकों को नियुक्त करने, उम्मीदवारों को जुटाने और उसी वित्तीय वर्ष के भीतर ट्रेनिंग पूरी करने के लिए सिर्फ 4-5 महीने बचते थे.

रुक-रुक कर चलने वाले इस चक्र ने टिकाऊ निवेश को मुश्किल बना दिया. साल के लगभग आधे हिस्से में कई केंद्रों के पास कोई काम नहीं होता था. कुछ ने इसका शॉर्टकट रास्ता निकाला: किराए की जगहों से काम करना और ऐसे कोर्स चलाना, जिनमें न्यूनतम इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिए. प्रशिक्षकों को अक्सर 2-3 महीने के छोटे कॉन्ट्रैक्ट पर रखा जाता था, जो अनुभवी प्रशिक्षकों के लिए उत्साहजनक बिल्कुल न था.

कोर्स बस संख्यात्मक लक्ष्य पूरे करने को, अक्सर उद्योग की जरूरतों की बजाए उम्मीदवारों की मांग के आधार पर चलाए गए. एक ट्रेनिंग फर्म के प्रमुख इंडिया टुडे से कहते हैं, “हमने लैब बनाने में सातेक लाख रुपए लगाए थे और 1.2 लाख रुपए किराया दे रहे थे. कोई वास्तविक खिलाड़ी टिके कैसे?”

इंसेंटिव स्ट्रक्चर ने इन तरकीबों को और मजबूत किया. टीपी की जिम्मेदारी सिर्फ केंद्र चलाने और कोर्स कराने तक सीमित नहीं, बल्कि प्लेसमेंट पक्का करना भी है. पीएमकेवीवाइ 2.0 के तहत उन्हें नामांकन, प्रमाणन और प्लेसमेंट से जुड़े 50:30:20 अनुपात में भुगतान किया जाता था.

तीसरे चरण में यह बदलकर 40:30:30 हो गया—यानी प्रशिक्षु को रोजगार मिलने से पहले ही लागत का बड़ा हिस्सा वसूल किया जा सकता था. एक प्रोवाइडर कहते हैं, “ट्रेनिंग प्रोवाइडर्स ने नामांकन और प्रमाणन प्रोत्साहनों के इर्द-गिर्द बिजनेस मॉडल बना लिए, यह मानकर कि प्लेसमेंट संबंधी भुगतान शायद न भी आए.”

नौकरी की राह के रोड़े
सभी ट्रे‌‌निंग प्रोवाइडर्स नौकरी दिलाने के मामले में बराबरी की स्थिति में नहीं होते. मसलन, बिहार या पूर्वोत्तर के दूरदराज के जिलों में उद्योगों की मौजूदगी नाम की ही है. ज्यादातर नौकरियां पश्चिमी और दक्षिण भारत में हैं.

देशभर में व्यावसायिक कौशल ट्रेनिंग देने वाली कंपनी लर्नेट स्किल्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ आर.सी.एम. रेड्डी कहते हैं कि पीएमकेवीवाइ के तहत वे करीब 70 फीसद प्लेसमेंट दर इसलिए हासिल कर पाए क्योंकि स्किलिंग उनका मुख्य कारोबार है. वे बताते हैं, “हम पहले उद्योग के पास जाते हैं, नौकरी की जरूरतों को समझते हैं, उसके बाद ट्रेनिंग शुरू करते हैं. जब तक हमारे हाथ में नौकरियां नहीं होतीं, कार्यक्रम शुरू नहीं करते.”

फिर भी उम्मीदवारों को ट्रे‌निंग में बनाए रख पाना मुश्किल होता है. चूंकि ट्रेनिंग मुफ्त है और उम्मीदवारों का अपना पैसा दांव पर नहीं लगा होता, सो जरा-सी भी असुविधा उनके आना बंद करने के लिए काफी होती है. लर्नेट के सीओओ अभिषेक सिंह कहते हैं कि उनके ट्रेनर अक्सर दूसरे राज्यों तक में भी उम्मीदवारों के साथ इंटरव्यू तक जाते हैं और नौकरी के पहले हफ्ते तक उनके साथ होते हैं, ताकि वे बीच में न छोड़ें.

एमएसडीई के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि रोजगार की योग्यता सिर्फ ट्रेनिंग पर निर्भर नहीं. इसमें व्यापक आर्थिक हालात और उम्मीदवारों की काम के लिए दूसरी जगह जाने की इच्छा भी शामिल हैं.

वे बताते हैं कि बहुत-से लोग काम के लिए दूसरी जगह जाने में सहज महसूस नहीं करते, जिससे रोजगार के पहले दो महीनों के भीतर ड्रॉपआउट दर ऊंची हो जाती है और प्लेसमेंट के नतीजे कमजोर पड़ते हैं. पहले तीन चरणों में किसी उम्मीदवार को प्लेस्ड माना जाता था, जब वह लगातार तीन महीने काम कर लेता था. हालांकि पीएमकेवीवाइ 4.0 में प्लेसमेंट नतीजों को स्किलिंग प्रक्रिया से अलग कर दिया गया.

मार्च 2025 में श्रम, वस्त्र और कौशल विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने एमएसडीई से पीएमकेवीवाइ 4.0 के प्लेसमेंट डेटा देने को कहा और इसे योजना की सफलता का “असली पैमाना” बताया. समिति ने दी गई ट्रेनिंग की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए स्वतंत्र मूल्यांकन की जरूरत पर भी जोर दिया.

निगरानी की कमजोर व्यवस्था
कमजोर आंतरिक नियंत्रण ने बड़े पैमाने पर योजना के नियमों से बहकने की गुंजाइश पैदा दी. कैग ने पाया कि एमएसडीई ने ट्रेनिंग कार्यक्रमों के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की कोई नीति नहीं बनाई थी, जिससे ट्रेनिंग की गुणवत्ता की जांच मुश्किल हो गई.

पीएमकेवीवाइ 1.0 के तहत प्रतिभागियों की उपस्थिति, ट्रेनरों के विवरण और प्रशिक्षण केंद्रों की भौगोलिक लोकेशन जैसी जानकारी सुरक्षित नहीं रखी गई. ट्रेनिंग प्रोवाइडर्स को प्रमाणपत्र वितरण समारोह की तस्वीरें और वीडियो लेने तथा उम्मीदवारों की बैचवार ग्रुप फोटो एनएसडीसी पोर्टल पर अपलोड करनी थी.

एनएसडीसी ने यह डेटा सुरक्षित नहीं रखा, जिससे ट्रेनिंग होने के बहुत कम दस्तावेजी प्रमाण बचे. औपचारिक डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क अप्रैल 2022 में ही अधिसूचित हुआ, जब पहले तीन चरण पूरे हो चुके थे.

पात्रता नियमों को भी कमजोर ढंग से लागू किया गया. सभी चरणों में अलग-अलग जॉब रोल के लिए न्यूनतम उम्र, शैक्षिक योग्यता और कई बार पूर्व अनुभव तय था. लेकिन नामांकन प्रक्रिया में भरोसेमंद तरीका नहीं था. नतीजतन, 6.54 लाख प्रमाणित उम्मीदवार ट्रेनिंग के लिए जरूरी न्यूनतम आयु से कम पाए गए.

जिन नौकरियों के लिए पहले से तकनीकी योग्यता जरूरी थी, उनमें 1,23,533 प्रमाणित उम्मीदवारों में से 1,05,493 (85 फीसद से ज्यादा) पात्रता मानदंडों पर खरे नहीं उतरे. यह समस्या पीएमकेवीवाइ 4.0 में भी बनी रही. 9 अक्तूबर, 2024 तक और 1.18 लाख कम उम्र के उम्मीदवार प्रमाणित किए जा चुके थे. मई 2025 में मंत्रालय ने ज्यादातर कोर्सों के लिए न्यूनतम आयु नियम हटा दिए, उन्हें सिर्फ वहां बनाए रखा जहां कानूनन जरूरी है या जहां जोखिम भरे ट्रेड हैं.

पीएमकेवीवाइ के तहत ट्रे‌निंग प्रोवाइडर्स को लक्ष्य भी संतुलित ढंग से नहीं दिए गए—यह चिंता कैग ने तो उठाई ही, इंडिया टुडे से बात करने वाले कई लोगों ने भी जताई, जिनमें पूर्व एमएसडीई अधिकारी भी शामिल हैं. पहले तीन चरणों में शामिल 6,099 ट्रे‌निंग प्रोवाइडर्स में से कुल ट्रेनिंग लक्ष्यों का 84 फीसद सिर्फ 10 फीसद ट्रे‌निंग प्रोवाइडर्स को आवंटित किया गया. 40 फीसद को 14 फीसद लक्ष्य मिले, जबकि बाकी आधे को मामूली दो फीसद लक्ष्य ही दिए गए.

नाम न छापने की शर्त पर दिल्ली के एक श्रम अर्थशास्त्री कहते हैं, “सिस्टम इसलिए कमजोर पड़ गया क्योंकि पात्रता मानदंडों में अक्सर ढील दी गई. योजना की घोषणा के बाद बड़ी संख्या में ट्रे‌निंग प्रोवाइडर्स उभर आए, जिससे लगता है कि कई लोगों को सरकारी इंसेंटिव में कारोबार के मौके दिखे.”

इसी तरह की चिंताएं प्रधानमंत्री कौशल केंद्र (पीएमकेके) चलाने वाले साझेदारों के चयन में भी सामने आईं. ये मंत्रालय के मॉडल ट्रेनिंग सेंटर हैं. इंडिया टुडे के विश्लेषण में पाया गया कि देशभर में 68 कंपनियों ने 711 पीएमकेके चलाए, लेकिन सिर्फ 15 फर्मों (करीब पांचवें हिस्से) के नियंत्रण में 483 केंद्र थे, यानी कुल का दो-तिहाई से ज्यादा.

कसा शिकंजा
एनएसडीसी ने कैग के निष्कर्षों पर कार्रवाई करते हुए पीएमकेवीवाइ के अमल में कथित गड़बड़ियों को लेकर करीब 20 मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए. यह कार्रवाई संगठन में नेतृत्व के बड़े फेरबदल के बीच हुई.

पिछले साल मई में एनएसडीसी ने अपने तत्कालीन कार्यवाहक सीईओ वेद मणि तिवारी को अचानक हटा दिया था. उनके हटने के बाद एमएसडीई ने दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें “एनएसडीसी में धन के दुरुपयोग” का आरोप लगाया गया और अफसरों पर अनाधिकार या बोर्ड की मंजूरी के बिना फैसले लेने का आरोप लगाया गया.

मंत्रालय ने इस साल की शुरुआत में संसद को बताया कि उसने कैग के निष्कर्षों पर संज्ञान लिया है और पीएमकेवीवाइ 4.0 के तहत आधार-आधारित ई-केवाइसी, बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम, यूनीक बेनेफिशियरी आइडी और क्यूआर-कोडेड डिजिटल सर्टिफिकेट जैसे उपायों के जरिए निगरानी मजबूत की है.

साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 31 अक्तूबर, 2025 तक एमएसडीई ने योजना के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने पर पीएमकेवीवा‌इ 4.0 के तहत 178 ट्रेनिंग सेंटरों को ब्लैकलिस्ट कर दिया था. इनमें कुछ स्किल काउंसिल भी शामिल हैं—जैसे टेलीकॉम और मीडिया ऐंड एंटरटेनमेंट सेक्टर की—जिन्हें एनएसडीसी ने उद्योग-नेतृत्व वाली स्वायत्त संस्थाओं के रूप में बनाया था. कुछ मामलों में वित्तीय जुर्माने लगाए गए और गंभीर गड़बड़ियों के लिए 41 एफआ‌इआर दर्ज की गईं.

अमल की नाकामियों से आगे एक गहरी चुनौती है: ट्रेनिंग को श्रम बाजार की मांग से जोड़ना. कैग ने कहा कि “पीएमकेवीवाइ के इस काम को सेक्टर या राज्य-विशेष की हुनर संबंधी खाई से जोड़ने का कोई संस्थागत तंत्र नहीं था”. ट्रेनिंग के लक्ष्य स्किल-गैप स्टडी के आधार पर तय होने चाहिए थे लेकिन ऐसी स्टडी योजना के तहत कवर किए गए 37 सेक्टरों में से केवल 24 में ही की गई.

नतीजा यह हुआ कि ट्रेनिंग और रोजगार की मांग के बीच खाई बनी रही. (देखेंः मांग-आपूर्ति का असंतुलन). 2015 से 2022 के बीच श्रमबल की अनुमानित अतिरिक्त मांग का करीब 60 फीसद हिस्सा पांच सेक्टरों—मैन्युफैक्चर‌िंग, लॉजिस्टिक्स, ब्यूटी ऐंड वेलनेस, फर्नीचर ऐंड फिटिंग्स और पर्यटन ऐंड हॉस्पिटैलिटी—में था, फिर भी इन सेक्टरों की पीएमकेवीवाइ के तहत एसटीटी/एसपी प्रमाणन में संयुक्त हिस्सेदारी सिर्फ 22.7 फीसद रही. इसके उलट, रिटेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अपैरल जैसे सेक्टर्स ने ट्रेनिंग में 40 फीसद से ज्यादा हिस्सा लिया, जबकि अनुमानित मांग में उनका हिस्सा 10 फीसद से भी कम था.

बुनियाद दुरुस्त करने की दरकार
दरअसल, स्किलिंग की जिस तरह से परिकल्पना की गई है, कई विशेषज्ञों को उस पर भी ऐतराज है. संवेदनशील समुदायों की महिलाओं और युवाओं की स्किलिंग पर काम करने वाली संभव फाउंडेशन की संस्थापक गायत्री वासुदेवन कहती हैं कि यह कार्यक्रम एक गलत धारणा पर टिका है कि अगर औपचारिक शिक्षा नाकाम हो रही है, तो बस शॉर्ट-टर्म ट्रेनिंग उसकी जगह ले सकती है और लोगों को नौकरियों में लगा सकती है.

कई लोगों के लिए स्किलिंग अपने-आप में आकर्षित करने वाली नहीं है. उम्मीदवारों को जोड़ने की रणनीतियां अक्सर व्यावहारिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज करती हैं; बहुत-से लोग स्किलिंग सेंटरों में जाना ही नहीं चाहते. वासुदेवन कहती है, “शॉर्ट-टर्म कार्यक्रम अक्सर कमजोर डिजाइन से जूझते हैं.

स्किलिंग को पब्लिक हेल्थ इंटरवेंशन की तरह देखा जाना चाहिए—जहां सिर्फ ट्रेनिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि व्यवहार में बदलाव के लिए लगातार निवेश जरूरी है.” वे सावधान करती हैं कि सिर्फ ट्रेनरों को दंडित करने से इन सामाजिक वास्तविकताओं का समाधान नहीं होगा.

पूर्व एमएसडीई अधिकारी एक और ढांचागत समस्या की ओर इशारा करते हैं: कौशल कार्यक्रम आम तौर पर स्कूली या कॉलेज शिक्षा के बाद दखल देते हैं. वे कहते हैं, “20 साल के युवक को किसी नए विषय में दिलचस्पी पैदा करवाना बहुत मुश्किल होता है.” वे सुझाते हैं कि व्यावसायिक कौशल को स्कूली शिक्षा में शामिल करना—जैसा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्रस्तावित है—ज्यादा प्रभावी साबित हो सकता है.

वे जोड़ते हैं कि उतना ही जरूरी भारतीय कौशल प्रमाणपत्रों की वैश्विक मान्यता भी है. जब इले‌क्ट्रिशियन या केयर प्रोवाइडर जैसे कामगार जर्मनी या जापान जैसे देशों में नौकरी पा सकेंगे, तभी स्किल ट्रेनिंग के प्रति चाहत बढ़ेगी.

पीएमकेवीवाइ के विचार में कोई खामी नहीं. आधार से जुड़े बैंक खातों ने डीबीटी को बड़े पैमाने पर लागू करने में मदद की; कार्यक्रम ने राष्ट्रीय स्किलिंग ईकोसिस्टम के पहलू गढ़ने में मदद की—व्यावसायिक मानकों और ट्रेनिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर विश्व-स्तरीय पाठ्यक्रम और संस्थागत क्षमता तक.

फिर भी व्यापक तस्वीर गंभीर बनी हुई है. स्किलिंग के लिए धैर्य, निरंतरता और शिक्षा व्यवस्था, श्रम बाजारों तथा मानव व्यवहार की गहरी समझ जरूरी है. यह सिर्फ आंकड़ों से चलने वाला कार्यक्रम नहीं होना चाहिए. 

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