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डार्क मोड

एथेनॉल की कशमकश

एथेनॉल मिश्रण को तेजी से लागू करने से 20 करोड़ उपभोक्ता मुश्किल में हैं

Auto special Column
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 16 जुलाई , 2026

यह प्रस्ताव फायदे का सौदा लग रहा था. देश से विदेशी मुद्रा का बाहर जाना घटेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजारों की अनिश्चितताओं पर निर्भरता कम होगी, जो अक्सर बदलते भू-राजनीतिक हालात से प्रभावित होते हैं. इसके लिए सबसे बड़े कृषि उद्योगों में से एक के बाइप्रोडक्ट का इस्तेमाल किया जाना था.

भारत ने 2014 में पेट्रोल में 2 फीसद से कम एथेनॉल मिलाना शुरू किया और करीब एक दशक पहले ई10 के अनुकूल वाहन बनाने शुरू किए. एथेनॉल मिश्रण की समयसीमा आगे बढ़ाई गई और हम 2022 में तय समय से पहले ई10 तक पहुंच गए. सब कुछ ठीक लगता था, क्योंकि ऑटो उद्योग पहले ही ई10 के अनुकूल वाहन बनाना शुरू कर चुका था. पहले ई5 और फिर ई10 को कुछ इलाकों में लागू किया गया और बाद में पूरे देश में फैलाया गया.

ई10 के इस्तेमाल को फैलाने में देरी मुख्य रूप से एथेनॉल बनाने के लिए कच्चे माल और डिस्टिलिंग सुविधाओं की कमी की वजह से हुई. हालांकि, 2018 की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति और 2030 तक ई20 हासिल करने की आक्रामक योजना ने डिस्टिलिंग क्षमता और सप्लाइ चेन में बड़ा निवेश कराया, ताकि ज्यादा खाद्यान्न एथेनॉल निर्माण के लिए भेजे जा सकें.

अब आज की स्थिति देखिए. एथेनॉल डिस्टिलिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश हो चुका है. सरकार ने ई20 मिश्रण लागू करने की गति करीब पांच साल तेज कर दी है. इसके बावजूद स्थापित एथेनॉल डिस्टिलेशन क्षमता का लगभग आधा हिस्सा खाली रह जाता है.

सरकार अब ज्यादा मिश्रण की ओर बढऩे पर विचार कर रही है. इससे 20 करोड़ से ज्यादा ऐसे वाहन मुश्किल में पड़ते हैं, जो ई10 या उससे कम मिश्रण पर चलने में सक्षम हैं. उनमें तेज जंग लगने का जोखिम बढ़ जाता है और उन्हें चालू रखने की लागत अभूतपूर्व रूप से बढ़ सकती है.

जैसे-जैसे एथेनॉल की मांग बढ़ रही है, गन्ने के रस का ज्यादा कंसंट्रेट चीनी की जगह एथेनॉल बनाने में लगाया जा रहा है. ज्यादा मक्का उगाया जा रहा है और एथेनॉल डिस्टिलेशन को भेजा जा रहा है. टूटे चावल जैसे और खाद्यान्न भी इस्तेमाल हो रहे हैं.

एथेनॉल निर्माण की दूसरी पीढ़ी की तकनीकें अभी शुरुआती दौर में हैं,  लेकिन उम्मीद है कि अगले दशक में गैर-खाद्य कृषि उत्पाद एथेनॉल के मुख्य स्रोत बनेंगे. जरूरत ऐसी बहुस्तरीय नीति की है, जो हमारे पेट्रोलियम आयात बिल को घटाए, 20 करोड़ आम भारतीयों के निवेश की रक्षा करे और उपभोक्ताओं को विकल्प दे.

यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है. हमने इस सदी के दूसरे दशक में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के प्रयोग शुरू किए जबकि ब्राजील ने पिछली सदी के पूर्वार्द्ध में ही यह काम शुरू कर दिया था. वहां एथेनॉल मिश्रण वैश्विक पेट्रोलियम कीमतों और घरेलू एथेनॉल की उपलब्धता के हिसाब से बदलता रहा. 2015 से वहां ई27 मानक बना और अब वह ई100 की ओर बढ़ रहा है. पैसेंजर वाहनों की बिक्री में फ्लेक्स फ्यूल वाहनों की हिस्सेदारी  90 फीसद से ज्यादा है. लोग कीमतों के हिसाब से तय कर सकते हैं कि क्या भरवाना है.

भारत में भी, जब हम ई85 ईंधन की ओर बढ़ रहे हैं, तो फ्लेक्स फ्यूल वाहनों की ओर बदलाव को प्रोत्साहन देना होगा. एथेनॉल की कीमत बाजार को तय करने देनी चाहिए और यह तय करना चाहिए कि लोग पुराने वाहन चलाते रहने के लिए ई10 मिश्रण पर ज्यादा भुगतान कर सकें. सड़कों पर ज्यादा फ्लेक्स फ्यूल वाहन चाहिए, जो राष्ट्रीय और वैश्विक हालात, पेट्रोल और एथेनॉल की उपलब्धता और कीमत के हिसाब से अलग- अलग मिश्रणों के अनुकूल चल सकें.

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