भारत में मेडिकल दाखिलों के लिए एक समान मानक बनाने के उद्देश्य से नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (अंडरग्रेजुएट) या नीट-यूजी को तैयार किया गया था. लेकिन इसके बजाए इसने यह दिखा दिया कि मजबूत सुरक्षा के बिना किसी व्यवस्था को केंद्रीकृत करने के कितने बड़े खतरे हो सकते हैं.
तीन मई को हुई राष्ट्रीय परीक्षा को व्यापक स्तर पर पेपर लीक के आरोपों की पुष्टि होने के बाद रद्द करना पड़ा. जो व्यवस्था निष्पक्षता और एकरूपता लाने के लिए बनाई गई थी, उसने पूरे देश में एक जैसी अव्यवस्था पैदा कर दी. इसका मानसिक आघात उन 22.8 लाख छात्रों ने झेला, जिन्होंने 565 शहरों के 5,400 से ज्यादा केंद्रों पर परीक्षा दी थी.
इनमें से चार छात्रों ने अपनी जान तक दे दी. यह ऐसे वक्त में कोई चौंकाने वाली बात नहीं है, जब देश के लाखों युवा मानते हैं कि उनकी पूरी जिंदगी भारत के 824 मेडिकल कॉलेजों की 1,29,805 सीटों या 330 डेंटल कॉलेजों की 27,695 सीटों में से एक हासिल करने पर टिकी है. 21 जून को दोबारा परीक्षा होगी, लेकिन उससे संदेह खत्म नहीं होंगे.
इस साल का पेपर लीक किसी प्रिंटिंग प्रेस या परीक्षा केंद्र से नहीं, बल्कि पेपर सेटिंग चेन में शीर्ष स्तर से शुरू हुआ था. परीक्षा के तुरंत बाद करीब 410 सवालों वाला एक हस्तलिखित 'गेस पेपर' सामने आया, जो परीक्षा से लगभग एक महीने पहले तक व्हाट्सऐप और टेलीग्राम पर घूम रहा था. राजस्थान के सीकर में एक व्हिसलब्लोअर ने इसका मिलान आधिकारिक प्रश्नपत्र से किया और पाया कि दोनों लगभग पूरी तरह मेल खाते हैं.
यह कथित 'गेस पेपर' 720 में से करीब 600 अंकों के सवालों को कवर कर रहा था. परीक्षा आयोजित कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की समीक्षा में भी पुष्टि हुई कि 'गेस पेपर' के लगभग 120 सवाल असली प्रश्नपत्र में आए थे. केमिस्ट्री सेक्शन का हिस्सा पूरी तरह एक जैसा था, जबकि बायोलॉजी का बड़ा हिस्सा भी लीक हो चुका था. जांच के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआइ) को बुलाया गया, और नीट के मामले में यह पहली बार नहीं था.
लेकिन इस बार जांच की दिशा अलग थी. सुराग किसी छोटे ट्रांसपोर्टर या रहस्यमयी परीक्षा माफिया तक नहीं, बल्कि खुद एनटीए की ओर से नियुक्त किए गए कुछ विशेषज्ञों तक पहुंचे. इन्हीं लोगों पर पेपर सेट करने और उसे मराठी में अनुवाद करने की जिम्मेदारी थी. पुणे के दो लेक्चरर—एक केमिस्ट्री और दूसरा बायोलॉजी विशेषज्ञ—अपने विषयों के सभी 135 सवालों को जानते थे.
आरोप है कि केमिस्ट्री के प्रोफेसर ने अपने घर पर पैसे लेकर विशेष कोचिंग कक्षाओं में सवाल, विकल्प और जवाब बताए. इन कक्षाओं के हस्तलिखित नोट्स बाद में नीट प्रश्नपत्र से पूरी तरह मेल खाते पाए गए. बाद में फिजिक्स के सवालों का स्रोत भी पुणे की एक और एनटीए विशेषज्ञ तक पहुंचा. कम से कम दो लेक्चरर्स पर 75 से ज्यादा प्रश्नपत्र करीब 2.5 लाख रुपए प्रति पेपर बेचने का शक है.
इसके बाद यह नेटवर्क तेजी से फैलता चला गया. मध्यस्थों ने ऐसे छात्रों को जुटाना शुरू किया, जो 'स्पेशल क्लास' में शामिल होने के लिए 10 से 15 लाख रुपए तक देने को तैयार थे. हस्तलिखित नोट्स और पीडीएफ के रूप में यह सामग्री बाहर फैली और आखिरकार राजस्थान और महाराष्ट्र के बड़े कोचिंग हब तक पहुंच गई. जिन छात्रों को इस लीक का अनुचित फायदा मिला, उनकी संख्या सैकड़ों में हो सकती है.
एनटीए ने अब करीब दो दर्जन प्रश्नपत्र तैयार करने वालों और अनुवादकों को 'संदेह के दायरे' में लिया है और अपने विशेषज्ञ पैनल में आंशिक बदलाव भी शुरू कर दिए हैं. संभव है कि नीट 2026 को इस तबाही के बाद किसी तरह बचा लिया जाए लेकिन कई ऐसे सवाल बाकी हैं जो पिछली परीक्षाओं पर भी संदेह खड़ा करते हैं. दागी माने जा रहे अनुवादकों के समूह में कई लोग छह-सात साल से जुड़े हुए थे.
ऐसे में कोई यह भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि पहले कभी पेपर लीक नहीं हुआ. 2022 में सीबीआइ ने एक ऐसे रैकेट का भंडाफोड़ किया था, जिसमें 'सॉल्वर' उम्मीदवारों की जगह परीक्षा देते थे. 2024 की नीट परीक्षा भी ऐसी गड़बड़ियों से प्रभावित हुई थी, जिसका संतोषजनक निष्कर्ष कभी सामने नहीं आया. 67 छात्रों के पूरे अंक लाने और सैकड़ों के लगभग परफेक्ट स्कोर ने मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे.
इस हफ्ते मैनेजिंग एडिटर कौशिक डेका की कवर स्टोरी इस पूरे संकट की परत-दर-परत पड़ताल करती है और उन सुधारों पर फोकस करती है जो परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता वापस ला सकते हैं. 2024 में पूर्व इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन की अगुआई वाली समिति ने कई अहम सिफारिशें की थीं. सबसे बड़ा बदलाव अगले साल देखने को मिल सकता है, जब नीट को कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) मोड में ले जाया जाएगा.
इसका मकसद प्रश्नपत्रों की छपाई, ढुलाई और भंडारण से जुड़ी कमजोरियों को कम करना है. हालांकि डिजिटल व्यवस्था अपने साथ तकनीकी ढांचे की सीमाएं भी लाती है. सबसे बड़ी समस्या संस्थागत है. एनटीए की स्थापना 2017 में देशभर की प्रवेश परीक्षाओं को एक समान बनाने के लिए केंद्रीय संस्था के तौर पर की गई थी. लेकिन फिलहाल न उसका पिछला रिकॉर्ड भरोसा जगाता है और न वर्तमान व्यवस्था.
एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह, जिन्होंने यह पूरा विवाद शुरू होने से सिर्फ महीने भर पहले ही पद संभाला, अब हर स्तर पर 'जीरो-ट्रस्ट आर्किटेक्चर' लागू करने की बात कर रहे हैं. उनके मुताबिक ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए, जिसमें प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञों को यह तक पता न हो कि वे किस परीक्षा के लिए सवाल बना रहे हैं.
ऐसे सिस्टम में विशेषज्ञ अपने सवाल एक बड़े, गुमनाम प्रश्न बैंक में जमा करेंगे और वहां से ऑटोमेटेड सिस्टम अंतिम प्रश्नपत्र तैयार करेगा. इससे अंदरूनी मिलीभगत की संभावना काफी कम हो सकती है. सुधार की दूसरी बड़ी जरूरत खुद एनटीए की संरचना में है.
मेडिकल संगठनों के बीच यह मांग तेजी से बढ़ रही है कि एनटीए की कानूनी स्थिति बदली जाए: उसे एक पंजीकृत सोसाइटी से बदलकर संसद के प्रति जवाबदेह वैधानिक संस्था बनाया जाए, जिसकी स्वतंत्र ऑडिट और संसदीय निगरानी हो सके. कुछ लोग तो मौजूदा ढांचे में एनटीए को पूरी तरह खत्म करने की मांग भी कर रहे हैं.
बेशक, नीट का संकट सिर्फ लीक हुए प्रश्नपत्रों या सिस्टम से खेल करने वाले कुछ लोगों की कहानी भर नहीं. यह उस संस्था का संकट है, जिसे विश्वसनीयता तय करने के लिए बनाया गया था, लेकिन जिसकी अपनी विश्वसनीयता अब कठघरे में खड़ी है. इसे सुधारना होगा—और जल्दी सुधारना होगा. क्योंकि ऐसी संस्थाओं की विफलता उन युवाओं का मनोबल तोड़ देती है, जो बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

