तीन जून, 2023 की रात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नई दिल्ली के 6-ए कृष्ण मेनन मार्ग स्थित आधिकारिक आवास पर अचानक हलचल होती है. थोड़ी ही देर में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू वहां पहुंचते हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा वहां पहले से मौजूद थे. इस बैठक में क्या हुआ, इस बारे में आधिकारिक तौर पर दोनों पार्टियों यानी भाजपा और टीडीपी के नेता कुछ भी नहीं बोल रहे. लेकिन सूत्रों के हवाले से पता चल रहा है कि इस बैठक में टीडीपी और भाजपा में गठबंधन को लेकर बातचीत हुई.
टीडीपी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में भाजपा की पुरानी साथी रही है. जेडी-यू के 2013 में एनडीए से अलग होने के बाद शरद यादव की जगह चंद्रबाबू नायडू ही इसके संयोजक बनाए गए थे. 2018 में आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के मसले पर एनडीए से नाता तोड़ने तक वे इसके संयोजक रहे. उनके बाद से एनडीए संयोजक का पद खाली है.
दरअसल, पिछले कुछ महीनों में कई मौकों पर नायडू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की है. बीते अप्रैल में तो उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कह दिया कि वे राष्ट्र निर्माण में मोदी के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं. अनौपचारिक बातचीत में भाजपा के एक नेता जानकारी देते हैं, ''उन्हें फिर से एनडीए का संयोजक बनाने में पार्टी को कोई दिक्कत नहीं है. टीडीपी के साथ आने से भाजपा को आंध्र प्रदेश के साथ-साथ तेलंगाना के उन क्षेत्रों में भी फायदा मिल सकता है जहां टीडीपी अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है.''
नायडू के साथ दिल्ली की बैठक के बाद जब अमित शाह आंध्र प्रदेश गए तो उन्होंने जगन मोहन रेड्डी और उनकी सरकार के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर हमलावर रुख अपनाया. शाह के इस रुख से अनुमान लगाया जा रहा है कि टीडीपी के साथ आगे बढ़ने को लेकर भाजपा में सहमति बन गई है. आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव भी होने हैं.
हालांकि भाजपा की नजर सिर्फ टीडीपी पर नहीं है. दरअसल, कर्नाटक विधानसभा चुनाव में हार और विपक्षी पार्टियों की एकजुट होने की कोशिशों के बीच भाजपा लोकसभा चुनावों की तैयारियों में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती. इसी को ध्यान में रखकर वह एनडीए को नए सिरे से संगठित करने के काम में जुट गई है. पार्टी के अंदर इसे एनडीए 2.0 कहा जा रहा है. एनडीए 1998 में कांग्रेस विरोधी पार्टियों के गठबंधन के रूप में अस्तित्व में आया था. उस समय इसके अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे और समता पार्टी के अध्यक्ष जॉर्ज फर्नांडीस संयोजक थे. भाजपा ने 2014 का लोकसभा चुनाव भी एनडीए की अगुआई करते हुए लड़ा था हालांकि तब पार्टी को अपने दम पर बहुमत मिल गया था. उसके बाद से इस गठबंधन की चमक लगातार फीकी पड़ती गई. जद-यू, टीडीपी, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना और साथ ही कई पार्टियां अलग-अलग मुद्दों पर एनडीए से दूर होती गईं.
फिर बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने बूते 300 का आंकड़ा पार कर गई. इससे दूसरी पार्टियों की जरूरत और कम हुई. 2018 से एनडीए संयोजक का खाली पड़ा पद भी इसकी तस्दीक करता है. लेकिन बदले हालात में पार्टी ने एनडीए को मजबूत करने की कोशिशें फिर शुरू की हैं. इस बारे में पार्टी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी बताते हैं, ''जो हमारे गठबंधन के साथी हो सकते हैं, उनकी दो श्रेणियां हैं. इनमें पहली श्रेणी उन पार्टियों की है जिनके साथ चुनाव के पहले गठबंधन करने की कोशिश हो रही है. इनके साथ सीटों का बंटवारा करके पार्टी चुनाव लड़ेगी. दूसरी श्रेणी उन पार्टियों की है, जिनसे संवाद का स्तर इतना बना रहे कि जरूरत पड़ने पर चुनाव के बाद ये गठबंधन में शामिल हो सकें.''
दरअसल, जो पार्टियां चुनाव के पहले एनडीए 2.0 का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं, उन पार्टियों के साथ चुनाव में आंतरिक समझौते की योजना पर भी भाजपा काम कर रही है. इन पार्टियों में ओडिशा की नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है.
पंजाब के शिरोमणि अकाली दल को एनडीए में शामिल करने की कोशिश हो रही है. जिन प्रस्तावित कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल अलग हुआ था, उन्हें मोदी सरकार ने बाद में वापस ले लिया. अकाली दल के संस्थापक और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जे.पी. नड्डा उनके पैतृक गांव गए. इसका यह मतलब निकाला गया कि जरूरत पड़ने पर दोनों पार्टियां साथ आ सकती हैं. भाजपा सूत्रों की मानें तो अकाली नेता नरेश गुजराल के माध्यम से दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन को लेकर संवाद शुरू हुआ है.
कभी कर्नाटक में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलाने वाली जेडीएस के भी फिर से एनडीए में आने की संभावना है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडीएस सिर्फ 19 सीटें जीत पाया. यह अब तक का उसका सबसे बुरा प्रदर्शन है. यही वजह है कि जेडीएस की तरफ से गठबंधन की पहल हो रही है. ओडिशा ट्रेन हादसे के बाद जब रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का इस्तीफा मांगा जा रहा था तब जेडीएस सुप्रीमो और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने उनका बचाव किया. फिर जब विपक्षी पार्टियों ने नई संसद के उद्घाटन कार्यक्रम का बहिष्कार किया तो देवगौड़ा इसमें शामिल हुए थे. इसके अलावा, जब पूर्व प्रधानमंत्री से भाजपा के साथ जाने की संभावनाओं पर सवाल किया गया तो उन्होंने इसका जवाब एक सवाल से ही दिया. देवगौड़ा ने कहा कि पूरे देश में एक पार्टी बताइए जिसका भाजपा से कभी न कभी कोई संबंध नहीं रहा है? इस बयान के बाद जेडीएस के एनडीए में शामिल होने की बातों को और बल मिला है.
इन बड़ी पार्टियों के अलावा एक महत्वपूर्ण कोशिश छोटी पार्टियों को एनडीए में लाने की हो रही है. इस कड़ी में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सहयोगी रही ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी शामिल है. ओमप्रकाश राजभर के बेटे अरुण राजभर की शादी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुभकामना पत्र भेजा था. बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो सिर्फ शिष्टाचार माना जाता. लेकिन उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी के अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सलाहकार अवनीश अवस्थी मुख्यमंत्री का संदेश लेकर शादी में पहुंचे. इन घटनाक्रमों को राजभर की एनडीए में वापसी से जोड़कर देखा जा रहा है.
उत्तर प्रदेश के पड़ोसी राज्य बिहार में भी एनडीए के पुराने साथियों को जोड़ने की कोशिश हो रही है. आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा जद-यू में जाने के बाद फिर इससे बाहर निकल गए. उन्होंने नई पार्टी राष्ट्रीय लोक जनता दल बनाई है. इसी तरह से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने नीतीश सरकार से अलग होने की घोषणा की है. पार्टी के इकलौते मंत्री संतोष कुमार सुमन ने सरकार से इस्तीफा दे दिया है. सुमन का आरोप है कि जद-यू उनकी पार्टी का विलय कराना चाहता था. तो क्या अब उनकी पार्टी एनडीए में वापस जाएगी? इस बारे में संतोष सुमन कहते हैं, ''अभी तो हम खुद को महागठबंधन का हिस्सा मानते हैं. हमारी पार्टी अपनी आगे की दिशा पार्टी के संस्थापक जीतन राम मांझी से विचार-विमर्श करके तय करेगी.''
बिहार में मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी के भी फिर से एनडीए में आने की संभावना है. हालांकि, 2022 के मार्च में उनकी पार्टी के तीनों विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे. इसके बाद भाजपा के कहने पर नीतीश कुमार ने उन्हें मंत्री पद से हटा दिया था. लेकिन इस साल फरवरी में सहनी को केंद्र सरकार ने वाइ-प्लस सुरक्षा देकर यह संकेत दिया कि बदली परिस्थितियों में भाजपा उन्हें गठबंधन में लाना चाहती है. बिहार प्रदेश भाजपा के एक नेता दावे के साथ कहते हैं कि सहनी सारी नाराजगी भूल कर वापस आ रहे हैं और 25 जुलाई को वे इसकी घोषणा कर देंगे. दरअसल, सहनी 25 जुलाई को फूलन देवी के शहादत दिवस पर पटना में एक भव्य कार्यक्रम करने जा रहे हैं.
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त अलग होने वाली लोक जनशक्ति पार्टी 2021 में दो धड़े में बंट गई. पशुपति कुमार पारस का धड़ा अभी एनडीए के साथ है और पारस केंद्रीय मंत्री हैं. लेकिन बिहार भाजपा से केंद्रीय नेताओं को यह जानकारी दी गई है कि एलजेपी से भाजपा को चुनावी लाभ तब ही मिल सकता है जब लोजपा संस्थापक रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान भी साथ हों. इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने इस पर ध्यान दिया और चिराग पासवान को जोड़ने की कोशिश शुरू हो गई. फरवरी में ही केंद्र सरकार ने चिराग को जेड श्रेणी की सुरक्षा दी है. भाजपा कोशिश कर रही है कि एलजेपी के दोनों धड़ों में समझौता हो जाए और संयुक्त एलजेपी एनडीए के साथ रहे. चर्चा तो यह भी है कि मोदी सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार होने की स्थिति में पारस की जगह चिराग को मंत्री बनाया जा सकता है.
राजस्थान में हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को भी एनडीए में लाने की कोशिश हो रही है. बेनीवाल की आरएलपी भी एनडीए का हिस्सा रही है. लेकिन कृषि कानूनों के मुद्दे पर दिसंबर, 2020 में अलग हो गई थी. भाजपा नेताओं को लग रहा है कि अगर बेनीवाल साथ आते हैं तो प्रदेश के जाट मतदाताओं को साथ लाने में मदद मिल सकती है. इसका लाभ राजस्थान में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव में भी मिल सकता है. लेकिन पार्टी के लोग ही यह भी बता रहे हैं कि बेनीवाल को साथ लाने का सबसे अधिक विरोध पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तरफ से हो रहा है.
एनडीए 2.0 गढ़ने में भाजपा की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि कितनी पार्टियां सही समय पर एनडीए में औपचारिक तौर पर शामिल होती हैं और सीटों का बंटवारा कितनी सहमति से हो पाता है.

