अरुण पुरी
कभी-कभी इंसाफ कानून और कानूनी प्रक्रियाओं के झमेले में रास्ता भूल-भटक जाता है. कभी-कभी कॉमन सेंस की जरूरत होती है. एक पल के लिए सोचिए जरा कि इंसाफ के लिए लड़ रही विश्व चैंपियन महिला पहलवान कहां से आई हैं. मौजूदा मुकाम पर पहुंचने को किन संघर्षों से गुजरी हैं. वे सब मामूली पृष्ठभूमि और बेहद रुढ़िवादी माहौल से आई हैं. लोगों का ध्यान महिला खिलाड़ियों पर तभी जाता है जब वे पोडियम पर पहुंचती हैं. फिर फूल-कुमकुम, इनामों और विज्ञापनों की बौछार होती है. खेलों में सबसे मर्दाना कुश्ती निरा मर्दों का मामला था जो पितृसत्तात्मक हरियाणा के कीचड़ भरे गड्ढों में खेला जाता था, उसी हरियाणा में, जहां उनकी मां और दादियों ने पूरी जिंदगी घूंघट में बिता दी होगी.
उनकी हिम्मत देखिए जिसकी बदौलत वे करियर को जोखिम में डालकर यौन उत्पीड़न जितनी निजी चीज का विरोध करने के लिए खुलकर सामने आईं. यह खेल जीवन खत्म होने के बाद भी उनकी जिंदगियों को खतरे में डाल सकता है. वे दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए पांच महीने जमी रहीं, दरियों पर सोईं, धमकियां, उपहास और फब्तियां झेलीं, पुलिस के अवरोधों को तोड़ती रहीं और बाज दफा खुद टूटीं, अपनी मजबूती को ही औजार बनाकर प्रतिष्ठान के खिलाफ डटी रहीं, भारत के झंडे के साथ जमीन पर पटक दी गईं पर कभी पराजित नहीं हुईं. इस लड़ाई में उन्होंने खेलों में अपने गौरवपूर्ण लम्हों से शायद बड़ी कामयाबियां हासिल कीं. वे भारतीय महिलाओं का चेहरा और आवाज बन गईं. निरे अपने नैतिक बल के बूते वे अपनी लंबी और एकाकी लड़ाई को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ले आईं.
और उस शख्स को देखिए जिनके खिलाफ वे खड़ी हैं. कुश्ती की दुनिया के डॉन बृजभूषण शरण सिंह, जिन्होंने 12 साल भारतीय कुश्ती महासंघ चलाया. वही शख्स जिस पर उनका करियर और आजीविका निर्भर थी. वे शेर को उसकी मांद में ललकार रही हैं. औपचारिक आरोपों, आंखों देखे सबूतों और तस्दीक करने वाले बयानों के आईने में वे यौन उत्पीड़न के बारंबार कृत्यों के आरोपी हैं. यह निर्विवाद ताकत के ओहदे से शिकार करने के पैटर्न की तरफ इशारा करता है. सात पीड़िताओं से जुड़ी 14 घटनाओं में बताते हैं सिंह ने खेल आयोजनों, पदक समारोहों या जबरन निजी बातचीत के दौरान उनके साथ छेड़छाड़ की या यौन संबंध बनाने की मांग की. कथित तौर पर सिंह ने धमकी दी कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन्हें गंभीर नतीजे भुगतने होंगे. इनके 'पुरानी घटनाएं' होने के दावों के उलट आठ पिछले पांच साल में घटीं.
महीनों तक व्यवस्था इन महिलाओं के प्रति मूक बनी रही. उनके विरोध को राजनैतिक और जाति-प्रेरित बताते हुए उनकी मंशा पर सवाल उठाए. सिंह ने बेशर्मों जैसा व्यवहार किया, जो तभी किया जाता है जब आपको भरोसा हो कि व्यवस्था आपकी है. दिल्ली पुलिस की जांच सुप्रीम कोर्ट के धक्के के बावजूद सुस्त रफ्तार से आगे बढ़ी और फिर सबूत की अजीबोगरीब मांग पर टिक गई. कानून मानता है कि महिलाएं राह में आने वाले हर अश्लील इशारे, शब्द या कृत्य के जरिए किए गए अपमान के हर लम्हे को दर्ज करने के लिए सीसीटीवी कैमरा लेकर नहीं घूमतीं. यही वजह है कि वह यौन अपराधों में पीड़ित की गवाही स्वीकारता है.
सिंह की ताकत डब्ल्यूएफआइ पर उनकी सदारत से ही नहीं आती, बल्कि भारत के उस प्रचलित अभिशाप से भी आती है जिसके तहत हमारे आधे से ज्यादा खेल संघों की बागडोर राजनैतिक नेताओं के हाथ में है. सिंह भी कैसरगंज से भाजपा के सांसद हैं. उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता, जिनका अतीत गिरोहबंद हिंसा और लठैती से भरा है. यही नहीं, वे अयोध्या से श्रावस्ती तक 100 किमी की पट्टी में 54 शैक्षणिक संस्थाएं चलाते हैं. अवध के इस लघु साम्राज्य में चारों ओर फैली उनकी ग्रामीण रियासत किसी छोटे-मोटे राजा पर ही फबती है, जिसका आभामंडल आधुनिक भी है और प्राचीन भी—एसयूवी का बेड़ा और पिछले हिस्से में खड़ा रॉबिन्सन आर-66 टरबाइन हेलिकॉप्टर, उसके ठीक सामने घोड़ों का अस्तबल और मवेशियों का शेड. उनका दबदबा उन्हें छह बार लोकसभा ले गया. फिर हैरानी क्या कि इस वजह से भाजपा को मिल रही बदनामी के बावजूद सरकार इसे हल्के में ले रही है. उनकी अपनी सीट के अलावा मध्य उत्तर प्रदेश की 4-5 लोकसभा सीटों पर सिंह का नियंत्रण है. वे दबदबे वाली ठाकुर/राजपूत जाति से हैं, इसलिए संभावित चुनावी नुक्सान इससे ज्यादा भी हो सकता है.
फिर भी इस महीने हालात पलटे. हालांकि कुछ हद तक ही. प्रदर्शनकारी एथलीट खासी चर्चा और सहानुभूति हासिल करने लगे. सच की ताकत जाहिरा तौर पर उनके पीछे थी. अगर इसके पीछे इंसाफ की सच्ची लालसा नहीं होती, तो सात अलहदा महिलाएं खेल में अपने उस करियर को खतरे में क्यों डालतीं जिसे बनाने के लिए वे इतनी कड़ी मेहनत से लड़ी थीं? विरोध कर रहे लोग ज्यादातर जाट थे और वे एकजुट होने लगे—पहलवान और जाट साझा लक्ष्य के लिए मिलकर काम करने लगे. भाजपा 2021-22 में जाट किसानों की अगुआई में हुए विरोध प्रदर्शनों में अपनी उंगलियां जला ही चुकी थी. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिम उत्तर प्रदेश में फैले जाट 54 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों और 211 विधानसभा सीटों के नतीजों पर असर डाल सकते हैं.
डब्ल्यूएफआइ के प्रमुख के पद के लिए चुनाव का ऐलान कर दिया गया. केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने वादा किया कि सिंह के किसी एवजी को चुनाव नहीं लड़ने दिया जाएगा. वादे के मुताबिक अब आरोपपत्र भी दाखिल कर दिया गया है. मगर भाजपा को बाबरी विध्वंस के दिनों से ही भगवा सेनानी रहे इस डॉन को शांत करने की जरूरत पड़ सकती है. वर्ना सिंह अकेले के बूते पर समस्या खड़ी कर सकते हैं. या मुमकिन है समाजवादी पार्टी से सौदेबाजी कर लें, जिसके मुखिया अखिलेश यादव ने विरोध प्रदर्शनों को लेकर चुप्पी ओढ़े रखी.
महिलाओं के लिए मोदी सरकार ने 2015 में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना तक लॉन्च की. विरोध प्रदर्शन कर रही महिला पहलवानों में से एक को 2016 में उसका ब्रांड एंबेसडर बनाया गया. फिर भी यह आलम. सीनियर एसोसिएट एडिटर सोनाली आचार्जी, डिप्टी एडिटर सुहानी सिंह और इंडिया टुडे की टीम इस मुश्किल और थकाऊ लड़ाई के सभी पहलू लेकर आई है. सबसे ज्यादा महिला पहलवानों की आवाज. उनके अनुभवों से उपजी हकीकत, अपनी जिंदगियों को पूरी तरह नियंत्रित करने वाले आदमियों के चंगुल से बचने का खौफ और आतंक उन महिलाओं की कहानी के लिए विडंबना से भरी पृष्ठभूमि का निर्माण करता है जो पितृसत्ता को चुनौती देकर ही एथलीट बन पाई थीं.

